सकारात्मक व्यक्तित्व का विकास

सत्य को प्राप्त करने की महान आकांक्षा उसी व्यक्ति में जागृत होती है, जिसकी सोच सकारात्मक होती है। अंततः सत्य तक वही पहुँचता है, जिसका चरित्र भी सकारात्मक हो और दृष्टिकोण भी सकारात्मक।

ज्यां जाक रूसो (Jean Jacques Rousseau ) (1712–1778) एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक थे। वे राजतंत्र के स्थान पर जनता के शासन के समर्थक थे। उनका प्रसिद्ध कथन है: “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, और हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।” (सोशल कॉन्ट्रैक्ट, 1762)

हालाँकि, मनुष्य के पास एक और समस्या है, जो शायद इससे भी अधिक गंभीर है। वह है कंडीशनिंग (मानसिक अनुकूलन) की समस्या। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष वातावरण में रहता है। इसलिए, हर व्यक्ति का मस्तिष्क उसके वातावरण से अनुकूलित हो जाता है, जो उसे सही सोच से वंचित कर देता है। परिणामस्वरूप, लोग स्वाभाविक रूप से सोचने में सक्षम नहीं रह जाते। अनुकूलन की इस समस्या को देखते हुए, रूसो के कथन को बेहतर ढंग से इस प्रकार कहा जा सकता है: “मनुष्य की रचना ईश्वरीय स्वभाव (फितरत) पर हुई थी, लेकिन मैं उसे मनोवैज्ञानिक रूप से अनुकूलित (conditioned) देखता हूँ।”

जब कोई बच्चा अपनी माँ के गर्भ से जन्म लेता है, तो वह मासूमियत का साक्षात् रूप दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो किसी फ़रिश्ते ने मानव रूप धारण कर लिया हो। जन्म के समय मनुष्य का मस्तिष्क पूर्णतः शुद्ध होता है। उसका चिंतन स्वाभाविक होता है, जैसा कि वास्तव में होना चाहिए। किन्तु मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे अपना पूरा जीवन दूसरों द्वारा बनाए गए समाज में बिताना पड़ता है। इसी कारण उसके मस्तिष्क पर लगभग हर जागते हुए क्षण बाहरी प्रभाव पड़ते रहते हैं। इसे ही कंडीशनिंग कहा जाता है। बाहरी वातावरण से प्रभावित होने की यह प्रक्रिया तब तक बढ़ती रहती है जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से अनुकूलित (conditioned) नहीं हो जाता।

सत्य की खोज में, साधक को इस अनुकूलन (conditioning) को समझने की आवश्यकता है, और उसके अनुसार, उसे अपने मन को मानसिक बंधनों से मुक्त करने (deconditioning) में लग जाना चाहिए ताकि वह इसे इसकी स्वाभाविक अवस्था में वापस ला सके। उसे बनावटी व्यक्ति बने रहने के बजाय स्वाभाविक और प्राकृतिक मनुष्य बनना चाहिए।

हाल ही में, मनोविज्ञान में जिस विचार ने ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल की है, उसे व्यवहारवाद (behaviourism) कहा जाता है। मनोविज्ञान के इस संप्रदाय में, यह माना जाता है कि अनुकूलन मनुष्य की एक स्थायी स्थिति है। यह ऐसा है मानो मनुष्य अपने अनुकूलन का कैदी हो और केवल उसका एक निष्क्रिय उत्पाद (passive product) है।

मनुष्य के व्यक्तित्व का गहन अध्ययन इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध करता है। आनुवंशिक कोड (Genetic Code) के बारे में हुई हाल की खोजें इस धारणा पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। यह सिद्ध हो चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व जन्म के समय ही उसके आनुवंशिक कोड में विद्यमान होता है। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके व्यक्तित्व का विकास केवल उसी आनुवंशिक कोड का खुलना मात्र होता है। यदि यह सत्य है, तो यह कहना अधिक उचित होगा कि वातावरण द्वारा की गई कंडीशनिंग मनुष्य की वास्तविक प्रकृति पर डाला गया एक बनावटी परदा है।

