जो छोटी बुराई पर सब्र नहीं करता,
उसे बड़ी बुराई पर राज़ी होना पड़ता है
अबू जाफ़र ख़तमी बताते हैं कि उनके दादा उमैर बिन हबीब (रज़ि०) ने अपने बेटे को समझाया: “मूर्ख लोगों की संगत से बचो और उनकी तरफ़ से होने वाली तकलीफ़ें बर्दाश्त कर लो। क्योंकि जो इंसान मूर्ख की छोटी गलती नहीं सहता, उसे बाद में उसकी बड़ी गलती सहनी पड़ती है।” (अल-मोजम अल-अवसत, हदीस संख्या 2258)
झगड़ा खत्म करने के लिए हर हाल
में सुलह कर ली
सुलह-ए-हुदैबिया का समझौता लिखा जा रहा था। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अली (रज़ि०) से कहा: “लिखो—बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर-रहीम।” कुरैश की तरफ़ से सुहैल बिन अम्र मौजूद थे। उन्होंने कहा: “हम नहीं जानते ‘रहमान’ क्या है। आप हमारे तरीक़े से लिखो—बिस्मिक अल्लाहुम्मा।” मुसलमानों ने कहा: “ऐसा नहीं हो सकता, हम तो सिर्फ़ बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ही लिखेंगे।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “लिखो—बिस्मिक अल्लाहुम्मा।” फिर आपने कहा: “लिखो—यह समझौता है जो मुहम्मद रसूलुल्लाह ने किया।” सुहैल ने कहा: “अगर हम आपको मानते कि आप अल्लाह के रसूल हैं तो न आपको रोकते और न ही युद्ध करते। आप लिखो—मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह।” मुसलमानों को यह बहुत बुरा लगा, लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “लिखो—मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह।” अली (रज़ि०) इसे मिटाने को तैयार नहीं हुए, तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने खुद ‘रसूलुल्लाह’ शब्द मिटा दिया।
फिर सुहैल ने कहा: “इस साल आप लौट जाएँ, अगले साल आकर तवाफ करें।” यह शर्त भी मान ली गई। इसके बाद उन्होंने शर्त रखी कि अगर कुरैश का कोई आदमी मुसलमान होकर मदीना जाए तो मुसलमान उसे लौटा देंगे, लेकिन अगर मदीना का कोई मुसलमान उनके हाथ लग गया तो वे उसे वापस नहीं करेंगे। मुसलमान नाराज़ हुए, लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने यह भी मान लिया। इस तरह दस साल का जंग न करने का समझौता हो गया। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1189)
नाज़ुक वक़्त पर समझदारी भरा जवाब
हिजरत के सफ़र में रसूलुल्लाह (सल्ल०) और अबू बक्र (रज़ि०) तीन रात ग़ार-ए-सौर में रहे। फिर वहाँ से निकले और जाना-पहचाना रास्ता छोड़कर समुद्र किनारे का रास्ता चुना। दोनों ऊँटों पर थे। अबू बक्र कभी आगे चलते, कभी पीछे। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने पूछा: “अबू बक्र, तुम कभी आगे और कभी पीछे क्यों चलते हो?” उन्होंने कहा: “जब पीछा करने वालों का ख़याल आता है तो पीछे चलने लगता हूँ, और जब घात लगाकर बैठे दुश्मनों का सोचता हूँ तो आगे बढ़ जाता हूँ।” रास्ते में कोई जानने वाला पूछता कि यह आपके साथ कौन हैं? तो अबू बक्र छोटा-सा जवाब देते: “यह मुझे रास्ता दिखाने वाले हैं।” (अल-मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 32410)
