बनावटी इज़्ज़त और दिखावटी सम्मान
इस्लाम का तरीक़ा नहीं
अनस बिन मालिक (रज़ि०) कहते हैं—हमारे लिए अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से बढ़कर कोई प्रिय न था। लेकिन जब वे हमारे पास आते तो हम उनके लिए खड़े नहीं होते थे, क्योंकि हम जानते थे कि उन्हें यह पसंद नहीं था। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस सं० 2754)
आवश्यकता से अधिक चीज़ों की
आदत मत डालो
अब्दुल्लाह बिन शरीक अपने दादा से बयान करते हैं—अली बिन अबी तालिब (रज़ि०) के लिए फ़ालूदा लाया गया और उनके सामने रखा गया। उन्होंने कहा—तेरी खुशबू अच्छी है, तेरा रंग भी अच्छा है और तेरा स्वाद भी अच्छा है। लेकिन मैं यह पसंद नहीं करता कि मैं अपने आप को उस चीज़ का आदी बना लूं जिसका आदी मैं नहीं हूँ। (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 81)
घमंड की मानसिकता में पड़ने वाला अल्लाह
की रहमत (दया) से दूर हो जाता है
अबू नुऐम ने आयशा (रज़ि०) से बयान किया—वे कहती हैं कि एक बार मैंने नया कुर्ता पहना। मैं उसे देखती थी और खुश होती थी। अबू बक्र (रज़ि०) ने कहा—“तुम क्या देख रही हो? अल्लाह तुम्हारी ओर देखने वाला नहीं।” मैंने पूछा—क्यों? उन्होंने कहा—“क्या तुम्हें मालूम नहीं कि जब बंदे के दिल में दुनिया की सज्जा से घमंड पैदा होता है तो उसका रब उस पर नाराज़ हो जाता है, जब तक कि वह बंदा उस ज़ीनत (सज्जा) को छोड़ न दे।” आयशा (रज़ि०) कहती हैं—मैंने वह कुर्ता उतारा और उसे सदक़ा कर दिया। अबू बक्र (रज़ि०) ने कहा—“शायद तुम्हारा यह सदक़ा तुम्हारे लिए प्रायश्चित बन जाए।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 37)
ग़ुस्से पर क़ाबू पाना सबसे बड़ी बहादुरी है
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) कहते हैं—अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया—“तुम लोग किसे पहलवान समझते हो?” लोगों ने कहा—“वह जो दूसरों को कुश्ती में पछाड़ दे।” उन्होंने फ़रमाया—“नहीं, बल्कि पहलवान वह है जो ग़ुस्से के समय अपने आप को क़ाबू में रखे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संखया 107)
हर हाल में अल्लाह का बंदा बनकर रहना
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) कहते हैं कि ग़ज़वा-ए-बद्र के सफ़र में तीन-तीन आदमी के बीच एक ऊँट था। सब बारी-बारी सवार होते थे। यही हाल रसूलुल्लाह (सल्ल०) का था। आपके साथ अबू लुबाबा (रज़ि०) और अली बिन अबी तालिब (रज़ि०) थे। दोनों ने कहा—“आप सवार रहिए, हम आपकी जगह पैदल चलेंगे।” आपने फ़रमाया—“तुम दोनों मुझसे ज़्यादा ताक़तवर नहीं हो, और न ही मुझे तुमसे कम सवाब की ज़रूरत है।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 3965)
तक़ल्लुफ़ (लिहाज़) से ज़्यादा
ज़रूरत का ख्याल रखना
हिजरत के बाद जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) मदीना आए तो अबू अय्यूब अंसारी (रज़ि०) के घर ठहरे। घर के ऊपर एक कमरा था। रसूलुल्लाह (सल्ल०) नीचे रुके और अबू अय्यूब अपने परिवार के साथ ऊपर रहे। उन्हें यह अच्छा नहीं लगा कि रसूल (सल्ल०) नीचे हों और वे ऊपर। उन्होंने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल! आप ऊपर ठहरिए, हम नीचे रहेंगे।” आपने कहा: “इसकी फ़िक्र मत करो। मेरे लिए नीचे रहना बेहतर है, क्योंकि लोगों को मिलने में आसानी होगी।” (सीरत इब्न हिशाम, खण्ड 2, पृष्ठ 104)
जानवरों पर रहम
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) कहते हैं: हम सफ़र में रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ थे। एक जगह डेरा डाला। वहाँ एक चिड़िया थी, उसके दो बच्चे थे। हमने बच्चों को पकड़ लिया। चिड़िया चीखने और पंख फड़फड़ाने लगी। रसूलुल्लाह (सल्ल०) को पता चला तो आपने कहा: “किसने इस चिड़िया को तकलीफ़ दी है? इसके बच्चे इसे लौटा दो।” इसी तरह आपने देखा कि किसी ने चींटियों का घर जला दिया है। आपने पूछा: “किसने जलाया?” हमने कहा: “हमने।” आपने फ़रमाया: “आग से सज़ा देना सिर्फ़ आग को बनाने वाले रब का काम है।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2675)