मानो मनुष्य का चरित्र एक प्याज़ की तरह है। प्याज़ के भीतर एक गुठली जैसा बल्ब (kernel) होता है। इस आंतरिक ‘बल्ब’ के ऊपर त्वचा जैसी कई परतें होती हैं। यदि इन परतों को हटा दिया जाए, तो प्याज़ का भीतरी सार प्रकट हो जाएगा। यही बात मनुष्य के साथ भी है। कंडीशनिंग के कारण मनुष्य के वास्तविक अस्तित्व पर बाहरी वातावरण से बने हुए बनावटी परदे पड़ जाते हैं। यदि इन परदों को हटा दिया जाए, तो मनुष्य का सच्चा और स्वाभाविक व्यक्तित्व प्रकट हो जाएगा।

मनुष्य के व्यक्तित्व पर पड़े हुए इन बाहरी परदों को हटाने की प्रक्रिया को डीकंडीशनिंग कहा जाता है। सत्य की खोज करने वाले व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कंडीशनिंग से बने उन बनावटी परदों को हटाए, जो उसके वास्तविक अस्तित्व को ढक देते हैं, ताकि उसकी असली और स्वाभाविक प्रकृति फिर से प्रकट हो सके।

धर्म हमें बताता है कि मनुष्य ईश्वर की एक बेमिसाल रचना है। अपने अंतर्मन से इंसान सच्चा और पूर्ण प्राणी होता है। इस ज़िंदगी में हमेशा कामयाब रहने के लिए ज़रूरी है कि वह अपनी असली फ़ितरत को सँभालकर रखे। उसे वैसा ही बना रहना चाहिए, जैसा उसके रब ने उसे बनाया है। इस प्राकृतिक अवस्था में बने रहने के लिए यह आवश्यक है कि उन सभी चीज़ों को हटा दिया जाए, जो उस पर बनावटी परदों का काम करती हैं। यही डीकंडीशनिंग कहलाती है।

जब मनुष्य किसी विशेष वातावरण में पलता है, तो वह प्रतिदिन विभिन्न नकारात्मक परिस्थितियों और अनुभवों का सामना करता है। ये परिस्थितियाँ और अनुभव उसके चरित्र पर अनचाहा प्रभाव डालते रहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई उससे आगे बढ़ जाए, तो वह ईर्ष्या करने लगता है। अब ईर्ष्या उसके चरित्र में प्रवेश कर जाती है। यदि कोई उसके साथ दुर्व्यवहार करे, तो वह घृणा से प्रतिक्रिया करता है। घृणा उसके चरित्र का हिस्सा बन जाती है। यदि कोई उस पर अत्याचार करे, तो उसके चरित्र में हिंसा की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। इस प्रकार हिंसा भी उसके चरित्र का हिस्सा बन जाती है, और इसी तरह आगे चलता रहता है।

इस प्रकार मनुष्य विभिन्न अनुभवों से गुज़रता है और उन पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देता है। हर बार जब वह ऐसा करता है, तो उसके चरित्र में एक हानिकारक तत्व प्रवेश कर जाता है और उसे उसी अनुरूप ढाल देता है। इस प्रकार समय के साथ मनुष्य का वास्तविक चरित्र एक परदे के पीछे छिप जाता है। परिणामस्वरूप मनुष्य एक प्राकृतिक व्यक्ति से बदलकर एक बनावटी व्यक्ति बन जाता है।

डीकंडीशनिंग इसी बनावटी अवस्था का सुधार है। यह डीकंडीशनिंग हर व्यक्ति की एक अत्यंत आवश्यक ज़रूरत है। इसके बिना मनुष्य का चरित्र गम्भीर रूप से दोषपूर्ण बना रहेगा। वह कभी भी पूर्ण चरित्र के स्तर तक नहीं पहुँच सकेगा।

