चर्चा का निष्कर्ष
रूस और अमेरिका के संबंधों में यह बदलाव बेशक एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है। आधुनिक इतिहास की इस घटना में बहुत बड़ा सबक़ है। यह घटना साफ़ तौर पर बताती है कि मौजूदा ज़माने में टकराव की नीति पूरी तरह अपनी अहमियत खो चुकी है। अपने प्रतिद्वंद्वी पर आरोप लगाना, उसको हानि पहुँचाने की कोशिश में लगे रहना, उसके साथ मुक़ाबला करना—यह सब रूस और अमेरिका जैसी शक्तियों के लिए भी पूरी तरह बे-फायदा है। फिर कमज़ोर क़ौमें इस तरह की नकारात्मक नीति अपनाकर किसी वास्तविक नतीजे की उम्मीद कैसे कर सकती हैं?
चाहे व्यक्ति का मामला हो या क़ौम का, दोनों के लिए समस्या का हल इसी तरीक़े में है। इस दुनिया में समझदारी यह है कि इंसान दूसरे को नुक़सान पहुँचाने के बजाय अपने निर्माण में लग जाए। समस्या को लेकर उसके नाम पर चिल्लाने या प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ़ लड़ाई शुरू करने का मतलब सिर्फ़ अपने समय और शक्ति को बर्बाद करना है। इसके अलावा इसका कोई और परिणाम नहीं होता। एक शब्द में कहा जा सकता है कि तरक़्क़ी और कामयाबी का राज़ हल-रुखी नीति में है, न कि दोष-केंद्रित (blame-oriented) नीति में।
