हज एक तारीख़ साज़ (इतिहास बनाने वाला) अमल

हज की फ़ज़ीलत का एक ख़ास पहलू यह है कि हज का तअल्लुक़ एक अज़ीम ख़ुदाई मंसूबे से है। हज एक ऐसे ख़ुदाई मंसूबे की यादगार है जिसकी शुरुआत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के ज़माने में हुई और मुहम्मद (सल्ल०) के ज़माने में उसकी आख़िरी तकमील (completion) हुई।

हज के अलग-अलग मरासिम (विधियाँ) उसी खुदाई मंसूबे के मुख्तलिफ़ मरहले हैं जिनको हाजी अलामती (प्रतीकात्मक) तौर पर दोहराता है। हाजी अपने घर से निकलकर हिजाज़ (मक्का का इलाक़ा) के लिए रवाना होता है जिस तरह हज़रत इब्राहीम इराक़ से निकलकर हिजाज़ आए। वह मक्का के क़रीब पहुँचकर सिले हुए कपड़े उतार देता है और अपने जिस्म पर दो चादरें लपेट लेता है। यह उसी क़िस्म की सादा पोशाक है जो उस ज़माना में हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल की होती थी। हाजी मक्का पहुँचता है तो काबा के गिर्द चक्कर लगाता है। यह वही तवाफ़ है जो हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल ने खुदाई अह्द की तौसीक़ (पुष्टि) के लिए किया था। हाजी सफ़ा व मरवा के दरमियान सात बार सई करता है। यह हज़रत हाजरा की उस दौड़ की नक़ल है जो उन्होंने उस बंजर इलाक़े में पानी की तलाश के लिए की। हाजी मिना जाकर क़ुर्बानी करता है, यह उस क़ुर्बानी का अलामती इआदा (प्रतीकात्मक दोहराव) है जो हज़रत इब्राहीम ने पहले बेटे के लिए और उसके बाद ख़ुदा के हुक्म से मेंढ़े के लिए की थी। हाजी जमरात पर जाकर शैतान को कंकरियाँ मारता है। यह उस अमल की यादगार है जो हज़रत इब्राहीम ने शैतान की तरफ़ कंकरियाँ मारकर किया था जब कि उसने उन्हें बहकाने की कोशिश की। फिर तमाम हाजी अरफ़ात के मैदान में जमा होते हैं। यह उस अमल की आख़िरी सूरत है जो लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक की सूरत में हर हाजी की ज़ुबान से अदा होता है। यहाँ तमाम हाजी खुले मैदान में जमा होकर अपने अल्लाह से इज्तिमाई अहद (सामूहिक संकल्प) करते हैं कि वह वही करेंगे जिसका सबक़ उन्हें हज की सूरत में दिया गया है। वह उसी में जिएँगे जिसमें वह लोग जिए जिनकी यादगार में हज की इबादत अदा की जाती है।

हज के मनासिक (विधियों) को क़ुरआन में शआइर कहा गया है (5:2), यानी अलामती चीज़ें। यह सब दरअसल हज़रत इब्राहीम और उनके परिवार पर गुज़रने वाले वाक़िआत (घटनाएँ) हैं, जो ख़ुदाई मंसूबे की तकमील (completion) के दौरान पेश आए। इन वाक़िआत को हाजी अलामती तौर पर दोहराता है और इस तरह यह अहद करता है कि वह भी उसी तारीख़ का हिस्सा बनेगा।

हाजी मानो यह अहद करता है कि अगर ज़रूरत पेश आई तो वह अपनी दुनिया को उजाड़कर हक़ की तरफ़ बढ़ेगा। वह आराम व राहत को छोड़कर संतोष और सादगी पर अपने आप को राज़ी करेगा। वह अल्लाह के लिए दौड़ेगा और अल्लाह के इर्द-गिर्द घूमेगा। वह शैतानी बहकावे को “पत्थर मार कर” अपने से दूर भगाएगा। अल्लाह का दीन उसको जहाँ ले जाएगा वह वहाँ जाएगा। और जिस चीज़ का तक़ाज़ा करेगा उसको वह उसके हवाले कर देगा। वह अमल की ज़ुबान में अल्लाह से कहता है कि अगर दुबारा दीन के लिए ज़रूरत पेश आई तो वह उस आख़िरी हद तक जाने के लिए तैयार है कि अपनी औलाद को कुर्बान करके दीन की ज़रूरत पूरी करे।

हज़रत इब्राहीम का इराक़ से चलकर मक्का आना और यहाँ इन घटनाओं का होना एक बहुत बड़ा ख़ुदाई मंसूबा था, जो ढाई हज़ार साल में पूरा हुआ। इसका मतलब यह है कि क़रीब पाँच हज़ार साल पहले इंसानों के ज़ेहन पर शिर्क (बहुदेववाद) इतना छा गया था कि ज़िंदगी का कोई हिस्सा उससे खाली नहीं था। यह हालत पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही। नतीजा यह हुआ कि इंसानी नस्लों में शिर्क एक पक्का चलन बन गया। उस समय जो भी इंसान पैदा होता, वह शिर्क वाला ज़ेहन लेकर ही पैदा होता और उसी माहौल में उसकी पूरी परवरिश होती। इसी वजह से पैग़म्बरों की तौहीद की दावत लोगों के दिल को किसी तरह अपील नहीं करती थी।