डीकंडीशनिंग का मुख्य साधन आत्मनिरीक्षण (introspection) है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं का निरीक्षक बनना चाहिए। सबसे पहले उसे अपने भीतर गहराई से झाँकना चाहिए और जो भी नकारात्मक तत्व उसे मिले, उसे निकाल देना चाहिए। इसके बाद उसे इन नकारात्मक तत्वों को सकारात्मक में बदलकर अपने चिंतन को सुधारना चाहिए। फिर इन परिवर्तित सकारात्मक तत्वों को अपने व्यक्तित्व में सम्मिलित कर लेना चाहिए। यह प्रक्रिया उस पशु के समान है, जो जुगाली करता है—भोजन को मुँह से निकालकर फिर चबाता है ताकि वह पचने योग्य बन जाए। इसी प्रकार, डीकंडीशनिंग के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को अपने चरित्र का पुनर्निर्माण सकारात्मक आधार पर करना चाहिए।

मनुष्य के मस्तिष्क के दो मुख्य भाग होते हैं: चेतन (conscious) और अवचेतन (unconscious)। उदाहरण के लिए, जब किसी व्यक्ति को कोई अप्रिय अनुभव होता है, तो उससे संबंधित विचार एक नकारात्मक तत्व के रूप में चेतन मस्तिष्क में प्रवेश करता है। यह नकारात्मक तत्व कुछ दिनों तक चेतन मस्तिष्क में रहता है। इसके बाद धीरे-धीरे यह अवचेतन मस्तिष्क में चला जाता है, जहाँ यह सदा के लिए मस्तिष्क का हिस्सा बन जाता है। इसलिए आवश्यक है कि पहले ही दिन, या अधिक से अधिक कुछ ही दिनों के भीतर, मनुष्य अपने मस्तिष्क में मौजूद हर नकारात्मक तत्व को सकारात्मक में बदल दे, ताकि जब वह चेतन मस्तिष्क से गुज़रकर अवचेतन मस्तिष्क या स्मृति के भंडार में पहुँचे, तो वह वहाँ एक सकारात्मक तत्व के रूप में सुरक्षित हो।

यही प्रक्रिया किसी व्यक्ति के चरित्र-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती है। यही प्रक्रिया तय करती है कि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व सकारात्मक होगा या नकारात्मक। व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करना चाहिए, ताकि वह अपने नकारात्मक अनुभवों को सुधार सके और उन्हें सकारात्मक में बदल सके। परिणामस्वरूप ये तत्व उसके अवचेतन मस्तिष्क या स्मृति-कोष (store house of memory) में सकारात्मक रूप में संचित हो जाएँगे। जो व्यक्ति नियमित रूप से इस प्रक्रिया में लगा रहता है, उसका चरित्र अत्यंत सकारात्मक बन जाता है। यदि वह इस सुधार की प्रक्रिया को नहीं अपनाता, तो उसके सभी नकारात्मक अनुभव उसके अवचेतन मस्तिष्क में नकारात्मक तत्वों के रूप में जमा हो जाएँगे। इसका परिणाम यह होगा कि उसका चरित्र नकारात्मक बन जाएगा।

मनुष्य जो भी कार्य करता है, चाहे वह विचार में हो, शब्द में हो या कर्म में, वह उसके अवचेतन मस्तिष्क के अनुसार होता है। मनुष्य का व्यक्तित्व मुख्यतः उसके अवचेतन मस्तिष्क से निर्धारित होता है, न कि केवल उसके चेतन मस्तिष्क से। जिस व्यक्ति का अवचेतन मस्तिष्क नकारात्मक तत्वों का भंडार बन चुका होता है, उसके विचार, शब्द और कर्म नकारात्मक होते हैं। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति का अवचेतन मस्तिष्क सकारात्मक तत्वों का भंडार बन चुका होता है, उसके विचार, शब्द और कर्म स्वस्थ और सकारात्मक होते हैं, क्योंकि उसने इसके लिए निरंतर प्रयास किया होता है।

सत्य की खोज एक सकारात्मक व्यक्तित्व की क्रिया है। सत्य की खोज की महान आकांक्षा उसी व्यक्तित्व में जागृत होती है जो सकारात्मक होता है। और अंततः केवल वही व्यक्ति सत्य तक पहुँचता है, जिसका चरित्र सकारात्मक और चिंतन सकारात्मक होता है।

Maulana Wahiduddin Khan
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