हज्जे मबरूर
हज्जे मबरूर को अक्सर लोग हज्जे मक़बूल के समान अर्थ में समझते हैं। जबकि इसका मतलब यह है कि “ऐसा हज जिसमें कोई गुनाह शामिल न हो” (शरह नववी, खंड 9, पृष्ठ 118-119)
हसन बसरी ताबिई ने कहा है कि, “हज्जे मबरूर वह है जिससे आदमी इस तरह लौटे कि उस के अंदर से दुनिया की चाहत निकल जाए और आख़िरत की चाहत उसके अंदर पैदा हो जाए” (अत-तारीख अल-कबीर, अल-बुख़ारी, खण्ड 4, पृष्ठ 99)
हक़ीक़त में, अगर हज सही समझ और भावना के साथ किया जाए, तो न केवल हज के दौरान आदमी गुनाहों से बचा रहेगा, बल्कि वह इस तरह लौटेगा कि हर बुराई से उसका दिल हट चुका होगा और हर भलाई में उसकी दिलचस्पी पैदा हो चुकी होगी।
