अच्छा आचरण—ये है कि गुस्सा न करे
अबुल अला इब्न- शिख्खीर बताते हैं: एक आदमी अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के पास आया और बोला—“अल्लाह के रसूल! सबसे अच्छा काम कौन सा है?” आपने कहा—“अच्छा आचरण।” वह फिर दाएँ से आया और यही पूछा। आपने फिर कहा—“अच्छा आचरण।” वह बाएँ से आया और पूछा। आपने वही जवाब दिया। फिर पीछे से आया और वही सवाल किया। तब आप उसकी तरफ़ मुड़े और बोले- “तुम्हें क्या हो गया है कि “अच्छे आचरण” को नहीं समझते? वह ये है कि तुम ग़ुस्सा न करो, अगर तुम ये कर सको।” ।” (ताज़ीमु क़द्रिस-सलात, मुहम्मद बिन नस्र अल-मर्वज़ी, हदीस संख्या 878)
जन्नत में ले जाने वाले नेक अमल
तबरानी ने लिखा है कि अनस बिन मालिक रज़ि. बीमार हो गए। कुछ लोग मिलने आए। उन्होंने अपनी नौकरानी से कहा—“हमारे साथियों के लिए कुछ लाओ, चाहे रोटी का टुकड़ा ही क्यों न हो। मैंने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से सुना है कि अच्छे आचरण जन्नत के कर्मों में से हैं।” (अल-मोजम अल-अवसत, हदीस संख्या 6501)
सब पर रहम का बर्ताव
सुहैल बिन अम्र कहते हैं: अल्लाह के रसूल (सल्ल०) एक जगह से गुज़रे। आपने एक ऊँट देखा जिसका पेट (भूख की वजह से) उसकी पीठ से मिल गया था। आपने कहा—“इन बेज़बान जानवरों के बारे में अल्लाह से डरो। इन्हें ठीक तरह से सवारी में लो और ठीक तरह से खिलाओ।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2548)
इस्लाम के संदेशवाहक का
आचरण कैसा होता है
अम्र बिन मुर्रा जुहनी रज़ि. ने सुना कि मक्का में एक नबी आए हैं। वे अपनी सवारी पर मक्का पहुँचे और रसूल (सल्ल०) से मिले। आपने कहा—“ऐ अम्र! मैं अल्लाह का भेजा हुआ पैग़म्बर हूँ, सब इंसानों के लिए। उन्हें इस्लाम की ओर बुलाता हूँ। उन्हें सिखाता हूँ—खून मत बहाओ, रिश्तेदारों के हक़ अदा करो, सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करो, मूर्तियाँ छोड़ो, काबा का हज करो, रमज़ान में रोज़े रखो। जिसने मान लिया उसके लिए जन्नत है, जिसने नहीं माना उसके लिए आग का अज़ाब है। ऐ अम्र! ईमान लाओ, अल्लाह तुम्हें जहन्नम से बचाएगा।” अम्र ने कहा—“मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और आप उसके रसूल हैं। मैं हर उस हलाल और हराम पर ईमान लाता हूँ जो आप लेकर आए हैं।” फिर बोले—“ऐ रसूल! मुझे मेरी क़ौम की तरफ़ भेज दीजिए। शायद अल्लाह मेरी वजह से उन्हें हिदायत दे जिस तरह आपकी वजह से मुझे दी।” आपने उन्हें नसीहत करते हुए कहा—“हमेशा सीधी बात कहना, नरमी अपनाना, सख़्त मिज़ाज मत बनना, घमण्ड और जलन मत करना।” (अल-बिदाया वन-निहाया, खंड 2, पृष्ठ 351)
चार बड़ी नसीहतें
अबू ज़र रज़ि. कहते हैं: अल्लाह के रसूल (सल्ल०) छह दिन तक रोज़ मुझसे कहते रहे—“ ऐ अबू ज़र! जो कहा जाने वाला है उसे अच्छी तरह समझ लो।” सातवें दिन आपने कहा—“मैं तुम्हें नसीहत करता हूँ—छिपे और खुले हर हाल में अल्लाह से डरना। अगर कोई बुराई कर बैठो तो उसके बाद भलाई करना। किसी से कुछ मत मांगना, चाहे तुम्हारा कोड़ा गिर जाए। और किसी की अमानत पर कब्ज़ा मत करना।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 21573)
धोखा देने वाला मुसलमानों में से नहीं
अबू हुरैरा रज़ि. कहते हैं: रसूल (सल्ल०) बाज़ार से गुज़रे। देखा कि एक आदमी ने अनाज का ढेर लगाया है। आपने उसमें हाथ डाला तो उँगलियाँ गीली हो गईं। आपने पूछा—“यह नमी कैसी है?” उसने कहा—“बारिश में भीग गया।” आपने कहा—“इसे ऊपर क्यों नहीं रखा ताकि लोग देख लेते? याद रखो, जो धोखा देता है वह हममें से नहीं।” (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 328)
सहाबी का सबसे प्रिय काम
