रमज़ान में ग़लतियों की माफ़ी
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया, जिस व्यक्ति ने रमज़ान के रोज़े रखे, और उसकी सीमाओं को पहचाना, और जिन बातों से बचना ज़रूरी था, रोज़े के दौरान उनसे अपने आप को बचाए रखा, तो ऐसा रोज़ा उसके लिए उसकी पिछली ग़लतियों की माफ़ी का ज़रिया बन जाता है। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 11524)
रमज़ान का महीना असल में आत्म-चिंतन (introspection) का महीना है। सच्चा रोज़ा इंसान के भीतर आत्म-चिंतन की मानसिकता को जगा देता है। वह अपने अतीत पर फिर से सोचता है और अपने वर्तमान की जाँच-परख करता है। रोज़ा इंसान के भीतर और ज़्यादा यह एहसास पैदा करता है कि वह मरने वाला है और मरने के बाद उसे अल्लाह के सामने खड़ा होना है। इस एहसास के तहत वह चाहता है कि क़ियामत की अदालत में पेश होने से पहले ही अपना हिसाब कर ले, ताकि आख़िरत में अल्लाह की पकड़ से बच सके।
रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना निस्संदेह इंसान की ग़लतियों की माफ़ी का ज़रिया है, लेकिन यह माफ़ी किसी रहस्यमय तरीक़े से अपने आप नहीं हो जाती। यह उस सजग प्रक्रिया के ज़रिये होती है जिसे दीन में आत्म-चिंतन कहा गया है। रोज़ा इंसान के भीतर पूरी तीव्रता के साथ आत्म-चिंतन की मानसिकता पैदा करता है। इंसान एक-एक करके अपनी ग़लतियों को याद करता है और अपनी तनहाइयों में अल्लाह से माफ़ी की दुआएँ करता है। यह एहसास उस पर इतनी गहराई से छा जाता है कि उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
दरअसल रोज़ेदार के यही आँसू अल्लाह की रहमत (कृपा) के तहत उसकी ग़लतियों को धो देते हैं। इस हदीस से यह बात सामने आती है कि ग़लतियों की माफ़ी भावनाओं से भरे हुए रोज़े का नतीजा होती है, न कि हर साल निभाई जाने वाली एक निर्जीव रस्म के रूप में रोज़ा रखने का नतीजा।