किसी खाने को छोटा या तुच्छ न समझो
जाबिर (रज़ि०) के घर मेहमान आए। उन्होंने रोटी और सिरका लाकर कहा: “इसे खाओ, मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को कहते सुना है—सिरका बहुत अच्छा सालन है।” और आपने कहा: “उस क़ौम के लिए बर्बादी है जो सामने रखी चीज़ को छोटा या तुच्छ समझे।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 9162)
घमंड अल्लाह को पसंद नहीं
आयशा (रज़ि०) कहती हैं: मेरे पास एक ग़रीब औरत आई। उसके पास थोड़ी सी चीज़ थी जो वह मुझे देना चाहती थी। मुझे रहम आया और मैंने लेना पसंद न किया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “तुम उसका तोहफ़ा ले लेतीं और बदले में कुछ दे देतीं। लगता है तुमने उसे छोटा समझा। ऐ आयशा! विनम्रता अपनाओ। अल्लाह विनम्र लोगों को पसंद करता है और घमंडी लोगों से नफ़रत करता है।” (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल असफ़िया, खण्ड 4, पृष्ठ 204)
दिखावे के लिए दावत करना पसंद नहीं
उमर और उस्मान (रज़ि०) को एक दावत में बुलाया गया। दोनों जाने लगे तो उमर (रज़ि०) ने कहा: “मैं चल तो रहा हूँ लेकिन अच्छा होता कि न जाता।” उस्मान (रज़ि०) ने पूछा: “क्यों?” उमर (रज़ि०) ने कहा: “डर है कि यह दावत दिखावे और फ़ख्र के लिए न की गई हो।” (अहादीस अफ्फ़ान बिन मुस्लिम, हदीस संख्या 192)
विनम्रता से बुलंदी मिलती है
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “सदक़ा देने से माल कम नहीं होता। माफ़ करने से इज़्ज़त बढ़ती है। और जो अल्लाह के लिए विनम्र रहता है, उसका दर्जा अल्लाह बुलंद करता है।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2588)
रसूलुल्लाह ने अपना हाथ चूमने की
इजाज़त न दी
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने एक दुकानदार से कपड़ा ख़रीदा। जब उठे तो दुकानदार ने आपका हाथ चूमना चाहा। आपने हाथ खींच लिया और कहा: “यह काम दुसरे (ग़ैर-अरब) लोग अपने बादशाहों के साथ करते हैं। मैं बादशाह नहीं, मैं तुम में से ही एक आदमी हूँ।” (अल-मोजम अल-औसत, अल-तबरानी, हादिस संख्या 6594)
सच्चाई को न मानना घमंड है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) के सामने घमंड का ज़िक्र हुआ। आपने कहा: “अल्लाह घमंडी और शेख़ीबाज़ को पसंद नहीं करता।” एक आदमी ने कहा: “मुझे साफ़ कपड़े, अच्छे जूते और बढ़िया चीज़ें पसंद हैं।” आपने कहा: “यह घमंड नहीं। असली घमंड है –सच्चाई को न मानना और लोगों को छोटा समझना।” (अल-मोजम अल-औसत, अल-तबरानी, हादिस संख्या 1317)
लोगों के बीच बिना फ़र्क किए बैठना
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) मेरे घर आए। मैंने चमड़े का तकिया रखा। आप ज़मीन पर बैठ गए और तकिया मेरे और आपके बीच रखा रहा। (सहीह इब्न हिब्बान, हदीस संख्या 3640)
साधारण आदमी की बात भी ध्यान से सुनना
अबू रिफ़ाआ (रज़ि०) कहते हैं: मैं अपने वतन से रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया। उस वक़्त आप ख़ुत्बा दे रहे थे। मैंने कहा: “ऐ रसूलुल्लाह, मैं मुसाफ़िर हूँ और मुझे दीन नहीं पता।” आप मेरी तरफ़ आए, ख़ुत्बा छोड़ दिया, बैठकर मुझे दीन समझाया, फिर वापस जाकर ख़ुत्बा पूरा किया। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 876)
बड़ों के आगे चलना गुस्ताख़ी नहीं
अनस (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ऊँटनी “अज़्बा” थी। कोई ऊँट उससे आगे न जाता था। एक देहाती अपनी छोटी ऊँटनी पर आया और उसकी ऊँटनी आगे निकल गई। मुसलमानों को बुरा लगा। रसूलुल्लाह (सल्ल०) को इसका पता चला तो आपने कहा: “अल्लाह ने अपने ज़िम्मे ले लिया है कि दुनिया में जो भी चीज़ बहुत ऊँची हो जाएगी, उसे वह नीचा करेगा।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6501)
जो खुद को छोटा समझे वही अल्लाह
के निकट बड़ा है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “जो अल्लाह के लिए तवाज़ो (विनम्रता) करता है, अल्लाह उसे बुलंद करता है। वह अपने दिल में खुद को छोटा समझता है, मगर लोगों के बीच बड़ा होता है।” (सहीह इब्न हिब्बान, हदीस संख्या 5678)