दुनिया देकर आख़िरत का सफ़र
सुहैब रूमी (रज़ि०) मक्का से हिजरत करने वालों में से थे। वे लोहार का काम करते थे। जब निकले तो कुरैश के कुछ लोगों ने पीछा करके उन्हें पकड़ लिया और उनसे कहा: “सुहैब! तुम यहाँ खाली हाथ आए थे और अब अपना माल भी लेकर जाना चाहते हो? यह नहीं होगा।” सुहैब ने कहा: “अगर मैं अपना माल तुम्हें दे दूँ तो क्या मुझे छोड़ दोगे?” उन्होंने कहा: “हाँ।” सुहैब ने अपना सोना उन्हें दे दिया तो वह उन्हें छोड़कर चले गए। सुहैब मदीना पहुँचे।
जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह मालूम हुआ तो आपने कहा: “सुहैब ने फ़ायदे का सौदा किया, सहैब ने फ़ायदे का सौदा किया।” (सहीह इब्न हिब्बान, हदीस संख्या 7082)
इस्लाम में ज्ञान का महत्व
बद्र की लड़ाई में सत्तर क़ैदी पकड़े गए। जो लोग फ़िदया (ransom) नहीं दे सकते थे, उनसे कहा गया कि वे अंसार में से दस-दस लोगों को लिखना-पढ़ना सिखाएँ। ज़ैद बिन साबित ने भी इसी तरह लिखना पढ़ना सीखा। बाद में वे नबी (सल्ल०) के क़ुरआन लिखने वाले (कातिबे वह्य) बने। उम्र बढ़ने पर उन्होंने और भी भाषाएँ सीख लीं। वे छह भाषाएँ जानते थे। (अत्तबक़ातुल कुबरा, खण्ड 2, पृष्ठ 16)
ग़ुस्से का इलाज—चुप हो जाना है
अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “तुममें से किसी को ग़ुस्सा आए तो वह चुप हो जाए।” आपने यह बात तीन बार दोहराई। (जामिउल उलूम वल-हिकम, खण्ड 1, पृष्ठ 366)
मामलों में दूरदर्शिता अपनाना
मक्का की विजय के वक़्त अंसार की टुकड़ी के सरदार सअद बिन उबादा थे। जब वे मक्का में दाख़िल हुए तो ऊँची आवाज़ में बोले: “आज खूनी जंग का दिन है, आज पाबंदी तोड़ी जाएगी, आज अल्लाह ने क़ुरैश को अपमानित कर दिया।” अबू सुफ़यान ने यह बात नबी (सल्ल०) से कह दी। नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “नहीं, आज रहमत का दिन है। आज अल्लाह क़ुरैश को इज़्ज़त देगा।” इसके बाद आपने सअद से झंडा लेकर उनके बेटे क़ैस को दे दिया। इब्ने क़य्यिम लिखते हैं कि सअद को बुरा नहीं लगा, क्योंकि झंडा फिर भी उनके बेटे के हाथ में रहा। (फ़त्हुल बारी, खण्ड 12, पृष्ठ 95)
दीन में सख़्ती नहीं
हज़रत आयशा कहती हैं: जब भी नबी (सल्ल०) के सामने दो कामों में से चुनने की बात होती तो आप हमेशा आसान को चुनते, लेकिन जब की वह गुनाह न हो। और अगर उसमें गुनाह होता तो आप सबसे ज़्यादा उससे दूर रहने वाले थे। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3560)
विरोधी से वही माँगो जो उसके लिए स्वीकार्य हो
नबी (सल्ल०) ने नज्रान के लोगों को ख़त भेजा। उन्होंने तीन लोगों को मदीना भेजा: शुरह्बील बिन वदाआ, अब्दुल्लाह बिन शुरह्बील और जब्बार बिन फैज़। उन्होंने हालात देखे। शुरह्बील ने कहा: “मामला कड़ा है। अगर यह शख़्स सच में नबी है और हम इनकार कर दें तो हम अरब में पहले लोग होंगे जो उसकी नज़र में गिरेंगे। वह और उसके साथी हमें कभी माफ़ न करेंगे।” दोनों ने पूछा: “तो तुम्हारी राय क्या है?” शुरह्बील ने कहा: “मेरी राय है कि समझौते की बात करूँ, क्योंकि यह शख़्स कभी हद से ज़्यादा नहीं माँगता।” (अल-बिदायह वन्निहायह, खण्ड 5, पृष्ठ 54)
