बात-चीत में एहतियात
मिल-जुल कर रहने में लोगों को एक-दूसरे की जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा सामना पेश आता है वह ज़बान है। एक शख़्स को दूसरे शख़्स से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ ज़बान ही से पहुँचती है। हज के ज़माने में एक साथ बहुत से लोगों का साथ हो जाने की वजह से बार-बार यह मौक़ा आता है कि आदमी की ज़बान बे-क़ाबू हो जाए और एक मुसलमान से दूसरे मुसलमान को ठेस पहुँचे। चुनाँचे हज के ज़माने को ख़ुसूसियत से बात-चीत में एहतियात की तरबियत का ज़रिया बना दिया गया। ज़बान से किसी को तकलीफ़ पहुँचाना आम दिनों में इस्लामी अखलाक़ का एक हिस्सा है, मगर हज के दिनों में इसे इस्लामी इबादत का ज़रूरी हिस्सा बना दिया गया ताकि लोग ज़्यादा से ज़्यादा पाबन्दी करके अपने आप को इस समाजी बुराई से बचाएँ। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया कि जो शख़्स हज इस तरह अदा करे कि इंसान उसकी ज़बान और उसके हाथ से महफ़ूज़ रहें तो उसके अब तक के गुनाह माफ़ हो जाएँगे (तारीख़ दमिश्क, जिल्द 29, पृष्ठ 362)।
क़ुरआन में आया है: हज के कुछ मालूम महीने (शव्वाल, ज़िलक़ादा, ज़िलहिज्जा) हैं। जो शख़्स इन महीनों में अपने ऊपर हज लागू करे तो फिर हज में न कोई बेहयाई की बात हो और न बदजुबानी और न झगड़ा और न तकरार की जाए (2:197)। ज़बान से दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने की यही तीन ख़ास सूरतें हैं। आदमी बेहयाई की बातें अपनी ज़बान से निकालता है जो दूसरों के लिए दिल दुखाने का सबब होती हैं। वह दूसरे को बुरे अल्फ़ाज़ से याद करता है और उसके बारे में नामुनासिब बातें बोलकर उसे बेइज्ज़त करने की कोशिश करता है। वह बात-चीत के दौरान बहस और कठोर बोल पर उतर आता है। यह तमाम चीज़ें हज में बिल्कुल हराम कर दी गईं ताकि इनके बारे में आदमी के एहसासात बढ़ जाएँ और जब वह हज के पाक सफ़र से लौटे तो उसके असर से उसकी ज़बान हमेशा के लिए इन चीज़ों से महफ़ूज़ हो चुकी हो।
