मुस्लिम समुदाय के पतन की निशानियाँ
हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया, मेरी उम्मत के लोग उस वक़्त तक भलाई पर क़ायम रहेंगे, जब तक वे इफ़्तार में जल्दी करेंगे और सहरी में देर करेंगे। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 21312)
इस हदीस में भलाई से मुराद दीन की रूह (spirit) है। इस हदीस के मुताबिक़, रमज़ान के महीने में इफ़्तार में जल्दी करना और सहरी में देर करना इस बात की निशानी है कि उम्मत (मुस्लिम समुदाय) भलाई पर है, यानी उम्मत के अंदर दीन की असली आत्मा ज़िंदा है। और जब मामला इसके उलट हो जाए, यानी लोग इफ़्तार में “सावधानी के लिए देर” करने लगें और सहरी में “सावधानी के लिए जल्दी” करने लगें, तो यह इस बात की निशानी होगी कि मुसलमानों के अंदर से भलाई निकल गई है, यानी मुसलमान अपने दीन की रूह (spirit) पर क़ायम नहीं रहे, बल्कि वह सिर्फ़ दीन की बाहरी शक्ल )form( पर क़ायम हैं। और इस तरह की हालत अल्लाह को पसंद नहीं है। यहाँ जल्दी या देर से मतलब असली जल्दी या देर नहीं है, बल्कि समय की ठीक-ठीक पाबंदी है।
इफ़्तार में देर करने की प्रवृत्ति क्यों पैदा होती है, और सहरी में जल्दी करने की आदत कब बनती है? ऐसा उस समय होता है जब मुसलमानों में दीन की आत्मा बाक़ी नहीं रहती और वे केवल बाहरी रूप से अमल करने को ही दीन समझने लगते हैं। “एहतियात” की सोच हमेशा बाहरी रूप या फ़ॉर्म के बारे में पैदा होती है। लोग बाहरी व्यवस्था को ही सबसे अहम चीज़ मानने लगते हैं। बाहरी पहलू में कमी उनके नज़दीक दीन को अधूरा बना देती है, और बाहरी पहलू में बढ़ोतरी करके वे समझते हैं कि उन्होंने अपने दीन को पूरा कर लिया।
इस हदीस में इसी गिरे हुए मानसिक रवैये की ओर संकेत किया गया है। जीवंत दीनदारी इंसान को आत्मा-सचेत (spirit conscious) बनाती है, लेकिन जब यह आंतरिक सक्रियता और चेतन भाव समाप्त हो जाते हैं, तो लोग केवल बाहरी रूपों के प्रति सजग रह जाते हैं। यह सच्चाई केवल रोज़े तक सीमित नहीं है, बल्कि ये दीन के अन्य सभी कार्यों पर समान रूप से लागू होती है।