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. कहते हैं: “अगर मैं किसी परिवार का एक महीना या एक हफ़्ता ख़याल रखूँ, तो यह मुझे बार-बार हज करने से ज़्यादा प्यारा है। और अगर मैं एक तबक़ दानिक़ (कुछ पैसे) अपने भाई को दूँ, तो यह मुझे इससे ज़्यादा पसंद है कि एक दीनार अल्लाह की राह में ख़र्च करूँ।” (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 328)
बेकार की बात न करना,
किसी का बुरा न चाहना
ज़ैद बिन असलम कहते हैं: अबू दुजाना रज़ि. बीमारी में थे। लोग मिलने आए। उनका चेहरा चमक रहा था। पूछा गया—“क्या बात है, आपका चेहरा इतना दमक क्यों रहा है?” उन्होंने कहा—“मेरे दो काम सबसे भरोसेमंद हैं: एक, मैं बेकार बातें नहीं करता था। दूसरा, मेरा दिल हमेशा इंसानों के लिए साफ़ रहता है।” (सियरु आलामिन्नुबला, खण्ड 3, पृष्ठ 152)
इस्लाम में संवेदनशीलता
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. कहते हैं: एक आदमी ने बकरी को ज़बह़ करने के लिए लिटा रखा था और चाकू तेज़ कर रहा था। रसूल (सल्ल०) ने देखा और कहा—“क्या तुम इसे दो बार मारना चाहते हो? तुमने लिटाने से पहले ही चाकू क्यों न तेज़ किया?” (अल-मुस्तद्रक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7563)
मुलाज़िम की ग़लतियों को माफ़ करना
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि. कहते हैं: एक देहाती रसूल (सल्ल०) के पास आया और पूछा—“ऐ अल्लाह के रसूल! अपने मुलाज़िम को मैं रोज़ कितनी बार माफ़ करूँ?” आपने कहा—“हर दिन सत्तर बार माफ़ करो।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 5164)
किसी इंसान के साथ क्रूर व्यव्हार
करना सही नहीं
ग़ज़वा-ए-बद्र के बाद जो लोग पकड़े गए, उनमें एक था सुहैल बिन अम्र। वह क़ुरैश का मशहूर भाषण देने वाला था और अक्सर रसूलुल्लाह (सल्ल०) के खिलाफ़ सख़्त भाषण देता था। हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा—“मुझे इजाज़त दीजिए कि मैं इसके आगे के दो दाँत तोड़ दूँ ताकि यह आगे से इस्लाम के खिलाफ़ भाषण न दे सके।”
आप (सल्ल०) ने कहा—“मैं इसका चेहरा ख़राब नहीं करूँगा। अगर मैंने ऐसा किया तो अल्लाह मेरा चेहरा भी खराब कर देगा, भले ही मैं उसका रसूल हूँ।” (अल-बिदाया वन्निहाया, खण्ड 2, पृष्ठ 481)
बुराई करने वाले के लिए भी
अच्छी दुआ करो
अबू हुरैरा (रज़ि०) बताते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास एक शराबी लाया गया। रसूलुल्लाह के हुक्म से उसे कोड़े मारे गए। जब वह चला गया तो कुछ लोगों ने कहा—“अल्लाह इसे रुसवा (अपमानित) करे, अल्लाह इस पर लानत करे।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया— “ऐसा मत कहो। अपने भाई के खिलाफ़ शैतान के साथी मत बनो। बल्कि यूँ कहो—ऐ अल्लाह, इसे माफ़ कर, इसे सही राह दिखा।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6777)
किसी को श्राप देना बहुत बड़ा पाप है
हज़रत सलमा बिन अक्वा (रज़ि०) बताते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़माने में जब कोई अपने भाई को श्राप देता, तो हम समझते थे कि वह बड़े गुनाहों के दरवाज़ों में से किसी एक दरवाज़े में घुस गया है। (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, असर संख्या 6674)
किसी को तुच्छ समझना इंसान को
भटकाव की ओर ले जाता है
हज़रत उरवा (रज़ि०) कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) हज में थे। आपने अरफ़ात से लौटने में उसामा बिन ज़ैद (रज़ि०) का इंतज़ार किया, इसलिए देर हो गई। इतने में एक लड़का आया जो काले रंग और चपटी नाक वाला था। यमन के लोग जो आपके साथ थे, बोले—
“हम तो इसी की वजह से रुके हुए थे।”
