ख़ुद को भुला देना

हज के दौरान आराम और साज-सज्जा की चीज़ों से भी बचने को कहा गया है। हज की शुरुआत एहराम से होती है। एहराम एक सादा लिबास होता है—एक सफ़ेद तहमद और एक सफ़ेद चादर—जो हरम की हद में दाख़िल होते ही हर हाजी के लिए (और अहनाफ़ के मुताबिक़ ज़ियारत करने वाले के लिए भी) ज़रूरी हो जाता है। एहराम मानो एक तरह का फ़क़ीरों जैसा सादा लिबास है, जिसे काबा की ज़ियारत के लिए पहना जाता है।

यह निशानी के तौर पर पहली व्यवस्था है जिसके ज़रिये ख़ुदा अपने बंदों को यह एहसास दिलाता है कि सारे इंसान बराबर हैं। जिन बाहरी चीज़ों के आधार पर लोग एक-दूसरे पर घमंड करते हैं या किसी को ऊँचा-नीचा समझते हैं, वे सब ख़ुदा की नज़र में बिल्कुल बेकार हैं। ख़ुदा सबको एक ही नज़र से देखता है, जैसे हज के समय लाखों हाजी एक जैसा लिबास पहनकर एक समान दिखाई देते हैं। मानो हज का एहराम इस उसूल का जीता-जागता रूप है कि सभी इंसान बराबर हैं। जो लोग ख़ुदा के अच्छे बंदे बनना चाहते हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि वे हर तरह के दूसरे “लिबास” उतार दें और एक ख़ुदाई लिबास अपना लें।

रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा गया कि हाजी कौन है। आपने फ़रमायाबिखरे बाल और धूल में अटा हुआ आदमी” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 3243) इन अल्फ़ाज़ में असली हाजी की तारीफ़ बताई गई है। उलझे हुए बाल और गर्द से अटा हुआ जिस्म बा-मक़सद आदमी की पहचान है। जब कोई इंसान खुद को किसी खास काम के लिए समर्पित कर देता है, तो उसे सजने-सँवरने की फुर्सत नहीं रहती। हज में अपने इरादे से ऐसा सादा रूप अपनाने का हुक्म दरअसल मक़सद भरी ज़िंदगी जीने का एक ज़रूरी सबक़ है। इसका मतलब यह है कि इंसान ख़ुदा के मक़सद में अपने आप को इतना लगा दे कि उसे अपने बाहरी रूप को सँवारने की चिंता ही रहे। वह छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं को भूल जाए और बड़े मक़सद को पाने की लगन में अपनी निजी ज़रूरतों तक को पीछे छोड़ दे।

हज का हुक्म देते हुए क़ुरआन में कहा गया है: और तुम ज़ादेराह  (provision for travel) लो। बेहतरीन ज़ादेराह तक़्वा (अल्लाह का डर) है। और ऐ अक़्ल वालो! मुझसे डरो। (2:197)।

क़दीम अरब में यह समझा जाता था कि हज के लिए सफ़र का सामान लेकर निकलना दुनियादारी का काम है। जो शख़्स हज के लिए इस तरह निकले कि वह दुनिया का सामान लिए बिना हज के सफ़र पर चल पड़ा हो, वह पारसा और दींदार ख़याल किया जाता था। ऐसे लोग अपने बारे में कहते कि हम मुतवक्किल (अल्लाह पर भरोसा करने वाले) हैं (सहीह अल-बुखारी, हदीस संख्या 1523)। यानी हम ख़ुदा के सिवा किसी चीज़ पर भरोसा नहीं करते। मगर क़ुरआन में यह बताया गया कि इस क़िस्म की ज़ाहिरी नुमाइश का नाम दीनदारी नहीं है। दीनदारी का तअल्लुक़ दिल और ज़ेहन से है, न कि किसी क़िस्म के बाहरी मुज़ाहिरे से। आदमी को जिस चीज़ से बचना है वह यह है कि उसका दिल और उसका ज़ेहन ग़ैरुल्लाह की “हुब्बे शदीद” गहरी मुहब्बत (2:165) से खाली हो, न यह कि उसकी झोली में कोई खाने-पीने का सामान नज़र न आता  हो।

Maulana Wahiduddin Khan
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