इख़लास यह है कि आदमी हराम
(निषिद्ध चीज़ों) से बचे
ज़ैद बिन अरक़म (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जो व्यक्ति इख़लास (सच्चे दिल) से कहे कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह जन्नत में दाख़िल होगा।” पूछा गया: उसका इख़लास क्या है? आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “यह कि यह कलिमा उसे अल्लाह की हराम (अवैध) की हुई चीज़ों से रोक दे।” (अल-मोजम अल-औसत, हदीस संख्या 5074)
ज्ञान को अपनी शान बढ़ाने का ज़रिया न बनाओ
उबैय बिन काब (रज़ि०) ने कहा: “इल्म (ज्ञान) हासिल करो और उस पर अमल भी करो। इसे इसीलिए मत सीखो कि तुम इससे अपनी शोभा बढ़ाओ या सज-धज का ज़रिया बनाओ।
क्योंकि एक समय ऐसा आएगा जब लोग ज्ञान को भी उसी तरह दिखावे और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करेंगे जैसे वे अच्छे कपड़े पहनकर अपनी सजावट करते हैं।” (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 1510)
शोहरत की चाह सबसे बड़ा फ़ितना (ख़राबी) है
हज़रत शद्दाद बिन औस (रज़ि०) की मौत का समय आया तो उन्होंने कहा: “मुझे तुम पर सबसे ज़्यादा जिस चीज़ का डर है, वह है रिया (दिखावा) और छुपी हुई कामना।”
सुफ्यान सौरी ने कहा: “छुपी हुई कामना यह है कि आदमी अपनी नेकियों पर तारीफ़ सुनना चाहे।” यज़ीद बिन अबी हबीब कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा गया कि छुपी हुई कामना क्या है। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “वह आदमी जो दीन का ज्ञान सीखता है और चाहता है कि लोग उसके पास आकर बैठें।” (जामि’ बयानुल-इल्म व फ़ज़लिही, खण्ड 1, पृष्ठ 661)
वहाँ अमल करना जहाँ लोग देखें
अबू हुरैरा कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “तुम लोग अल-हुज़्न की गहरी खाई से अल्लाह की पनाह माँगो।” लोगों ने पूछा: “ऐ अल्लाह के रसूल, यह अल-हुज़्न क्या है?” आपने फ़रमाया: “यह जहन्नम (नरक) में एक घाटी है, जिससे खुद जहन्नम रोज़ाना चार सौ बार पनाह माँगती है।” लोगों ने पूछा: “ऐ अल्लाह के रसूल, इसमें कौन जाएगा?” आपने फ़रमाया: “वो आलिम (विद्वान) जो अपने काम लोगों को दिखाने के लिए करते हैं। और अल्लाह के नज़दीक सबसे नापसंद क़ारी (क़ुरआन पढ़कर सुनाने वाले) वो हैं जो हाकिमों और अमीरों के यहाँ जाते हैं।” (सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 256)
अपने ऊपर क़ियास (अनुमान लगा कर)
कर के बदगुमानी से बचना
इफ़्क़ (झूठा इल्ज़ाम) के क़िस्से में, जब हज़रत आयशा (रज़ि०) पर ग़लत इल्ज़ाम लगाया गया, तो बहुत सी बातें कही जाने लगीं। उन्हीं में से एक वाक़िया यह है कि हज़रत अबू अय्यूब अंसारी (रज़ि०) की बीवी ने उनसे कहा: “लोग आयशा के बारे में ऐसी-वैसी बातें कहते हैं।” उन्होंने जवाब दिया: “कहने वाले झूठ बोलते हैं।”
फिर उन्होंने अपनी बीवी से पूछा: “बताओ, क्या तुम ऐसा काम कर सकती हो?”