मध्यम दर्जे का कपड़ा पहनो
हज़रत वक़दान ताबिई कहते हैं कि मैंने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से सुना। किसी ने उनसे पूछा—“मैं किस तरह का कपड़ा पहनूँ?” उन्होंने कहा—“ऐसा कपड़ा पहनो कि नादान लोग तुम्हारी बेइज्ज़ती न करें और समझदार लोग तुम्हें बुरा न कहें।” उस आदमी ने पूछा—“वह कौन-सा कपड़ा होगा?” उन्होंने कहा—“जिसकी क़ीमत पाँच से दस दिरहम के बीच हो।” (हिल्यातुल औलिया व तबक़ातुल-अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 302)
खाना हमेशा अपने पास वाली प्लेट से खाना
हज़रत अम्र बिन अबी सलमा बताते हैं कि एक दिन मैं अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के साथ खाना खा रहा था। मैं थाली में इधर-उधर हाथ डालकर गोश्त ले रहा था। यह देखकर अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने कहा—“जो तुम्हारे पास है, उसी से खाओ।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 5377)
अल्लाह अपने नबी से किस चीज़
पर राज़ी हुआ
हज़रत अता ख़ुरासानी ताबेई कहते हैं—मैंने रसूल (सल्ल०) की बीवियों के घर देखे हैं। वे खजूर की टहनियों से बने हुए थे। दरवाज़ों पर टाट के परदे लगे थे जो काले बालों से बने होते थे। फिर ख़लीफ़ा वलीद बिन अब्दुल मलिक ने मदीना के हाकिम को हुक्म भेजा कि मस्जिद-ए-नबवी का नया निर्माण किया जाए, और रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बीवियों के कमरे तोड़कर मस्जिद में शामिल कर दिए जाएँ। यह सुनकर मदीना के बहुत से लोग रो पड़े। हज़रत अबू उमामा अंसारी ने कहा—“काश ये कमरे ऐसे ही रहने दिए जाते और न गिराए जाते, ताकि लोग ऊँची-ऊँची इमारतें बनाने से बचते। और वे देख लेते कि अल्लाह अपने नबी से किस चीज़ पर राज़ी था, जबकि दुनियावी खज़ानों की चाबियाँ उन्हीं के पास थीं।” (अल-तबक़ात अल-कुबरा, खण्ड 1, पृष्ठ 388)
बेटी के निकाह के लिए गरीब
दीनदार को पसंद करना
हज़रत अबू दर्दा अंसारी की एक गुणवान बेटी थी, जिसका नाम दर्दा था। यज़ीद बिन मुआविया ने उससे निकाह का संदेश भेजा, लेकिन अबू दर्दा ने इंकार कर दिया। उसके बाद एक साधारण मुसलमान ने निकाह का प्रस्ताव रखा। अबू दर्दा ने उसे स्वीकार कर लिया और अपनी बेटी का निकाह उससे कर दिया।
लोगों में बातें होने लगीं कि अमीर मुआविया के बेटे का रिश्ता अबू दर्दा ने ठुकरा दिया, लेकिन एक कमज़ोर मुसलमान का रिश्ता मंज़ूर कर लिया और बेटी उससे ब्याह दी। जब अबू दर्दा ने यह सुना तो कहा:
“मैंने इस रिश्ते में दर्दा का भला देखा। सोचो ज़रा, जब उसके सिरहाने नौकरों की लाइन लगी होती और वह ख़ुद को ऐसे घर में पाती जो चमक-दमक से भरा होता, तो उस वक़्त उसका दीन कहाँ रह पाता?” (सीरत खम्सीन सहाबी, खण्ड 1, पृष्ठ 19)
सुख का राज़ है संतोष
हज़रत सअद ने अपने बेटे से कहा: “बेटा, जब भी धन चाहो तो संतोष के साथ चाहो। क्योंकि जिसके अंदर संतोष न हो, उसके लिए धन कभी काफ़ी नहीं होता।” (तारिख़ दमिश्क़, इब्न असाकिर, खण्ड 8, पृष्ठ 363)
हर आदमी या तो जन्नत की तरफ़
जा रहा है या जहन्नम की तरफ़
मुस्लिम बिन बशीर बताते हैं कि हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) अपनी बीमारी के दिनों में रो पड़े। किसी ने उनसे पूछा:
“ऐ अबू हुरैरा, आप क्यों रो रहे हैं?” उन्होंने कहा,
“मैं तुम्हारी इस दुनिया के लिए नहीं रो रहा। मैं इसलिए रो रहा हूँ कि मेरी अगली दुनिया का सफ़र बहुत लंबा है और सफ़र का सामान बहुत कम है। मैं एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हूँ जहाँ से रास्ता या तो जन्नत की ओर जाता है या जहन्नम की ओर। मुझे नहीं पता कि मुझे किस रास्ते पर ले जाया जाएगा।” (तारिख दमिश्क़, इब्न असाकिर, खण्ड 67, पृष्ठ 383)
लोगों के बीच विनम्र बन कर रहो
हज़रत अयाज़ बिन हिमार (रज़ि०) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया:
“अल्लाह ने मुझे यह हुक्म दिया है कि तुम सब विनम्र बनो। न कोई किसी पर घमंड करे और न ही कोई किसी पर ज़ुल्म करे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2865)
