हज एक ज़िंदा अमल
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने 10 हिजरी में आख़िरी हज अदा फ़रमाया। इस मौक़े पर एक लाख से ज़्यादा मुसलमानों की मौजूदगी में आपने 9 ज़िलहिज्जा को मैदान-ए-अरफ़ात में एक मुफस्सल (विस्तृत) ख़ुत्बा दिया जो ख़ुत्बा-ए-हजतुल विदा के नाम से मशहूर है। आपके इस हज को हज्जतुल बलाग़ भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें आपने इस्लाम की तमाम बुनियादी शिक्षाओं को मुसलमानों तक पहुँचाकर उनसे उसका अहद लिया था। इसी लिये ख़ुत्बा के आख़िर में ये अल्फ़ाज़ आते हैं:
“ख़बरदार, जो मौजूद हैं वे मेरी बात को जो मौजूद नहीं हैं उन तक पहुँचा दें। क्योंकि पहुँचाए जाने वाले अक्सर सुनने वालों से ज़्यादा महफ़ूज़ रखने वाले होते हैं। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1741) और तुमसे मेरे बारे में पूछा जाएगा, फिर तुम क्या जवाब दोगे। लोगों ने कहा हम गवाही देते हैं कि आपने अमानत अदा कर दी और पैग़ाम पहुँचा दिया और ख़ैरख़्वाही का हक़ अदा कर दिया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अपनी उंगली आसमान की तरफ़ उठाई और फिर लोगों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, ऐ अल्लाह तू गवाह रह, ऐ अल्लाह तू गवाह रह। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1218)
नतीजा यह हुआ कि आपकी वफ़ात के सिर्फ़ पचास साल के अंदर इस्लाम उस समय की जानी-पहचानी दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुँच गया।
इस वाक़िये के क़रीब दो महीने बाद रसूलुल्लाह (सल्ल०) का इंतिक़ाल हो गया। उस समय तक इस्लाम सिर्फ़ अरब के इलाक़े तक ही फैला था। आपकी वफ़ात के बाद आपके सहाबा अरब से बाहर निकले और उन्होंने इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाना अपनी ज़िन्दगी का मक़सद बना लिया। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी और सारी पूँजी दीन की तालीम को लोगों तक पहुँचाने में लगा दी।
अब भी हज बाक़ायदा अदा किया जाता है और “हजतुल बलाग़” से ज़्यादा बड़े मजमे को ख़िताब करते हुए हज के इमाम हर साल उसी क़िस्म की बातें दोहराते हैं जो पैग़म्बर (सल्ल०) ने चौदह सौ साल पहले कही थीं। मगर आज इन बातों का कोई नतीजा नहीं निकलता। इस फ़र्क की वजह क्या है। इसकी वजह यह है कि पहले हज एक ज़िंदा अमल था, आज वह एक रिवायती अमल बन गया है। पैग़म्बर (सल्ल०) ने हज के मौक़े पर जिन लोगों को ख़िताब किया था वे इस इरादा और अज़्म के साथ वहाँ जमा हुए थे कि उन्हें जो हिदायत भी दी जाएगी उसे वह पूरा करेंगे। इसके उलट, आज हाजियों की भीड़ मक्का और मदीना में सिर्फ़ इस लिए जाती है कि वह हज के नाम पर कुछ रस्में अदा करके वापस आ जाए। और जिस हाल में पहले थी उसी हाल में दोबारा रहने लगे।
इससे मालूम हुआ कि हज को एक असरदार अमल की हैसियत से ज़िंदा करने का काम सबसे पहले “हाजियों” को ज़िंदा करने का काम है। जब तक हाजियों, दूसरे लफ़्ज़ों में मुसलमानों में शऊर को न जगाया जाए, हज की इबादत उसी तरह बेअसर रहेगी, जैसे एक ख़राब बंदूक जिसका ट्रिगर दबा दिया जाए, इसके बावजूद वह फायर न करे।
