रोज़ा और मानवीय सहानुभूति
हज़रत सलमान फ़ारसी से एक लंबी रिवायत आई है। इस रिवायत में रमज़ान के बारे में रसूल अल्लाह (सल्ल०) के ये शब्द आए हैं: “यह सहानुभूति का महीना है” (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 3336)। अर्थात रमज़ान का महीना मानवीय सहानुभूति का महीना है।
उक्त हदीस में रमज़ान को मुवासात (philanthropy) का महीना कहा गया है। मुवासात का अर्थ है किसी इंसान की आर्थिक या ग़ैर-आर्थिक मदद करना। इसके लिए क़ुरआन में ‘मर्हमा’ (90:17) का शब्द आया है। मर्हमा का अर्थ भी लगभग वही है जो मुवासात का है, यानी इंसानों के साथ सहानुभूति और दया का व्यवहार करना (सृष्टि के प्रति करुणा)। मुवासात एक नैतिक दायित्व है, जो हर समय और हर परिस्थिति में ईमान वालों से अपेक्षित होता है, लेकिन रमज़ान के महीने में इस नैतिक ज़िम्मेदारी का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।
रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने का एक पहलू यह है कि वह लोगों के भीतर मानवीय सहानुभूति की भावना को जगाता है। रोज़ा मानो उस अभाव की स्थिति को अपनी इच्छा से अपने ऊपर लागू करना है, जो दूसरों के साथ मजबूरी में होती है। इस प्रकार रोज़ा यह करता है कि वह एक नैतिक दायित्व को रोज़ेदार के लिए उसका निजी अनुभव बना देता है। इसी निजी अनुभव के कारण वह मानवीय सहानुभूति के विषय को अधिक गहराई से समझता है और उस पर अमल करने के लिए तैयार हो जाता है।
रोज़ा एक ओर इंसान के भीतर अल्लाह से उसके संबंध को सुदृढ़ करता है, और दूसरी ओर रोज़ेदार के अंदर मानव-सेवा की भावना को और अधिक विकसित करता है। रमज़ान के महीने के बाद इंसान पहले से बेहतर रूप में अल्लाह का इबादतगुज़ार (उपासक) बन जाता है और साथ ही पहले से बेहतर ढंग से इंसानों की सेवा करने वाला भी बनता है। रोज़ा एक दृष्टि से अल्लाह की इबादात का अनुभव है और दूसरी दृष्टि से मानवीय सेवा की शिक्षा और प्रशिक्षण का साधन।
