न्याय ज़िंदा है
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके नई दिल्ली निवास स्थान पर 31 अक्तूबर 1984 को हत्या कर दी गई थी। इस हत्या में चार व्यक्ति शामिल थे—सुरक्षा दल के बेअंत सिंह और सतवंत सिंह। दोनों ने प्रधानमंत्री पर गोलियाँ चलाईं। बेअंत सिंह को सुरक्षा पुलिस ने उसी समय गोली मारकर मार डाला, और सतवंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। बाक़ी दो व्यक्ति कहर सिंह और बलबीर सिंह थे, जिन्हें हत्या की साज़िश रचने और उसकी योजना बनाने का दोषी ठहराया गया था। इन तीनों पर मुक़दमा चला। दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महेश चंद्र ने 22 जनवरी 1986 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें सतवंत सिंह, क़हर सिंह और बलबीर सिंह को मौत की सज़ा दी गई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट में गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 दिसंबर 1986 के अपने फैसले में तीनों की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा। फिर अभियुक्तों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 1988 को अपना सर्वसम्मत निर्णय सुनाया। यह फैसला न्यायमूर्ति जी. एल. ओझा, न्यायमूर्ति सेठी और न्यायमूर्ति बी. सी. राय की तीन सदस्यीय पीठ ने दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सतवंत सिंह और क़हर सिंह की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा, लेकिन बलबीर सिंह को पूरी तरह बरी कर दिया। बलबीर सिंह के ख़िलाफ़ हत्या में शामिल होने का कोई सीधा सबूत नहीं मिला। उदाहरण के लिए अभियोजन की ओर से यह कहा गया था कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या इसलिए हुई क्योंकि ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण सिख लोग उनसे नाराज़ हो गए थे, और खुद बलबीर सिंह के मुँह से बदला लेने की बात सुनी गई थी। इस दलील का ज़िक्र करते हुए न्यायमूर्ति ओझा ने लिखा कि अगर ब्लू स्टार ऑपरेशन पर गुस्से या विरोध के भाव को अभियुक्त के ख़िलाफ़ सबूत माना जाए, तो उन सभी सिखों को साज़िश में शामिल करना पड़ेगा जो ब्लू स्टार ऑपरेशन पर नाराज़ थे।
न्यायमूर्ति ओझा ने आगे कहा कि बलबीर सिंह को छोड़ देने में गलती करना, उसे सज़ा देने में गलती करने से बेहतर है—“It is safer to err in acquitting than in convicting him.”
इस घटना पर केवल वही टिप्पणी काफ़ी है जो बलबीर सिंह ने कही। उसने कहा —“मुझे न्याय की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी, मगर अब मुझे यक़ीन हो गया है कि इस देश में न्याय ज़िंदा है।”