लोगों के साथ नरमी और सहनशीलता रखो
हज़रत अबू हुरैरा बताते हैं: एक देहाती मदीना आया और मस्जिद-ए-नबवी में पेशाब करने लगा। लोग उसे मारने दौड़े। नबी (सल्ल०) ने रोका और कहा: “उसे छोड़ दो। और जहाँ उसने पेशाब किया है वहाँ पानी डाल दो।” फिर आपने फ़रमाया: “तुम सख़्ती के लिए नहीं भेजे गए हो, बल्कि आसानी पैदा करने के लिए भेजे गए हो।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 380)
मामलों में नियम और अनुशासन
हज़रत अबू हुरैरा कहते हैं: वे अबू मूसा अशअरी के यहाँ से आठ लाख दिरहम लेकर मदीना आए। सुबह की नमाज़ के बाद हज़रत उमर ने कहा: “रात मेरे पास इतना माल आया है जितना पहले कभी नहीं आया। मेरी राय है कि इसे नाप-नाप कर सबमें बाँट दूँ। तुम राय दो।” हज़रत उस्मान ने कहा: “सबको ज़रूरत होगी। अगर हिसाब न रखा जाए तो गड़बड़ होगी।” हज़रत वलीद बिन मुग़ीरा बिन हिशाम ने कहा: “मैं शाम गया था, वहाँ बादशाहों को देखा कि उन्होंने रजिस्टर और कारिंदे रखे हैं। आप भी ऐसा करें।” हज़रत उमर ने यह राय मान ली और तीन लोगों अक़ील बिन अबी तालिब, मखरमा बिन नौफ़ल, और जुबैर बिन मुतइम को रजिस्टर तैयार करने का काम सौंप दिया। (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 1781)
चुप रहना भी सीखो जैसे बोलना सीखते हो
अबू-दर्दा (रज़ि०) ने लोगों को नसीहत करते हुए कहा–
“जैसे बोलना सीखते हो, वैसे ही चुप रहना भी सीखो। चुप रहना बहुत बड़ी समझदारी है। कोशिश करो कि बोलने से ज़्यादा सुनो। किसी ऐसी बात पर मत बोलो जिसका तुमसे कोई मतलब ही न हो। बिना वजह मत हंसो और बिना ज़रूरत कहीं मत जाओ।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 8703)
नसीहत का रास्ता मुश्किलों से भरा होता है
हज़रत उमैर बिन हबीब (रज़ि०) ने अपने बेटे से कहा—“अगर कोई अच्छाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना चाहता है तो उसे लोगों की तरफ़ से तकलीफ़ें झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे अल्लाह के इनाम पर भरोसा रखना चाहिए। जिसने अल्लाह के इनाम पर भरोसा किया, लोगों की तकलीफ़ें उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकतीं।” (अल-मोजम अल-कबीर, असर संख्या 108)
सत्ता बदलने के नाम पर
क़त्ल सही नहीं
हज़रत हसन बिन अली (रज़ि०) और हज़रत मुआविया (रज़ि०) की फ़ौजें आमने-सामने थीं। जब सुलह की ख़बर आई तो फ़ौजियों का ग़ुस्सा ठंडा पड़ गया। कूफ़ा में जब हसन बिन अली आए तो हम में से एक शख़्स ने कहा—“सलाम हो तुम पर, ऐ मुसलमानों को अपमानित करने वाले।” उन्होंने जवाब दिया—“ऐ अबू आमिर! ऐसा मत कहो। मैंने मुसलमानों को नीचा नहीं किया, बल्कि मुझे यह अच्छा नहीं लगा कि मैं सत्ता के लिए लोगों की जान लूँ।” (अल-मुस्तदरक अल-हाकिम, असर संख्या 4812)
अपनी इच्छाओं से लड़ना असली जिहाद है
