बताए बिना
मैंने एक अंग्रेज़ी किताब में एक दिलचस्प वाक़या पढ़ा। उसके शब्द इस प्रकार थे—
“जब सर चार्ल्स नेपियर ने 1843 में सिंध फ़तह किया, तो उसने गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी को जीत का पैग़ाम इन शब्दों में भेजा—‘पेकावी’, जिसका लातीनी भाषा में मतलब है—‘मैंने गुनाह किया है’।”
ऊपर से देखने में यह बहुत अजीब पैग़ाम था। फ़ौजी अफ़सर और गवर्नर-जनरल के बीच पहले से ऐसी कोई सहमति नहीं थी, जिससे वह इसका मतलब समझ जाता। इसके बावजूद गवर्नर-जनरल इसे समझ गया। जब उसने ‘पेकावी’ का अंग्रेज़ी अनुवाद काग़ज़ पर लिखा, तो वह यह था—“I have sinned!” इसे देखकर वह तुरंत समझ गया कि इसका मतलब यह है—“मैंने सिंध को जीत लिया है।” (चूँकि ‘sinned’ सुनने में ‘Sindh’ जैसा लगता है।)
नाज़ुक और बड़े मामलों को सँभालने के लिए हमेशा ऐसे ही होशियार और दूरदर्शी लोगों की ज़रूरत होती है यानी ऐसे लोग, जो इशारों से ही बात समझ जाएँ। जो न कही हुई बात को कही हुई बात की तरह जान लें। जो उस बात को पढ़ लें, जो लिखी हुई लाइनों में मौजूद नहीं है और कभी हो भी नहीं सकती।
ज़िंदगी की हक़ीक़तों में से एक हक़ीक़त यह है कि हर बात पहले से नहीं बताई जा सकती। बहुत-सी बातों को बताए बिना ही जानना पड़ता है। जिन लोगों के अंदर यह क़ाबिलियत होती है, वही कोई ख़ास काम कर पाते हैं और जो लोग इस क़ाबिलियत से महरूम हों, वे सिर्फ़ नादानियाँ ही करेंगे और फिर शिकायतों का हिसाब-किताब लेकर बैठ जाएँगे।
दुनिया में सबसे ज़्यादा ख़ुशक़िस्मत इंसान वह है, जिसे ऐसे साथी मिल जाएँ, जो ‘चुप्पी की ज़बान’ समझते हों, जो बोले बिना सुन लें और लिखे बिना पढ़ लें, जो लिखी हुई लाइनों से आगे बढ़कर ‘लाइनों के बीच’ छुपी हुई बातों को जान लें।
