कमाने वाला खुद को बड़ा न समझे
अनस (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़माने में दो भाई थे। एक भाई हर वक्त आपके पास आया करता था और दूसरा घर चलाने के लिए कमाता था। कमाने वाले भाई ने शिकायत की: “मेरा भाई काम नहीं करता, मुझे ही सब कमाना पड़ता है।” आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: हो सकता है तुम्हें रोज़ी उसी की वजह से मिल रही हो। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2345)
किसी की मदद करना बहुत
बड़ी इबादत है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) मदीना की मस्जिद में एतिकाफ़ में थे। उनके पास एक आदमी आया, उसके चेहरे पर चिंता देख कर उन्होंने पूछा: “क्या बात है?” उसने कहा: “एक आदमी का क़र्ज़ मुझ पर है, मैं चुका नहीं सकता।” इब्न अब्बास (रज़ि०) ने कहा: “क्या मैं तेरे क़र्ज़दार से बात करूँ?” वह बोला: “हाँ।” आप फ़ौरन मस्जिद से निकल पड़े। आदमी ने कहा: “आप भूल गए, आप तो एतिकाफ़ में हैं?” उन्होंने कहा: “नहीं, मैं भूला नहीं हूँ। मैंने खुद रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना है—जो अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने के लिए कोशिश करे, उसका ये काम दस साल एतिकाफ़ से बेहतर है।” (शुअब अल-ईमान, हदीस संख्या 3679)
अल्लाह पर भरोसा सबसे
बड़ी ताक़त
कुछ बुजुर्गों ने कहा है: जो सबसे ताक़तवर बनना चाहता है, उसे अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। (नवादिरुल उसूल, खंड 1, पृष्ठ 190)
ईमानदारी से साझेदारी (partnership)
करने वालों का साथी अल्लाह है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: अल्लाह कहता है—जब दो लोग मिलकर काम करते हैं तो मैं उनका तीसरा होता हूँ, जब तक वे धोखा न करें। अगर कोई धोखा करता है तो मैं बीच से हट जाता हूँ और फिर शैतान आ जाता है। (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 3383)
ज़रूरतमंद की आवाज़ हाकिम तक पहुँचाना
अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: जिसने किसी हाकिम तक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत पहुँचा दी, जो खुद नहीं पहुँचा सकता था, अल्लाह उसे क़ियामत के दिन पुल-सिरात पर मज़बूत क़दमों से चलाएगा, जब बाक़ी लोगों के क़दम लड़खड़ा रहे होंगे। (तफ़्सीर इब्न कसीर, खंड 7, पृष्ठ 287)
देने वाले को और दिया जाता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने एक हदीस-ए-कुदसी बयान की: अल्लाह कहता है—ऐ इंसान, तुम खर्च करो, तुम्हारे ऊपर खर्च किया जाएगा। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 5352)
सबसे ज़्यादा ज़रूरत के
वक़्त सबसे बेसहारा
हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा: “कल रात मैंने एक आयत पढ़ी जिसने मुझे सारी रात सोने नहीं दिया—“क्या तुममें से कोई चाहता है कि उसके पास खजूर और अंगूर का बाग़ हो... (क़ुरआन 2:266)”
उन्होंने लोगों से पूछा: “इसका मतलब क्या है?” किसी ने कहा: “ये तो बस खजूर और अंगूर की मिसाल है।” किसी ने कहा: “ये रहस्यमयी आयत है, अल्लाह ही जानता है।” अब्दुल्लाह इब्न मसऊद (रज़ि०) भी वहाँ थे। वे धीरे-धीरे कुछ कह रहे थे। उमर (रज़ि०) ने कहा: “भतीजे! साफ़-साफ़ कहो, खुद को छोटा मत समझो।” उन्होंने कहा: “इससे अमल (कर्म) की ओर इशारा है।” उमर (रज़ि०) ने पूछा: “कैसे?” उन्होंने कहा: “ये बात मेरे दिल में आई और मैंने कह दी।” उमर (रज़ि०) ने कहा: “भतीजे! तूने सही कहा।”