हज़रत जाबिर (रज़ि०) कहते हैं—एक ग़ज़वा से हम लौटे तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“तुम छोटे जिहाद से बड़े जिहाद की तरफ़ आए हो।” लोगों ने पूछा—“बड़ा जिहाद क्या है?” उन्होंने फ़रमाया—“इंसान का अपनी खुद की इच्छाओं के ख़िलाफ़ संघर्ष करना।” (जामिउल उलूम, हदीस संख्या 489)
हर व्यक्ति के साथ उसका शैतान होता है
हज़रत सुलैम बिन हनज़ला रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हम हज़रत उबैय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गए ताकि उनसे कुछ सुनें। फिर हज़रत उबैय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु उठे और हम भी उठे और उनके पीछे चल पड़े। रास्ते में हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु से मुलाक़ात हुई। उन्होंने फ़रमाया, “क्या तुम्हें मालूम नहीं कि आगे चलने वाले के लिए यह एक फ़ितना (परीक्षा) है और पीछे चलने वाले के लिए यह ज़िल्लत (अपमान) है?” (कंज़ुल उम्माल, असर नंबर 41920)
अल्लाह को वही अमल पसंद है
जो लगातार किया जाए
हज़रत आयशा (रज़ि अल्लाहु अन्हा) बताती हैं—रसूलुल्लाह (सल्ल०) दिन में एक चटाई पर बैठते और रात को उसी पर खड़े होकर नमाज़ पढ़ते।
लोग आपके पास आने लगे और आपके साथ नमाज़ पढ़ने लगे। जब लोगों की संख्या बढ़ गई तो आपने कहा—“ऐ लोगो! उतना ही अमल करो जितना तुम कर सको। अल्लाह थकता नहीं, लेकिन इंसान थक जाता है। अल्लाह को वही अमल सबसे प्यारा है जो लगातार किया जाए, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 782)
जो दुनिया में गुमनाम रहता है, आख़िरत में
वही सबसे ज़्यादा नज़र आएगा
हज़रत अली बिन अबी तालिब (रज़ि०) कहते हैं–ख़ुद को इस तरह छुपाओ कि तुम्हारा ज़िक्र ही न हो और चुप्पी साध लो, तो तुम सुरक्षित रहोगे। (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 8699)
आदमी के माल में दूसरों का भी हिस्सा है
हज़रत जादह कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने एक आदमी को देखा जिसका पेट बहुत बड़ा था। आपने अपनी उंगली उसके पेट पर रखकर कहा—अगर यह खाना किसी और के पेट में गया होता तो तुम्हारे लिए बेहतर होता (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 18984)
बाप की ज़िम्मेदारियाँ
अबू नुऐम ने अबू राफ़े (रज़ि०) से बयान किया, जो रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ख़ादिम थे। वे कहते हैं, रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मुझसे पूछा—“ऐ अबू राफ़े, जब तुम गरीब हो जाओगे तो तुम्हारा क्या हाल होगा?” मैंने कहा—तो क्यों न मैं अभी से तैयारी कर लूँ। आपने कहा—हाँ, ज़रूर करो। फिर पूछा—तुम्हारे पास कितना माल है? मैंने कहा—चालीस हज़ार और यह सब अल्लाह के लिए है। आपने कहा—नहीं, इसका एक हिस्सा अल्लाह की राह में दो और एक हिस्सा रोक कर रखो, जिससे अपनी औलाद की देखभाल करो। मैंने पूछा—ऐ अल्लाह के रसूल, क्या बच्चों का भी हमारे ऊपर हक़ है जैसे हमारा उन पर है? आपने कहा—हाँ। बाप का हक़ बेटे पर यह है कि वह उसे अल्लाह की किताब (क़ुरआन) की तालीम दे, तीर चलाना और तैरना सिखाए और उसे अच्छे आचरण का वारिस बनाए। (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 184)