बीवी ने कहा: “हरगिज़ नहीं!” तो अबू अय्यूब ने कहा: “तो फिर आयशा तुमसे कहीं ज़्यादा पाक और साफ़ हैं। उनकी बारे में बुरा गुमान क्यों किया जाए?” (तफसीर इब्न कसीर, खण्ड 10, पृष्ठ 192)
ईमान वाले की भलाई पर खुश होना
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) ने कहा:
“जब मुझे यह पता चलता है कि किसी शहर के ईमान वालों पर बारिश हुई है, तो मुझे खुशी होती है—भले ही वहाँ मेरा न कोई पशु चरता हो और न ही मुझे कोई फ़ायदा मिलता हो।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 11137)
अल्लाह की खातिर बदला लेने से रुक जाना
ग़ज़्वा-ए-बनी मुस्तलिक से वापसी पर, एक इत्तेफ़ाक़ी ग़लती से हज़रत आयशा (रज़ि०) क़ाफ़िले से पीछे रह गईं। बाद में एक सहाबी ने उन्हें मैदान में देखा, तो अपने ऊँट से उतरकर उन्हें उस पर बैठाया और खुद ऊँट की रस्सी पकड़कर चलते रहे, यहाँ तक कि उन्हें मदीना पहुँचा दिया। इस घटना को मदीना के मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) ने एक अफ़वाह बना दिया और हज़रत आयशा के खिलाफ़ झूठ फैलाने लगे। इस झूठी मुहिम से प्रभावित होने वालों में मिसतह बिन उसासह भी थे, जो अबू बक्र (रज़ि०) के रिश्तेदार थे। अबू बक्र उन्हें हर महीने मदद के तौर पर कुछ रक़म देते थे। जब अबू बक्र (रज़ि०) को मालूम हुआ कि मिसतह भी इस साज़िश में शामिल हैं, तो उन्होंने कहा: “ख़ुदा की क़सम! अब मैं मिसतह को कुछ भी नहीं दूँगा।” फिर क़ुरआन में यह हुक्म उतरा: “जो लोग माल और ताक़त रखते हैं, उन्हें यह क़सम नहीं खानी चाहिए कि वे अपने रिश्तेदारों, ग़रीबों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों की मदद नहीं करेंगे। उन्हें चाहिए कि माफ़ करें और दरगुज़र करें। क्या तुम यह पसंद नहीं करते कि अल्लाह तुम्हें माफ़ कर दे? और अल्लाह तो माफ़ करने वाला और मेहरबान है।” (24:22) जब ये आयत उतरी तो अबू बक्र (रज़ि०) ने कहा: “हाँ, ख़ुदा की क़सम! मुझे यह बहुत पसंद है कि अल्लाह मुझे माफ़ कर दे।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6679) और इसके बाद उन्होंने फिर से मिसतह की मदद शुरू कर दी।
अल्लाह उसे क़ियामत के दिन
आग से बचाएगा
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: जो व्यक्ति अपने भाई को बेईज्ज़त होने से बचाए, क़ियामत के दिन अल्लाह उसे आग से बचाएगा। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2044)
नेक और बुरे की पहचान
हज़रत आयशा (रज़ि०) से एक आदमी ने पूछा: मैं अपने आप को नेक कब समझूँ? उन्होंने जवाब दिया: जब तुझे अपने बुरे होने का एहसास होने लगे। उसने फिर पूछा: मैं अपने आप को बुरा कब समझूँ? उन्होंने कहा: जब तू अपने आप को नेक समझने लगे। (इहया उलूमुद्दीन, खण्ड 3, पृष्ठ 370)
धर्म के नाम पर दुनिया कमाना दिल
को कठोर कर देता है
हसन बसरी ने कहा: आलिम (धार्मिक विद्वान) की सज़ा उसके दिल का मर जाना है। पूछा गया: दिल के मरने का मतलब क्या है? उन्होंने कहा: आख़िरत के काम से सांसारिक लाभ लेना। (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 1696)
मौत का दिन इन्सान के जागने का दिन है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: लोग सोए हुए हैं, जब मरेंगे तो जाग उठेंगे।
यानी इंसान दुनिया में इतना व्यस्त है कि आख़िरत से ग़ाफ़िल हो गया है। मानो वह दुनिया में जाग रहा है लेकिन आख़िरत में सो रहा है। जब मौत उसकी आँख का पर्दा हटा देगी, तब उसे पता चलेगा कि असल चीज़ वही थी जिसे उसने गैर-ज़रूरी समझकर भुला दिया था। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 7, पृष्ठ 52)
दुनिया से मोह इंसान को आख़िरत के
विषय में कमज़ोर कर देता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: एक समय आएगा जब तुम सैलाब में बहते कूड़े-करकट की तरह बेहैसियत हो जाओगे। सहाबा ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल, इसका कारण क्या होगा? आपने कहा: तुम्हारे अंदर “वहन” पैदा हो जाएगा। लोगों ने पूछा: वहन क्या है? आपने फरमाया: दुनिया की मोहब्बत और मौत का डर। (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या, 4297)
