अल्फ्रेड एडलर (1870-1937) आज के ज़माने के एक मशहूर मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने ख़ास तौर पर ‘व्यक्तिगत मनोविज्ञान’ (individual psychology) पर काम किया था। उनके बारे में एक जानकार ने लिखा है—
“लोगों और उनकी छुपी हुई ताक़तों पर पूरी ज़िंदगी रिसर्च करने के बाद महान मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडलर ने कहा कि इंसान की सबसे ख़ास बात है— माइनस को प्लस में बदल देने की उसकी क़ाबिलियत।”
इंसानों की छुपी हुई ताक़तों को ज़िंदगीभर पढ़ने के बाद अल्फ्रेड एडलर ने कहा कि इंसान की सबसे ग़ज़ब की ख़ूबी है— ‘ना’ को ‘हाँ’ में बदल देना।
ईश्वर ने इंसान को बेहद ख़ास क़ाबिलियतों के साथ बनाया है। एक मनोवैज्ञानिक के ये शब्द उसी सच्चाई को मानते हैं। इस क़ाबिलियत की सीमा यह है कि इंसान अँधेरे में भी रोशनी की एक किरण देख सकता है। वह बुरे हालात को अच्छे हालात में बदल सकता है। जब उसके पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है, तो भी वह अपने लिए एक नया मैदान ढूँढ लेता है और उसमें मेहनत करके दोबारा अपनी मंज़िल तक पहुँच जाता है।
यह किताब इंसानी ज़िंदगी के इसी पहलू के बारे में है। यह नामुमकिन में मुमकिन को ढूँढने की एक कोशिश है। यह निराशा में आशा जगाने का एक संदेश है और शायद आज के इंसान को इसकी पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है।
मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान
(दिल्ली; 30 मई, 1986)
