तौहीद का आलमी मरकज़

क़ुरआन की इन आयतों से मालूम होता है कि हज़रत इब्राहीम के ज़रिये हिजाज़ में काबा की तामीर ख़ास तौर पर इस लिए की गई थी कि वह तौहीद वालों का मरकज़ बने। क़रीब के लोग भी आएँ और दूर के लोग भी सवारियों के ज़रिये वहाँ पहुँचें। काबा के आस-पास ऐसे तारीख़ी वजहें पैदा की गईं कि लोगों के दिल उसकी तरफ़ खिंचें। और हर तरफ़ से लोग उमड कर वहाँ पहुँचें। बैतुल्लाह क़यामत तक के लिए ख़ुदा का मुक़र्रर किया हुआ आलमी (वैश्विक) इस्लामी मरकज़ है। वह तमाम दुनिया के मुसलमानों के जमा होने की जगह है।

हज इस्लाम की एक बहुत अहम सालाना इबादत है। यह चाँद के कैलेंडर के आख़िरी महीने ज़िलहिज्जा में अदा किया जाता है। हज की इबादत के काम बैतुल्लाह (मक्का) में या उसके आस-पास के मक़ामात पर अदा किए जाते हैं, जो अरब में हैं। इस इबादत को तमाम इबादतों का जामे कहा जाता है, क्योंकि इसमें हर तरह के इबादती पहलू पाए जाते हैं। इन्हीं में से एक सामूहिक पहलू भी है। हज की इबादत में सामूहिकता का पहलू बहुत साफ़ तौर पर मौजूद है। इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका (1984) में हज का ज़िक्र करते हुए यह जुमला लिखा गया है:

“About 2,000,000 persons perform the Hajj each year. and the rite serves as a unifying force in Islam by bringing followers of diverse background together in religious celebration.” (एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, 1985, खंड 4, पृष्ठ 844)

तक़रीबन 20 लाख आदमी हर साल हज करते हैं और यह इबादत मुख़्तलिफ़ मुल्कों के मुसलमानों को एक मज़हबी सभा में इकट्ठा करके इस्लाम में एकता की ताक़त पैदा करती है।

क़ुरआन में हज का हुक्म देते हुए यह अल्फ़ाज़ आए हैं: “अल्लाह ने बैतुल्लाह को लोगों के लिए जमा होने की जगह बनाया और उसे अम्न की जगह बना दिया।” (2:125)। “मसाबा” के मायने अरबी ज़बान में तक़रीबन वही हैं जिसे आज की ज़बान में केंद्र कहा जाता है, यानी वह जगह जहाँ लोग जमा हों, जिसकी तरफ़ सब लोग लौटें, जो सबका साझा मरकज़ हो।

हज की इबादत के लिए सारी दुनिया से हर मुल्क के लोग आते हैं। हर क़ौम के लोग आते हैं। उनकी तादाद सालाना तक़रीबन 25 लाख हो जाती है। हज के मौसम में मक्का और उसके आस-पास हर तरफ़ आदमी ही आदमी दिखाई देने लगते हैं। यह लोग मुख़्तलिफ़ ज़बानें बोलते हैं, उनके हुलिए अलग-अलग होते हैं, मगर यहाँ आने के बाद सबकी सोच एक हो जाती है। सब एक ही निशाने पर चलते नज़र आते हैं। ऐसा मालूम होता है जैसे कोई रब्बानी चुम्बक है जो “लोहे” के तमाम टुकड़ों को एक नुक्ते पर खींचे चला जा रहा है।

अलग अलग मुल्कों के यह लोग जब हज के मक़ाम के क़रीब पहुँचते हैं तो सब के सब अपना क़ौमी लिबास उतार देते हैं और सब के सब एक ही जैसा लिबास पहन लेते हैं, जिसे एहराम कहा जाता है। एहराम बाँधने का मतलब यह है कि बिना सिली हुई एक सफ़ेद चादर जो नीचे तहमद की तरह पहन ली जाए और इसी तरह एक सफ़ेद चादर ऊपर से जिस्म पर डाल ली जाए। इस तरह लाखों इंसान एक तरह के एक ही रंग के लिबास पहने हुए होते हैं।

यह सारे लोग मुख़्तलिफ़ मरासिम (विधियाँ) अदा करते हुए आख़िरकार अरफ़ात के विशाल मैदान में इकट्ठा होते हैं। उस वक़्त एक अजीब मंज़र होता है। ऐसा मालूम होता है जैसे इंसानों के तमाम फ़र्क़ अचानक मिट गए हैं। तमाम इंसान अपने तमाम मतभेदों को भूलकर एक ही ख़ुदा में गुम हो गए हैं। तमाम इंसान उसी तरह एक हो गए हैं, जैसे उनका ख़ुदा एक है।

अरफ़ात के विशाल मैदान में जब एहराम बाँधे हुए तमाम हाजी जमा होते हैं, उस वक़्त किसी बुलंदी से देखा जाए तो ऐसा नज़र आएगा कि ज़बान, रंग, हैसियत, नस्ल के फ़र्क़ के बावजूद सब के सब इंसान बिल्कुल एक हो गए हैं। उस वक़्त मुख़्तलिफ़ क़ौमें एक ही बड़ी क़ौमियत में शामिल नज़र आती हैं। हक़ीक़त यह है कि हज इज्तिमाइयत (सामूहिकता) का इतना बड़ा प्रदर्शन है कि उसकी कोई दूसरी मिसाल ग़ालिबन दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगी।

काबा मुसलमानों का इबादत का क़िबला है। मुसलमान हर रोज़ पाँच वक़्त उसकी तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ते हैं। इस तरह सारी दुनिया के मुसलमानों का इबादती क़िबला एक ही है। आम हालत में यह एक ऐसी हक़ीक़त है जो सोच से मुताल्लिक है, मगर हज के दिनों में मक्का पहुँचकर वह एक आँखों देखी हक़ीक़त बन जाती है। सारी दुनिया के मुसलमान यहाँ पहुँचकर जब उसकी तरफ़ रुख़ करके नमाज़ अदा करते हैं तो महसूस तौर पर दिखाई देने लगता है कि तमाम दुनिया के मुसलमानों का साझा क़िबला एक ही है।

काबा एक चौकोर ऊँची इमारत है। इस इमारत के चारों तरफ़ गोल दायरे में सारे लोग घूमते हैं, जिसे तवाफ़ कहा जाता है। वह सफ़ लगाकर उसके गिर्द गोल दायरे में इबादत करते हैं। हज के दौरान वह उनकी तमाम तवज्जोह का मरकज़ बना रहता है। इस तरह हज एक ऐसी इबादत बन जाता है जो अपने तमाम कार्यों और आयोजन के साथ इंसान को इज्तिमाइयत (सामूहिकता) और मरकज़ियत (केंद्रीयता) का सबक़ देता है।

Maulana Wahiduddin Khan
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