इंसान अपने आपको जहन्नम के
किनारे खड़ा हुआ पाएगा
जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) हिजरत करके मदीना पहुँचे, तो आपने अपने पहले ख़ुत्बे में फ़रमाया:
“ऐ लोगो! अपने लिए आगे भेज लो—यानी आख़िरत के लिए अच्छे कर्म कर लो। यक़ीनन तुम उसे जान लोगे। ख़ुदा की क़सम! तुममें से हर एक पर एक दिन बेहोशी, यानी मौत आएगी, और इंसान इस तरह दुनिया छोड़ जाएगा जैसे कोई चरवाहा अपनी बकरियाँ छोड़कर चला जाए और उनके लिए कोई रखवाला न रहे।” फिर उसका परवरदिगार उससे पूछेगा—और उसके और अल्लाह के बीच न कोई अनुवादक होगा और न कोई रुकावट: क्या मेरे रसूल तुम्हारे पास नहीं आए? क्या उन्होंने तुम्हें मेरा संदेश नहीं पहुँचाया? क्या मैंने तुम्हें माल-दौलत नहीं दिया और तुम पर कृपा नहीं की? तो फिर तूने अपने लिए क्या आगे भेजा? उस समय इंसान दाएँ-बाएँ देखेगा लेकिन वहाँ कुछ न पाएगा। आगे देखेगा तो वहाँ सिर्फ़ जहन्नम ही दिखाई देगी। इसलिए जो भी अपने चेहरे को आग से बचा सके, उसे ज़रूर बचाना चाहिए—चाहे वह सिर्फ़ खजूर का एक टुकड़ा देकर ही क्यों न हो। और अगर वह भी न हो तो मीठी बात बोले, क्योंकि उसका भी इनाम मिलेगा। और नेक काम का इनाम दस गुना से शुरू होकर सात सौ गुना तक मिलता है। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीथ संख्या 3595)
अपने कामों को बेमहत्व समझो
सईद बिन जुबैर (ताबई) से किसी ने पूछा—सबसे बढ़कर इबादत करने वाला कौन है? उन्होंने जवाब दिया—वह इंसान जो गुनाहों में पड़ा रहा, फिर तौबा कर ली। और इसके बाद जब भी अपने गुनाहों को याद किया तो उनके सामने अपने नेक कामों को बेकार समझा। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 4, पृष्ठ 279)
सबसे बड़ा काम वही है जिसके लिए
खुद को मजबूर करना पड़े
एक रिवायत के मुताबिक़ रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—सब कामों में तीन काम सबसे कठिन हैं: अपने ही मामले में दूसरों के साथ इंसाफ़ करना, अपने माल (धन) से भाइयों की मदद करना, हर हाल में अल्लाह को याद करना। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 3, पृष्ठ 183)
किसी रूप से धर्म के काम आ जाना
जन्नत के लिए काफी नहीं
अबू हुरैरा (रज़ि०) बयान करते हैं कि ख़ैबर की लड़ाई में एक आदमी ने हिस्सा लिया और बड़ी बहादुरी से लड़ा। जब उसकी मौत की खबर फैली तो लोगों ने कहा—यह तो ज़रूर शहीद हुआ होगा। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—यह दोज़ख़ियों में से है। लोगों को उसकी बहादुरी देखकर शंका हुई। आपने कहा—जाकर पता करो वह कैसे मरा। मालूम हुआ कि वह घायल होकर गिर पड़ा, और रात को ज़ख़्म की तकलीफ़ से उसने खुदकुशी कर ली, तब सबको यक़ीन हो गया कि वह शहीद नहीं हुआ बल्कि हराम (अवैध) मौत मरा। इसकी ख़बर रसूलुल्लाह (सल्ल०) को दी गई तो आपने कहा की जाओ लोगों में ये एलान कर दो कि “जन्नत में सिर्फ़ वही जाएगा जो सच्चे ईमान वाला हो। और अल्लाह इस दीन की मदद फ़ासिक (बुरे) आदमी से भी करता है। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3062)
अपने अमल (कर्म) को बेक़ीमत समझना
हज़रत उमर (रज़ि०) से किसी ने कहा, “आपने दीन की बहुत सेवाएँ की हैं, अल्लाह के यहाँ आपका दर्जा बहुत ऊँचा होगा।”
उन्होंने जवाब दिया, “अगर हिसाब बराबर निकल आए—न मेरे हक़ में, न मेरे ख़िलाफ़—तो वही मेरे लिए बहुत है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 7218)
छोटा काम करना किसी को छोटा नहीं बनाता
ख़लीफ़ा उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ एक रात बातचीत कर रहे थे। देर हो गई और दिया (चराग़) बुझने लगा। किसी ने कहा—मैं नौकर को जगा देता हूँ। आपने मना किया और खुद उठकर तेल लाए और चराग़ में डाल दिया। फिर कहा—तेल डालने से पहले भी मैं उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ था और अब भी वही हूँ। (सीरत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़, पृष्ठ 44)