आज का ज़माना घूमकर फिर उसी हालत में आ गया है, जहाँ वह हज़रत इब्राहीम के दौर में था। उस वक़्त पूरी दुनिया पर शिर्क का असर था, और आज पूरी दुनिया पर इल्हाद (नास्तिकता) का असर है। पहले के लोग बहुदेववादी सोच के साथ जीते थे, और आज का इंसान नास्तिक सोच के साथ जीता है।असल बात यह है कि आज का मसला वही है जो पहले था—बस फ़र्क़ इतना है कि पहले लोगों पर मुशरिकाना सोच हावी थी, और आज लोगों पर नास्तिक सोच हावी है। इस ज़ेहनी ढाँचे को तोड़ना ही आज इस्लाम का असली काम है। आज भी इस्लामी मुहिम उसी तरीक़े से आगे बढ़ेगी, जिस तरीक़े से पुराने ज़माने में बढ़ी थी।

अब फिर कुछ लोगों को बड़े मकसद के लिए त्याग और समर्पण का रास्ता अपनाना होगा। अब फिर कुछ लोगों को अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए मुश्किल हालात में भी धैर्य, हिम्मत और अच्छे आचरण की मिसाल बनना होगा, ताकि जीवन की अच्छी परंपराएँ फिर से ज़िंदा हो सकें। पहले भी सत्य और नैतिकता को कायम करने के लिए एक पीढ़ी को बड़ा त्याग करना पड़ा था। आज नास्तिक सोच और नैतिक गिरावट के इस दौर में फिर ऐसी पीढ़ी की ज़रूरत है, जो अपने जीवन को ऊँचे मूल्यों के लिए समर्पित करे। यही हज का सबसे बड़ा संदेश है। आज सच्चा और सार्थक हज उसी का है, जो हज के बाद यह संकल्प लेकर वापस आए कि वह अपनी ज़िंदगी को शांति, नैतिकता, धैर्य और इंसानियत की भलाई के लिए समर्पित करेगा।

हक़ीक़त यह है कि हज से फ़ारिग़ होने के बाद हाजी का काम ख़त्म नहीं हो जाता, हज से फ़ारिग़ होने के बाद हाजी का असल काम शुरू होता है। हज के सफ़र से वापसी एक नए और ज़्यादा अहम सफ़र की शरुआत है।

हाजी हज की रस्मों के दौरान बार-बार लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक (हाज़िर हूँ, ऐ अल्लाह, मैं हाज़िर हूँ) कहता है। यह अहद-नामे (प्रतिज्ञा-पत्र) के अल्फ़ाज़ हैं। हज ख़ुदा और बंदे के बीच एक अहद है। अहद हमेशा आग़ाज़ (आरंभ) होता है, वह इख़्तिताम (समापन) नहीं होता। यही हज की इबादत का मामला है। जो शख़्स हज की रस्मों को अदा करके वापस आता है, वह जैसे ख़ुदा से एक पवित्र अहद (प्रतिज्ञा) करके वापस आता है। वापस आने के बाद उसे मुतमइन होकर बैठ नहीं जाना है, बल्कि अपने हालात और सलाहियत के एतबार से वह काम शुरू कर देना है, जिसका वह अपने रब से अहद करके वापस आया है।

हज से लौटना मक़ाम-ए-अहद (प्रतिज्ञा स्थल) से निकलकर मक़ाम-ए-अमल (कर्म स्थल) की तरफ़ लौटना है। हज के बाद आदमी की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं, हज के बाद आदमी की ज़िम्मेदारियाँ खत्म नहीं होतीं।

हज का अहद-नामा क्या है। यह एक तारीख़ को दोहराने का संकल्प है। हज तारीख़-ए-इब्राहीमी को दोबारा लाने का इकरार है। हज़रत इब्राहीम ने जब देखा कि इराक़ के सभ्य लोग तौहीद और आख़िरत की बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उन्होंने अपने अमल का एक नया नक्शा बनाया। उन्होंने अपने आप को और अपनी औलाद को क़ुर्बानी के कड़े मरहले से गुज़ारकर एक नई ज़िंदा नस्ल पैदा की। उन्होंने दीन का पैग़ाम लोगों तक पहुँचाने को अपने लिए एक बड़ा और ऊंचा मक़सद बना लिया। इसके लिए उन्होंने वह सब कुछ किया, जिसका यह मक़सद उनसे मुतालबा कर रहा था।

हज़रत इब्राहीम के दौर में जिस तरह शिर्क का पूरी दुनिया पर ग़लबा (वर्चस्व) था, उसी तरह आज इल्हाद (नास्तिकता) का ग़लबा है। अब जो लोग हज से लौटें, उनका काम यह होना चाहिए कि इस नास्तिकता के असर को खत्म करने और तौहीद का दौर फिर से लाने के लिए वे शांतिपूर्ण इब्राहीमी सुन्नत को ज़िंदा करें। वे इब्राहीमी मिशन को दोबारा ज़िंदा करें और इस मक़सद के लिए हालात जो भी उनसे मांग करें, उसमें अपना पूरा योगदान दें। वे प्रतीकात्मक क़ुर्बानी को अपनी असल ज़िंदगी में सच्ची क़ुर्बानी से बदल दें।

हज एक तारीख़ के दोहराव का संकल्प है। हज के दिनों में आलामती रस्मों की सूरत में और हज के बाद हक़ीक़ी ज़िंदगी में योजनाबद्ध कार्य की सूरत में।

Maulana Wahiduddin Khan
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