उरवा (रज़ि०) कहते हैं—यमन के लोग इसी बात से भटक गए। इब्न साद बताते हैं—मैंने यज़ीद बिन हारून से पूछा कि उरवा की इस बात का क्या मतलब था। उन्होंने कहा—“हज़रत अबू बक्र (रज़ि०) के ज़माने में यमन के लोग भटक गए थे।” (तबक़ात इब्ने साद, असर संख्या 4853)
औलाद इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी है
हज़रत असवद बिन ख़लफ़ (रज़ि०) कहते है: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हज़रत हसन बिन अली (रज़ि०) को गोद में लिया और चूमा। फिर सहाबा से कहा— “औलाद इंसान को कंजूस बना देती है, ग़लत कामों में डालती है और उसे डरपोक बना देती है।” (अल-मुस्तदरक अल-हाकिम, हदीस संख्या 5351)
दूसरी रिवायत में हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) से ये अल्फ़ाज़ भी नक़्ल हैं—
“अल्लाह शैतान को हलाक करे, औलाद तो इंसान के लिए फ़ितना (आज़माइश) है।” (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, हदीस संख्या 2626)
घर के मामलों में घर के बड़े का रोल
हज़रत हसन बिन अली (रज़ि०) कहते हैं: हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रज़ि०) ने हज़रत अली (रज़ि०) की बेटी उम्मे कुलसूम से शादी का प्रस्ताव दिया, जो उनसे उम्र में काफी छोटी थीं। हज़रत अली (रज़ि०) ने अपने बेटों हसन और हुसैन से कहा—“अपने चाचा के साथ अपनी बहन की शादी का इंतज़ाम करो।” दोनों ने कहा— “वह भी औरतों में से एक है, उसे अपने बारे में खुद फ़ैसला करने का हक़ है।” यह सुनकर हज़रत अली (रज़ि०) नाराज़ हो गए और उठकर जाने लगे। हज़रत हसन (रज़ि०) ने उनका कपड़ा पकड़ लिया और कहा—“अब्बा! मैं आपसे जुदाई बर्दाश्त नहीं कर सकता।” फिर दोनों ने हज़रत उमर (रज़ि०) से अपनी बहन की शादी कर दी। (अल-मोजम अल-औसत, अल-तबरानी, असर संख्या 2609)
कोई इंसान दूसरे इंसान को छोटा न समझे
हसन बिन अली (रज़ि०) कहते हैं: कुछ मुसलमान अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) के पास गए। उस समय वे हज़रत उमर (रज़ि०) की हुकूमत में गवर्नर थे। अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) ने अरबों को तो इनाम दिए लेकिन गैर-अरब मुसलमानों को छोड़ दिया। हज़रत उमर (रज़ि०) ने उन्हें लिखा: “तुमने सबको बराबर क्यों नहीं माना? किसी इंसान के बुरा होने के लिए यही काफी है कि वह अपने किसी मुसलमान भाई को नीचा समझे।” (अल-जामिउल कबीर, अस्सुयूती, असर संख्या 2975)
किसी इंसान में डर पैदा करना जायज़ नहीं
सुलेमान बिन सुरद (रज़ि०) कहते हैं, एक देहाती आया और रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ नमाज़ पढ़ी। उसके पास एक सींग थी। कुछ लोगों ने मज़ाक में उसकी सींग छुपा दी। नमाज़ के बाद जब उसे सींग नहीं मिली तो वह परेशान हो गया और बोला: “मेरी सींग कहाँ गई?” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखता है, वह किसी मुसलमान को कभी परेशान न करे।” (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, हदीस संख्या 6487)
सादगी से निकाह करना
अनस (रज़ि०) कहते हैं: अब्दुर्रहमान बिन औफ़ मदीना आए तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनकी मुवाख़ात (भाई-बंदी) सअद बिन रबीअ (रज़ि०) से कराई। सअद ने कहा: “भाई, मैं मदीने का सबसे अमीर आदमी हूँ। मेरा आधा माल ले लो। मेरी दो पत्नियाँ हैं, तुम्हें जो पसंद हो, मैं उसे तलाक़ दे दूँ और तुम उससे शादी कर लो।” अब्दुर्रहमान (रज़ि०) ने कहा: “अल्लाह तुम्हारे घर और माल में बरकत दे। बस मुझे बाज़ार का रास्ता बता दो।” उन्होंने कारोबार शुरू किया और खूब मुनाफ़ा कमाया। कुछ दिन बाद जब वे रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आए तो उनके कपड़ों पर ज़ाफ़रान का रंग था। आपने पूछा: “यह क्या है?” उन्होंने कहा: “मैंने निकाह कर लिया है।” आपने पूछा: “महर कितना रखा?” उन्होंने कहा: “एक खजूर की गुठली जितना सोना।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “वलीमा करो, चाहे सिर्फ़ एक बकरी से ही क्यों न हो (यानी चाहे सिर्फ़ कुछ लोगों को ही खिला कर ही क्यों न हो)।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2048)