संबंध में बिगाड़ के बावजूद हक़ अदा
करने में कमी न करना
ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) ने एक शख़्स से कहा—मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं। उसने पूछा—क्या आप मेरे हक़ में कोई कमी कर देंगे? हज़रत उमर ने कहा—नहीं। उसने कहा—तो फिर मोहब्बत से तो सिर्फ़ औरतें ही खुश हो सकती हैं। (अल-फख़री फ़ी आदाबिस सुल्तानिया व अल-दुवलुल इस्लामिया, खण्ड 1, पृष्ठ 40)
अल्लाह के दिए पर राज़ी होना और
हमेशा सीखने वाला बने रहना
हज़रत अबू क़िलाबा से किसी ने पूछा—सबसे अमीर कौन है? उन्होंने कहा—जो अल्लाह की दी हुई चीज़ पर राज़ी हो जाए। फिर पूछा—सबसे बड़ा आलिम कौन है? उन्होंने कहा—जो दूसरों के ज्ञान से अपने ज्ञान में इज़ाफ़ा करता है। (अत्तबक़ातुल कुबरा, अल-बैहक़ी, असर संख्या 3058)
आदमी वही चीज़ खो रहा है जिसे
वह पाना चाहता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—मैंने जन्नत जैसी कोई चीज़ नहीं देखी जिसका चाहने वाला सोया हुआ हो। और मैंने जहन्नम जैसी कोई चीज़ नहीं देखी जिससे भागने वाला भी सोया हुआ हो। (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 384)
किसी से बुराई पहुँचे तो उसे अल्लाह
के हवाले कर दो
इमाम ज़ैनुल आबिदीन (हज़रत हुसैन बिन अली के बेटे) करबला से अकेले ज़िंदा लौटे। किसी ने उनसे कहा—फ़लाँ आदमी आपकी बुराई करता है। उन्होंने कहा की मुझे उसके पास ले चलो, वह उसके पास गए और सलाम के बाद कहा— अगर तुमने मेरे बारे में जो कहा वह सच है तो मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि वह मुझे माफ़ कर दे। और अगर वह झूठ है तो मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि वह तुमको माफ़ कर दे। (अल-फुसूलुल मुहिम्मा फ़ी मारिफ़तिल-अइम्मा, इब्न सब्बाग़, खण्ड 2, पृष्ठ 859)
अपने गुनाह देखो, न कि दूसरों के
हज़रत रबीअ बिन ख़ैसमा कभी किसी की बुराई नहीं करते थे। उन्होंने कहा—लोगों का अजीब हाल है। वे दूसरों के गुनाहों पर तो अल्लाह से डरते हैं, लेकिन अपने गुनाहों से बेपरवा रहते हैं। (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 2, पृष्ठ 110)
अल्लाह और रसूल की बात के
आगे झुक जाना
अबू जुहैफ़ा (रज़ि०) अच्छे खाने के शौकीन थे। एक दिन उन्होंने बढ़िया खाना खूब खाया और फिर रसूलुल्लाह (सल्ल०) की मजलिस में पहुँचे। वहीं उन्हें डकार आ गई। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया—दुनिया में जो सबसे ज़्यादा पेट भरते हैं, क़ियामत में वही सबसे ज़्यादा भूखे होंगे।
यह सुनकर अबू जुहैफ़ा इतने प्रभावित हुए कि फिर कभी पेट भरकर खाना नहीं खाया। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2478)
जन्नती वही है जिसका दिल बैर से खाली हो
रसूलुल्लाह (सल्ल०) एक बार सहाबा के साथ बैठे थे। आपने फ़रमाया—इस रास्ते से एक जन्नती आ रहा है। थोड़ी देर बाद एक मुसलमान उस रास्ते से आया। लोगों ने उससे पूछा—तुम क्या अमल करते हो कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने तुम्हें जन्नती कहा? उसने कहा—मेरे पास कोई ख़ास अमल नहीं। बस मैं अपने दिल में किसी ईमान वाले के खिलाफ़ ज़रा भी बैर या द्वेष नहीं रखता। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 12697)
दूसरों के सुधार की कोशिश करना और
अपने सुधार के लिए तैयार रहना
अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि० जब ख़लीफ़ा चुने गए तो आपने अपने पहले भाषण में कहा: “लोगो, तुम्हारा मामला मेरे सुपुर्द किया गया है, जबकि मैं तुमसे बेहतर नहीं हूँ। मेरी नज़र में कमज़ोर आदमी तुममें सबसे ताक़तवर है, जब तक कि मैं उसका हक़ उसको न दिला दूँ। और मेरी नज़र में ताक़तवर आदमी तुममें सबसे कमज़ोर है, जब तक कि मैं उससे हक़ वसूल न कर लूँ। लोगो, मैं सिर्फ़ तुम्हारी तरह एक इन्सान हूँ। जब तुम देखो कि मैं सही राह पर हूँ तो मेरी पैरवी करो, और अगर मैं टेढ़ा हो जाऊँ तो मुझे सीधा कर दो।” (सीरत इब्न हिशाम, खण्ड 2, पृष्ठ 661)
