ग़ुस्से में मत आओ
बर्ट्रेंड रसेल एक बहुत ही आज़ाद-ख़्याल इंसान थे। वे अकसर ऐसी ग़ैर-पारंपरिक बातें करते थे, जिससे रूढ़िवादी लोग नाराज़ हो जाते थे। अपने एक लेक्चर के दौरान हुई एक घटना को वे इस तरह बताते हैं—
“एक आदमी ग़ुस्से में उठ खड़ा हुआ और बोला कि मैं एक बंदर जैसा दिखता हूँ। मैंने उसे जवाब दिया— तो फिर आपको ख़ुश होना चाहिए कि आप अपने पूर्वजों की आवाज़ सुन रहे हैं।”
(आत्मकथा, पेज 565)
बर्ट्रेंड रसेल का यह जवाब ‘इवोल्यूशन के सिद्धांत’ (Theory of Evolution) के पीछे की सोच पर आधारित है। इस सिद्धांत के मुताबिक़, इंसान बंदरों की नस्ल से आया है। हालाँकि हमें यहाँ इस सिद्धांत की सच्चाई पर बहस नहीं करनी। हमने यह घटना इसलिए बताई है, क्योंकि यह बिना ग़ुस्सा किए जवाब देने की एक बढ़िया मिसाल है।
जब कोई आपके ख़िलाफ़ कोई कड़ा जुमला कहे या आप पर तेज़ आलोचना करे, तो एक तरीक़ा यह है कि आप सुनकर बिफर जाएँ और उसकी सख़्त बात का जवाब भी उतनी ही सख़्ती और ग़ुस्से से दें। यह जवाब देने का बेवक़ूफ़ाना तरीक़ा है।
दूसरा तरीक़ा यह है कि आप भड़काऊ बात सुनकर ग़ुस्से में न आएँ। कोई चाहे जितनी भी सख़्त बात बोले, आप अपना संतुलन बनाए रखें। आपका जवाब रिएक्शन वाला न हो, बल्कि सोच-समझकर दिया गया पॉज़िटिव जवाब हो।
जवाब देने का पहला तरीक़ा सिर्फ़ ग़ुस्से को और बढ़ाता है, जबकि दूसरा तरीक़ा ग़ुस्से को ठंडा करने वाला होता है। यह ऐसा ही है, जैसे आग पर पानी डाल देना।
इसके अलावा जवाब देने का दूसरा तरीक़ा आलोचक को चुप कराने की सबसे अच्छी चाल है। ऊपर बताई गई घटना में बर्ट्रेंड रसेल का जवाब जितना कारगर साबित हुआ, वह कभी भी उतना कारगर नहीं होता, अगर उन्होंने ग़ुस्से में आकर जवाब दिया होता।
