हज से मुतअल्लिक़ कुछ अहम बातें
अक्सर हाजियों को देखा गया है कि हज के अरकान (ज़रूरी फरायेज़) को अदा करते हुए वे बस रटी हुई दुआएँ दोहराते रहते हैं या किताब हाथ में लेकर उससे पढ़ते रहते हैं। भले ही इससे हज की फिक़ही (औपचारिक) अदायगी हो जाती है, मगर हज के दौरान ज़िक्र और दुआ से जो असल चीज़ हासिल करनी होती है, इस तरह करने से उसका हक़ अदा नहीं होता। हज के दौरान आदमी पर वही हालत गुज़रनी चाहिए जो हज़रत इब्राहीम और उनके ख़ानदान पर गुज़री थी। मिसाल के तौर पर, जब आदमी सई (सफ़ा और मरवा के बीच दौड़) करता है तो उसकी ज़ुबान से ऐसे अल्फ़ाज़ निकलने चाहिए कि—खुदाया, तूने इस सई के बाद हज़रत हाजरा के लिए बरकत का हमेशा रहने वाला चश्मा जारी कर दिया था, मेरी सई को भी तू ऐसी सई बना दे कि जिसके बाद मेरे लिए भलाई के ऐसे चश्मे जारी हो जाएँ जो दुनिया से आख़िरत तक मुझे सैराब (तृप्त) करते रहें।
आजकल हाजियों में लगभग 95 प्रतिशत तादाद ज़्यादा उम्र वालों की होती है। इनमें बहुत से ऐसे होते हैं जो बहुत बूढ़े हो चुके होते हैं, यहाँ तक कि हज के मनासिक (हज के ज़रूरी काम) को अदा करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। इस तरह के लोगों के लिए बेहतर है कि वे अपना हज्जे बदल कराएँ। हज्जे बदल (किसी दूसरे की तरफ़ से हज अदा करना) जो आजकल आम तौर पर मृत व्यक्ति के लिए किया जाता है, असल में ऐसे ही लोगों के लिए है। हदीस में आया है:
“फ़ज़्ल बिन अब्बास कहते हैं कि हज्जतुल विदा के साल बनू ख़सअम की एक औरत ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कहा कि हज बंदों पर अल्लाह का फ़रीज़ा है। मेरा एक बूढ़ा बाप है, वह सवारी पर नहीं बैठ सकता। क्या मैं उनकी तरफ़ से हज करूँ? आपने फ़रमाया—हाँ। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या1854)।
हज हर उस शख़्स पर, जो इसकी ताक़त रखता हो, ज़िंदगी में एक बार फर्ज़ है। हदीस में आया है कि हज्जे मबरूर का बदला सिर्फ़ जन्नत है । (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1773; सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1349)।