दूसरों को तकलीफ़ न देना
इब्ने अबी मुलैका बताते हैं: हज़रत उमर (रज़ि०) ने हज के समय एक औरत को देखा, जिसे कोढ़ था और वह काबा का तवाफ़ कर रही थी। उमर (रज़ि०) ने कहा: “ऐ अल्लाह की बंदी, लोगों को तकलीफ़ मत दे। बेहतर है कि अपने घर में रहो।” वह औरत घर बैठ गई। कुछ समय बाद किसी ने उससे कहा: “जिस ख़लीफ़ा ने तुम्हें रोका था, उनकी मौत हो गई है। अब तुम बाहर आ सकती हो।” औरत ने कहा: “मैं ऐसी नहीं हूँ कि ज़िंदगी में उनकी बात मानूँ और मरने के बाद उनकी नाफ़रमानी करूँ।” (मुवत्ता इमाम मालिक, असर संख्या 250)
घर में दाख़िल होने के आदाब
सफ़ीना (रज़ि०) कहते हैं: मैं रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास था। हज़रत अली (रज़ि०) आए और अंदर आने की इजाज़त माँगी। उन्होंने दरवाज़ा धीरे से खटखटाया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “दरवाज़ा खोल दो।” एक और रिवायत में है: सअद बिन उबादा (रज़ि०) रसूलुल्लाह (सल्ल०) से मिलने आए। उन्होंने इजाज़त माँगी और दरवाज़े के सामने खड़े हो गए। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने इशारे से कहा: “किनारे हो जाओ।” फिर थोड़ी देर बाद बुलाया और फ़रमाया: “इजाज़त माँगना नज़र बचाने के लिए ही है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6241)
दस्तरख़ान पर किसे बुलाया जाए
मअ़न कहते हैं: अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) जब खाना तैयार करते और कोई अमीर गुज़रता तो उसे नहीं बुलाते, लेकिन उनके बेटे और भतीजे बुला लेते। और अगर कोई ग़रीब आता तो अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) उसे बुलाते, मगर उनके बेटे और भतीजे नहीं बुलाते। उन्होंने कहा: “ये लोग उस इंसान को बुलाते हैं जिसे भूख नहीं और जिसे भूख है उसे छोड़ देते हैं।” (अत्तबक़ातुल-कबीर, इब्ने साद, असर संख्या 5084)
घर वालों की मर्ज़ी पर चलना
दीनी मेज़ाज नहीं
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि०) कहते हैं: मेरी मुलाक़ात हज़रत उमर (रज़ि०) से हुई। मैं एक दिरहम का गोश्त ख़रीदकर घर जा रहा था। उन्होंने पूछा: “यह क्या है?” मैंने कहा:
“घरवालों की बड़ी इच्छा थी, इसलिए मैंने उनके लिए गोश्त खरीदा है।” यह सुनकर उमर (रज़ि०) बार-बार मेरे शब्द “घरवालों की बड़ी इच्छा” को दोहराते रहे। मैंने सोचा कि काश वह दिरहम गिर जाता या मेरी उनसे मुलाक़ात न हुई होती। (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 5285)
एक और रिवायत में है: हज़रत जाबिर (रज़ि०) ने कहा: “मैंने अपने घरवालों के लिए गोश्त खरीदा क्योंकि उनकी बहुत इच्छा थी।” यह सुनकर उमर (रज़ि०) ने कहा: “क्या जब भी तुम्हें किसी चीज़ की इच्छा होगी तुम उसे खरीद कर खा लोगे? क्या तुम्हें डर नहीं कि तुम उन लोगों में से हो जाओ जिनके बारे में अल्लाह ने क़ुरआन (46:20) में कहा है: ‘तुमने अपनी नेमतें दुनिया ही में ले लीं।’” (अल-मुहर्रर अल-वजीज़, खण्ड 5, पृष्ठ 101)
भाई से रिश्ता तोड़ना उसे क़त्ल करने जैसा है
अबू ख़िराश सुलमी कहते हैं कि उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को ये कहते सुना:
“जिसने अपने भाई से एक साल तक रिश्ता तोड़े रखा, तो ये ऐसे है जैसे उसने उसका ख़ून बहाया हो।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 4915)
