हज का जज़्बाती पहलू
क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि मैंने जिन्नों और इंसानों को सिर्फ इस लिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें (51:56)। इससे मालूम होता है कि अल्लाह की इबादत का जज़्बा इंसान के अंदर उसके जन्म से ही रखा गया है। इंसान को न सिर्फ यह कि वाक़ई तौर पर ख़ुदा की इबादत करना चाहिए बल्कि उसकी फ़ितरत का तक़ाज़ा भी यही है कि वह ऐसा करे। ख़ुदा की इबादत खुद इंसान की अपनी फ़ितरत है। यही वजह है कि ख़ुदा की इबादत के सिवा कोई चीज़ इंसान को हक़ीक़ी तौर पर मुतमइन नहीं करती : “सुन लो कि अल्लाह की याद ही से दिलों को इत्मीनान हासिल होता है। (13:28)
जिस तरह एक छोटा बच्चा अपने अंदरूनी जज़्बे के तहत मजबूर होता है कि वह अपनी माँ की तरफ़ दौड़े। उसी तरह इंसान भी अपनी अंदरूनी पुकार की वजह से मजबूर है कि वह ख़ुदा की तरफ़ दौड़े। इंसान अपनी अंदरूनी शख्सियत को बदल नहीं सकता, इसलिए वह ख़ुदा को भी अपने दिल व दिमाग से निकाल नहीं सकता।
दुनिया की तारीख़ के बिलकुल शरुआती दिनों से ही इंसान मज़हबी रहा है। हर ज़माने में वह एक ख़ुदा रखता था या कई ख़ुदा, जिसकी ओर वह अपनी हिफ़ाज़त के लिए देख सके। कभी ये ख़ुदा लकड़ी के बने हुए होते थे, कभी पत्थर के। कभी जानवरों और साँपों को ख़ुदा समझ लिया गया, वगैरह। मगर किसी न किसी सूरत में वे थे। और इंसान ज़रूरी समझता था कि वह उनकी पूजा करे। क्योंकि मज़हब, एक माफ़ौक़ ताक़त (अलौकिक शक्ति) की पूजा की सूरत में, इंसान की फ़ितरत के पूरे ढाँचे में रचा बसा है।
यह एक हक़ीक़त है कि ख़ुदा का शऊर इंसान की फ़ितरत में पैदाईशी तौर पर मौजूद है। हालांकि यह समझ पूरी तरह वाज़ह नहीं है। इसलिए इंसान ऐसा करता है कि जब वह हक़ीक़ी ख़ुदा को नहीं पाता तो वह ख़ुद के बनाये हुए ख़ुदाओं की इबादत करने लगता है। फ़ितरत के ज़ोर पर उसके अंदर इबादत का जज़्बा उभरता है। अगर उसके सामने पैग़म्बर की रहनुमाई हो तो उसका यह जज़्बा उस एक खुदा जिसका कोई साझी नहीं, की सूरत में अपना जवाब पा लेगा। और अगर पैग़म्बर की रहनुमाई उसके सामने न हो तो वह अपने जज़्बे के बनावटी सुकून के लिए ग़ैर-ख़ुदाओं को ख़ुदा मानकर उनकी इबादत करने लगेगा।
इंसान का असल लक्ष्य सिर्फ़ एक है और वह वही है जो उसका ख़ालिक़ व मालिक है। यह लक्ष्य उसकी फ़ितरत में गहराई के साथ शामिल है। इंसान यकसू (एकाग्र) होकर अपनी फ़ितरत पर ग़ौर करे तो वह खुद अपने अंदर ख़ुदा को पा लेगा। वह उसे अपने दिल की धड़कनों में महसूस करेगा। यह फ़ितरत मानो इंसान का “ला-शऊर” (अवचेतन) है। पैग़म्बर इसी ला-शऊर को शऊर (चेतना) का दर्जा देता है।
हालाँकि इंसान जैसी मख़लूक के लिए सिर्फ़ यह परोक्ष (ग़ैबी) पहचान काफ़ी नहीं होती। इंसान चाहता है कि वह खुदा को देखे और महसूस भी कर सके। लेकिन यहाँ रुकावट यह है कि ख़ुदा को सीधे तौर पर देखना, असली मायनों में, आख़िरत से पहले मुमकिन नहीं है।
