अल्लाह की नेमतें (अनुग्रह) बेहिसाब हैं
इब्न असाकिर ने अबू दर्दा (रज़ि०) का एक कथन बयान किया है। उन्होंने कहा: “जिसने यह न समझा कि खाने-पीने के अलावा भी उस पर अल्लाह की नेमतें हैं, उसकी समझ बहुत कम है और उसके लिए आज़ाब (सज़ा) तैयार है।” (अज़-ज़ुह्द, अबू दाऊद, हदीस संख्या 210)
अल्लाह से रिश्ता रूह (आत्मा) की खुराक है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: “मैं ऐसी हालत में रात गुज़ारता हूँ कि एक खिलाने वाला मुझे खिलाता है और एक पिलाने वाला मुझे पिलाता है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1963)
हर हाल में अल्लाह से डरते रहो
ज़ह्हाक से रिवायत कि ख़लीफ़ा उमर बिन ख़त्ताब (रज़ि०) ने अबू मूसा अशअरी को एक ख़त में नसीहत करते हुए लिखा:
“अल्लाह से डरते रहो। अल्लाह की किताब को सीखो, क्योंकि वही इल्म का असली स्रोत है और दिलों के लिए बहार की तरह ताज़गी देने वाली है।” (अल-मुसन्नफ़, इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 36443)
अल्लाह की रहमतों की कोई हद (सीमा) नहीं
हज़रत अली (रज़ि०) कहते हैं: “अल्लाह ऐसा नहीं करता कि किसी बंदे पर शुक्र का दरवाज़ा खोले और बढ़ोतरी का दरवाज़ा बंद कर दे, न ऐसा करता है कि दुआ का दरवाज़ा खोले और क़ुबूलियत (स्वीकृति) का दरवाज़ा बंद कर दे और न ऐसा करता है कि तौबा का दरवाज़ा खोले और मग़फ़िरत (क्षमा) का दरवाज़ा बंद कर दे।” (नहजुल बलाग़ह, खंड 4, पृष्ठ 102)
जो कुछ होता है, अल्लाह की तरफ़ से होता है
हज़रत अली (रज़ि०) से कहा गया: “क्या हम आपकी पहरेदारी न करें?” उन्होंने कहा:
“इंसान की क़िस्मत ही उसकी पहरेदारी करती है।” (अल-तबक़ात अल-कुबरा, खण्ड 3, पृष्ठ 32)
एक और रिवायत में उन्होंने कहा:
“इंसान ईमान का स्वाद तब तक नहीं पाता जब तक यह न जान ले कि जो कुछ उस पर गुज़रा वह उससे टलने वाला न था, और जो कुछ उस पर नहीं गुज़रा वह उस पर आने वाला न था।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 1564)
एक मामूली चीज़ भी बहुत बड़ी नेमत है
हज़रत आयशा (रज़ि०) का कथन है: “जब कोई बंदा सादा पानी पिये और वह बिना तकलीफ़ के अंदर जाए और बिना तकलीफ़ के बाहर निकले तो उस पर अल्लाह का शुक्र अदा करना अनिवार्य है।” (किताबुश-शुक्र, इब्न अबिद्दुनिया, हदीस संख्या 192)
इस्लाम इसलिए है कि इंसान उसके साथ जिये
हुमैद बिन अब्दुर्रहमान बिन औफ़ कहते हैं कि एक आदमी रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया और कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल, मुझे कोई ऐसी बात बताएं जिसके साथ मैं ज़िन्दगी गुज़ारूँ, और ज़्यादा न कहिए कि मैं भूल जाऊँ।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: “ग़ुस्सा मत करो।” (मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस संख्या 11)
अल्लाह से इस हाल में मिलो कि
किसी का बोझ तुम पर न हो
एक व्यक्ति ने अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) को लिखा कि वे उसे बताएँ कि असली ज्ञान क्या है। उन्होंने जवाब दिया:
“ज्ञान की बातें इतनी ज़्यादा हैं कि सब कुछ लिखा नहीं जा सकता। बस इतना समझ लो कि अगर तुमसे हो सके तो अल्लाह से इस हालत में मिलो कि तुम्हारी ज़बान लोगों की इज़्ज़त को नुकसान न पहुँचाए, तुम किसी के साथ ज़ुल्म या हिंसा में शामिल न हो, तुम किसी का हक़ न खाओ, और तुम भलाई व एकता के साथ लोगों से जुड़े रहो।” (सियरू आलामिन्नुबला, खंड 3, पृष्ठ 222)
आदमी असामान्य हालात में पहचाना जाता है
धैर्य और संयम की असली पहचान तब होती है जब इंसान गुस्से में हो। (जामे’ बयानिल-इल्म व फ़ज़्लिही, खंड 2, पृष्ठ 302)
अल्लाह की व्यवस्था पर संतुष्ट रहना
हज़रत अनस (रज़ि०) से रिवायत है कि नबी (सल्ल०) ने कहा कि अल्लाह का कहना है कि मेरे कुछ बंदों का ईमान सिर्फ़ ग़रीबी से सही रहता है, और अगर मैं उन्हें अमीर बना दूं तो उनका ईमान बिगड़ जाएगा। कुछ बंदों का ईमान केवल दौलत से सही रहता है, और अगर मैं उन्हें गरीबी में डाल दूँ, तो उनका ईमान भी डगमगा जाएगा। कुछ बंदों का ईमान सिर्फ़ सेहत से सही रहता है, और अगर मैं उन्हें बीमार कर दूं तो वे उसे बिगाड़ देंगे। और मेरे बन्दों में कुछ ऐसे ईमान वाले हैं जिनका ईमान सिर्फ़ बीमारी में सही रहता है, अगर मैं उन्हें सेहत दे दूँ तो उनका ईमान बिगड़ जाए। मेरे बंदों के दिलों में जो कुछ भी है, मैं उसे जानता हूं और अपने ज्ञान के मुताबिक उनके मामलों को सुलझाता हूं। (हिलयतुल-औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खंड 8, पृष्ठ 318)