इस आयत में जो मिसाल दी गई है, उसका मतलब है इंसान का अपना कर्म (अमल)।
इंसान को बाग़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत तब पड़ती है जब उसकी उम्र ढल चुकी हो और बच्चे ज़्यादा हों। और इंसान को अपने कर्म की सबसे ज़्यादा ज़रूरत क़ियामत के दिन होगी। (कंज़ुल-उम्माल, हदीस संख्या 4228)
सबसे बड़ा दान वही है जो सबसे
कमज़ोर को दिया जाए
हज़रत सुराक़ा बिन मालिक कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने मुझसे कहा—“क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि सबसे बड़ा दान कौन-सा है?” उन्होंने कहा, “हाँ ज़रूर बताइए।” आप (सल्ल०) ने कहा—“अपनी उस लड़की का ख्याल रखना जो (विधवा या तलाक़ होने की वजह से) तुम्हारे पास वापस आ जाए और जिसके लिए कमाने वाला तुम्हारे अलावा कोई न हो।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 17586)
दुनिया को मामूली समझना
सबसे बड़ी अक़्लमंदी है।
इमाम शाफ़ेई कहते हैं: “अगर कोई आदमी यह वसीयत कर दे कि मेरे मरने के बाद मेरा माल सबसे अक़्लमंद इंसान को दे दिया जाए, तो उसका माल उस व्यक्ति को देना चाहिए जो दुनिया की मोह-माया से सबसे ज़्यादा बेपरवाह हो। क्योंकि असली अक़्लमंदी यही है कि इंसान दुनिया को मामूली समझे।” (शरह मुस्नद अश-शाफ़ेई, खण्ड 1, पृष्ठ 20)
मेहनत की कमाई सबसे अच्छी कमाई है
हज़रत मिक़दाम रज़ि. कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने कहा—
“इंसान के लिए सबसे अच्छा खाना वही है जो वो अपने हाथ की मेहनत से कमाकर खाए। अल्लाह के नबी दाऊद (अलैहिस्सलाम) भी अपनी मेहनत से कमाकर खाते थे।”
(सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2072)
पेशा (रोज़गार) कोई बुरी चीज़ नहीं है
हज़रत अबू हुरैरा रज़ि. कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने कहा—
“ज़करिया (अलैहिस्सलाम) बढ़ई का काम करते थे।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 7947)
नसीहत आम तौर पर
आइशा (रज़ि०) कहती हैं—जब रसूल (सल्ल०) को किसी की बात बुरी लगती, तो वे सीधे यह नहीं कहते कि “फलाँ आदमी ने ऐसा कहा है” बल्कि आप यूं कहते थे, “लोगों को क्या हो गया है कि वे ऐसा कहते या करते हैं।” इस तरह आप बात को सामान्य रूप में समझाते और किसी का नाम नहीं लेते थे। (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 4788)
खुली सच्चाई लोगों को सहन नहीं होती
जब पहली वह्य (खुदाई संदेश) उतरी तो रसूल (सल्ल०) डरे हुए घर लौटे और ख़दीजा (रज़ि०) से कहा—“मुझे लगा जैसे मेरी जान निकल जाएगी।” ख़दीजा (रज़ि०) आपको अपने चचेरे भाई वरक़ा बिन नौफ़ल के पास ले गईं। वरक़ा ईसाई थे और आसमानी किताबों का ज्ञान रखते थे। आपकी बात सुनकर वरक़ा ने कहा—“उस ख़ुदा की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, आप इस उम्मत के नबी हैं। वही फ़रिश्ता आपके पास आया है जो मूसा के पास आया था। आपकी क़ौम आपको झुटलाएगी, तकलीफ़ देगी, वतन से निकालेगी और आप से लड़ेगी।” रसूल (सल्ल०) ने कहा—“क्या सचमुच वे मुझे निकाल देंगे?”
वरक़ा ने जवाब दिया—“हाँ, क्योंकि जब भी कोई यह संदेश लेकर आया लोग उसके दुश्मन हो गए और लड़ाई की।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 4953)
अच्छी बात बताना सबसे बड़ा तोहफ़ा है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—”कोई अपने भाई को इससे अच्छा तोहफ़ा नहीं दे सकता कि उसने कोई अच्छी बात सुनी और अपने भाई तक पहुँचा दी।” (जामे बयानुल इल्म व फज़्लिही, खंड 1, पृष्ठ 190)
