हज्जे-विदा के ख़ुतबे का संदेश
हज्जतुल विदा का खुत्बा रसूलुल्लाह (सल्ल०) की आख़िरी और सबसे अहम तक़रीर है। यह वह खुत्बा है जो आपने 9 ज़िलहिज्जा 10 हिजरी को मैदाने अरफ़ात में दिया था। हज्जतुल विदा मानो नुबूवत के दौर का सबसे बड़ा इस्लामी सम्मेलन था। इस मौक़े पर लगभग सवा लाख सहाबी मौजूद थे। उस समय अपनी वफ़ात से लगभग दो महीने पहले यह खुत्बा दिया। इसमें आपने उन सभी बातों का आख़िरी ऐलान किया जिनके लिए अल्लाह की तरफ़ से आपको भेजा गया था।
यह खुत्बा एक शब्द में अल्लाह की महानता और इंसानों की समानता का ऐलान था। आपने बताया कि इंसानों के बीच असली फ़र्क़ सिर्फ़ एक है और वह यह है कि कौन अल्लाह को मानने वाला है और कौन नहीं। इसके अलावा बाक़ी सभी फ़र्क़ बनावटी हैं। आपने दूसरे फ़र्क़ को ग़लत ठहराया और ईमान वालों को ज़िम्मेदारी दी कि वह हमेशा इसका ऐलान करते रहें।
इस पूरे खुत्बे का ख़ुलासा इस जुमले में है: “ख़बरदार ज़ुल्म न करना, ख़बरदार ज़ुल्म न करना।” इस खुत्बे का मक़सद हर तरह के ज़ुल्म का रास्ता बंद करना है, चाहे वह अंधविश्वास की वजह से पैदा हुआ हो या ग़लत क़ानूनों की वजह से, या घमंड और सरकशी की वजह से।
इस मक़सद के लिए यह एलान कर दिया गया कि उसूली तौर से हर शख़्स का खून, उसका माल और उसकी इज़्ज़त दूसरे के लिए हराम है, सिवाय इसके कि अल्लाह के वाज़ेह कानून के आधार पर उसका कोई उचित कारण हो। अज्ञानता के समय की परंपराओं और बदले की भावनाओं के तहत जो कार्य एक दूसरे के ख़िलाफ़ किए जाते थे, उन्हें पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे दिया गया।
सूदी लेन-देन को बिल्कुल हराम ठहरा दिया गया जो कि समाज के विभिन्न तबक़ों के बीच आर्थिक ज़ुल्म पैदा करता है। इसी के साथ बिल्वास्ता (अप्रत्यक्ष) तरीक़ों से सामाजिक इंसाफ़ में ज़बरदस्त रुकावट है। औरतों के हक़ स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिए गए हैं। और मर्दों को इससे रोक दिया गया कि वे औरत को कमज़ोर पाकर उन्हें अपनी ज़्यादती का निशाना बनाएं।
इंसानों के बीच आपसी मामलों के लिए ख़ुदा की किताब और रसूल की सुन्नत को आख़िरी मेयार (मानक) ठहरा दिया गया। लोगों को पाबंद किया गया कि वे अपने हर विवाद का फ़ैसला क़ुरआन और सुन्नत की हिदायतों के अनुसार करें—चाहे वह फ़ैसला उनकी इच्छा के मुताबिक़ हो या उसके ख़िलाफ़।
मुसलमानों को उनकी गुमराही के सबसे बड़े कारण—आपसी झगड़ों—से बचने की ताकीद की गई। अल्लाह ने दीन को इतना महफ़ूज़ और मज़बूत बना दिया है कि अब उसमें बिगाड़ के लिए शैतान सीधा रास्ता नहीं पा सकता। लेकिन वह अलग-अलग बहानों और बेबुनियाद विवाद खड़े करके मुसलमानों को आपस में उलझाने की कोशिश करेगा। अगर मुसलमान इस फ़ितने से बच गए, तो फिर कोई दूसरी चीज़ उन्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
ईमान का तक़ाज़ा यह है कि मुसलमान के अंदर अमानत निभाने का गहरा एहसास पैदा हो। अल्लाह के दीन का पैग़ाम दूसरों तक पहुँचाना भी अमानत की अदायगी है। लोगों की अमानत (माल) उन्हें लौटाना भी उसी का हिस्सा है। इसी तरह, किसी लायक़ व्यक्ति की क़ाबिलियत को मानकर उसके लिए जगह छोड़ देना भी अमानतदारी है। मुसलमान को हर मामले में इस बात का पाबंद बनाया गया है कि वह अमानत को पूरी ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ अदा करे।
रसूलुल्लाह (सल्ल०) का यह ख़ुत्बा मानो एक ज़िंदा पुकार है। वही हाजी हक़ीकी मायनों में हाजी है जो हज के दौरान इस पुकार को सुने और वहाँ से इस हाल में लौटे कि यह ख़ुत्बा उसकी पूरी ज़िंदगी की कार्य-योजना बन गया हो।
