ईमान और आत्मचिंतन
(Introspection)

हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया, जिसने ईमान और आत्मचिंतन के साथ रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। और जिसने रमज़ान के महीने में ईमान और आत्मचिंतन के साथ क़ियाम--लैल (रात की नमाज़) किया, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। और जिसने शब--क़द्र में ईमान और आत्मचिंतन के साथ क़ियाम (इबादत) किया, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2009, 2014)

इस हदीस में रमज़ान की तीन इबादतों का उल्लेख किया गया है, और तीनों के साथईमानऔरएहतिसाबके शब्द आए हैं। ईमान का अर्थ है अल्लाह पर समझ-बूझ के साथ पूर्ण विश्वास रखना, और एहतिसाब का अर्थ है केवल अल्लाह को राज़ी करने और उसी से प्रतिफल की उम्मीद रखते हुए अमल करना। दूसरे शब्दों में, रोज़ा और अन्य इबादतें केवल उनके बाहरी रूप (form) तक सीमित रहें, बल्कि उन्हें उनकी सच्ची रूह (spirit) के साथ अदा किया जाए।

ईमान और एहतिसाब के साथ अदा किया जाने वाला यह रोज़ा और यह इबादत वह है जिसमें बंदा मानो आँसुओं से वुज़ू करता है, जिसमें भूख का मतलब यह होता है कि इंसान ने अपने और अल्लाह के बीच से हर दूसरी चीज़ हटा दी है, जिसमें रुकू और सज्दा अल्लाह की मौजूदगी (presence of God) का अनुभव बन जाता है, जिसमें इंसान इलहामी अल्फ़ाज़ (अल्लाह द्वारा प्रेरित शब्द) में दुआ करने लगता है। जो व्यक्ति इन ऊँची रब्बानी कैफ़ियतों (अल्लाह की अनुभूतियों) के साथ रोज़े और इबादत का अनुभव करता है, वही वह इंसान है जो रमज़ान के महीने से इस तरह निकलता है कि उसके सारे गुनाह माफ़ हो चुके होते हैं।

Maulana Wahiduddin Khan
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