अमल (कर्म) का आख़िरी दर्जा यह है कि
आदमी किसी को नुक़सान न पहुँचाए
यह्या बिन मुआज़ राज़ी ने कहा: “ईमान वाले को अगर तुम फ़ायदा न पहुँचा सको, तो कम से कम उसे नुकसान भी मत पहुँचाओ। अगर तुम उसे खुश न कर सको तो ग़मगीन भी मत करो। और अगर तुम उसकी तारीफ़ न कर सको तो बुराई भी मत करो।” (जामिउल-उलूम वल-हिकम, खण्ड 2, पृष्ठ 223)
इबादत ज़ाहिरी रस्मों का नाम नहीं
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) कहते हैं कि एक दिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) लोगों को नसीहत कर रहे थे। आपने देखा कि एक शख़्स धूप में खड़ा है। आपने उसका हाल पूछा, बताया गया कि वे अबू इस्राईल अंसारी हैं। उन्होंने रोज़ा रखा है और यह मन्नत मानी है कि वे न छाँव में जाएँगे, न बैठेंगे, बल्कि खड़े रहेंगे, और किसी से बात भी नहीं करेंगे। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “उनसे कहो कि वे बातें करें, छाँव में जाएँ और बैठें, और अपने रोज़े को पूरा करें।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 3300)
ख़ुदा बनने की कोशिश न करो
हमदून क़स्सार नीशापुरी (देहांत 271 हिजरी) से किसी ने पूछा कि “खुदा का बंदा कौन है?” उन्होंने जवाब दिया: “वह जो इबादत करे और यह न चाहे कि लोग उसकी इबादत करें।”
इबादत इस तरह न की जाए कि
किसी को तकलीफ़ हो
रसूलुल्लाह (सल्ल०) मस्जिद में एतक़ाफ़ में थे। आपने सुना कि कुछ लोग ऊँची आवाज़ में क़ुरआन पढ़ रहे हैं। आपने परदा उठाया और कहा: “देखो, तुम सब अपने परवरदिगार से बात कर रहे हो। इसलिए कोई आदमी दूसरे को तकलीफ़ न दे, और क़ुरआन पढ़ते समय एक-दूसरे पर अपनी आवाज़ ऊँची न करे।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 1332)
बरकत वाली शादी वही है जो
साधारण (सीधी-सादी) हो
आयशा रज़ि० कहती हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “सबसे ज़्यादा बरकत वाला निकाह वही है, जिसमें खर्च सबसे कम हो।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 25167)
दिखावे वाली बातों में ज़्यादा सख़्ती
करना ग़लत है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने तीन बार कहा: “बर्बाद हो गए वो लोग जो हर चीज़ में बेवजह सख़्ती करते हैं।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2670)
आसानी का तरीक़ा अपनाओ,
कठिनाई का नहीं
एक सहाबी का वाक़िया है, वे मैदान में थे। नमाज़ का वक़्त आ गया। उन्होंने घोड़े की लगाम पकड़े हुए नमाज़ पढ़ी। एक आदमी ने ऐतराज़ किया कि देखो, ये सहाबी हैं और घोड़े की लगाम पकड़े नमाज़ पढ़ रहे हैं। सहाबी ने जवाब दिया: “मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को देखा है कि वे आसानी को पसंद करते थे। अगर मैं घोड़े को छोड़ देता तो वह भाग जाता। मैं पैदल चलने में सक्षम नहीं था, और मुझे बेवजह परेशानी उठानी पड़ती।” (शरह अल-सियरुल कबीर, अल-सर्खसी, पृष्ठ 237)
ग़ैर ज़रूरी तकलीफ़ उठाना नेकी नहीं है
जाबिर (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) एक सफ़र में थे। आपने देखा कि एक शख़्स को लोग घेरे हुए हैं और उस पर छाँव किए हुए हैं। आपने पूछा: “क्या मामला है?” लोगों ने कहा: “वह रोज़ेदार है।” आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “सफ़र में रोज़ा रखना कोई नेकी नहीं है।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1115)
इमाम को आम लोगों की आसानी का
ख्याल रखना चाहिए
हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि हज़रत मुआज़ ने मग्रिब की नमाज़ पढ़ाई। उसमें उन्होंने सूरह बक़रह और सूरह निसा पढ़ी। जब अल्लाह के रसूल को यह बात मालूम हुई तो आपने कहा—“ऐ मुआज़, क्या तुम लोगों को परेशानी में डालने वाले हो? क्या तुम्हारे लिए यह काफी न था कि तुम सूरह त़ारिक़ या सूरह शम्स जैसी सूरतें पढ़ते?”
जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी कहते हैं: एक आदमी अपने दो ऊँटों को लेकर आया, उस समय रात हो चुकी थी। उसने मुआज़ को नमाज़ पढ़ाते पाया। उसने ऊँट छोड़ दिए और मुआज़ के पीछे नमाज़ के लिए खड़ा हो गया। मुआज़ ने सूरह बक़रह या सूरह निसा पढ़ डाली। उस आदमी ने नमाज़ अधूरी छोड़ दी और चला गया। बाद में उसे पता चला कि मुआज़ ने उसके बारे में कुछ कहा है। वह नबी (सल्ल०) के पास पहुँचा और शिकायत की। तब नबी (सल्ल०) ने मुआज़ से कहा—“ऐ मुआज़, क्या तुम लोगों को फितने (परेशानी) में डालने वाले हो?”—आपने यह बात तीन बार दोहराई—“क्यों न तुम सूरह सब्बिहिस्मा रब्बिक, सूरह शम्स व ज़ुहाहा, और सूरह वल-लैल इज़ा यग़शा जैसी सूरतें पढ़ते? क्योंकि तुम्हारे पीछे बूढ़े, कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोग भी नमाज़ पढ़ते हैं।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 705)
महानता दिल से होती है, सिर्फ़ दिखने
वाले कर्मों से नहीं
अबू बक्र मुज़नी ने कहा: अबू बक्र (रज़ि०) की श्रेष्ठता दूसरे साथियों पर इस कारण नहीं थी कि वे सबसे ज़्यादा रोज़े रखते थे या सबसे ज़्यादा नमाज़ें पढ़ते थे। बल्कि उनकी यह श्रेष्ठता उस चीज़ की वजह से थी जो उनके दिल में थी। इब्न उलय्यह ने अबू बक्र मुज़नी की इस बात की व्याख्या करते हुए कहा: अबू बक्र (रज़ि०) के दिल में जो चीज़ थी, वह अल्लाह से सच्चा प्यार और अल्लाह के बंदों के लिए भलाई की चाह थी। (जामिअुल उलूम वल हिकम, खण्ड 1, पृष्ठ 235)
इस्लाम में आसानी है, मुश्किलें नहीं
गुज़ैफ़ बिन हारिस कहते हैं: मैंने हज़रत आयशा (रज़ि०) से पूछा—“क्या आप ने देखा कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) जनाबत (ग़ुस्ल की स्थिति) से रात के शुरू में नहाते थे या रात के आखिर में?” हज़रत आयशा (रज़ि०) ने जवाब दिया: कभी आप रात के शुरू में ग़ुस्ल करते और कभी रात के आखिर में। मैंने कहा: “अल्लाह सबसे बड़ा है! शुक्र है अल्लाह का जिसने धर्म (दीन) में आसानी और सहूलियत रखी।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 226)
अल्लाह नीयत को देखता है,
केवल कर्म को नहीं
हज़रत उमर बिन खत्ताब (रज़ि०) बयान करते हैं: मैंने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को यह कहते हुए सुना—“ कर्म का आधार नीयत पर है। और हर इंसान के लिए वही है जिसकी उसने नीयत की।” “जिसकी हिजरत (migration) अल्लाह और उसके रसूल के लिए होगी, तो उसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए मानी जाएगी। और जिसकी हिजरत दुनिया कमाने के लिए हो, या किसी औरत से शादी करने के लिए हो, तो उसकी हिजरत उसी चीज़ के लिए होगी जिसके लिए उसने हिजरत की।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1)