बहुत-सी शिकायतें ग़लतफ़हमी से पैदा होती हैं
मुआविया के ज़माने में एक आदमी सहल बिन सअद (रज़ि०) के पास आया और बोला—अमीर-ए-मदीना (मरवान बिन हकम) अली (रज़ि०) को बुरा कहता है। सहल ने पूछा—वह क्या कहता है? उसने कहा—वह उन्हें “अबू तुराब” कहता है। यह सुनकर सहल हँस पड़े और बोले—अल्लाह की क़सम! यह नाम तो खुद नबी (सल्ल०) ने दिया था और उनके लिए इससे प्यारा नाम कोई न था। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3703)
मरे हुए लोगों को बुरा मत कहो
इक्रिमा बिन अबू जहल की बीवी उम्मे हकीम (रज़ि०) फत्ह मक्का के दिन मुसलमान हुईं। उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कहा—मेरे पति इक्रिमा यमन भाग गए हैं, उन्हें डर है कि आप उन्हें क़त्ल कर देंगे। मैं चाहती हूँ कि आप उन्हें अमान (सुरक्षा) दे दें।
आपने कहा—उन्हें हमारी तरफ़ से अमान है। उम्मे हकीम उन्हें खोजने निकलीं और समुद्र किनारे पहुँचीं, जहाँ इक्रिमा नाव में सवार होकर जाने वाले थे। उन्होंने कहा—मैं उस शख़्स की तरफ से आई हूँ जो सबसे अच्छा है, तुम अपनी जान मत गँवाओ। बड़ी मुश्किल से उन्होंने उन्हें वापसी के लिए तैयार किया और कहा—मैंने तुम्हारे लिए रसूलुल्लाह (सल्ल०) से अमान ले ली है। जब वे लौटे तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने सहाबा से कहा–
इक्रिमा बिन अबू जहल ईमान लाकर और हिजरत करके आ रहे हैं। उनके बाप को बुरा मत कहना, क्योंकि मरे हुए को बुरा कहने से ज़िंदा आदमी को तकलीफ़ पहुँचती है और वह मृतक तक नहीं जाती। (अल-मुस्तद्रक अल-हाकिम, हदीस संख्या 5055)
संदेह पर राय क़ायम करना शैतान की राय है
उम्मुल मोमिनीन सफ़िया (रज़ि०) कहती हैं—रसूलुल्लाह (सल्ल०) एतकाफ़ में थे। मैं रात को मिलने गई और बातें करके लौटने लगी। आप भी मुझे विदा करने खड़े हुए। इतने में अंसार के दो आदमी गुज़रे। जब उन्होंने रसूलुल्लाह को इस हाल में देखा, तो उन्होंने जल्दी से वहाँ से निकल जाने का सोचा। आपने उन्हें बुलाकर कहा—“जल्दी मत करो, यह मेरी बीवी सफ़िया है।” दोनों ने कहा—“सुब्हानल्लाह, ऐ रसूलुल्लाह।” आपने कहा—शैतान इंसान की रगों में खून की तरह दौड़ता है। मुझे डर हुआ कि कहीं शैतान तुम्हारे दिलों में मेरी तरफ़ से कोई गलत ख्याल न डाल दे। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 3281)
सदक़ा (दान) हर इंसान पर ज़रूरी है
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “इंसान के हर जोड़ पर रोज़ एक सदक़ा होता है। हर दिन जब सूरज निकलता है, तो दो लोगों के बीच न्याय करना सदक़ा है। किसी को सवारी पर चढ़ने में या सामान रखने-उतारने में मदद करना सदक़ा है। मीठी बात कहना सदक़ा है। नमाज़ के लिए उठाया गया हर क़दम सदक़ा है। और रास्ते से कोई नुक़सान देने वाली चीज़ हटा देना भी सदक़ा है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2989)
अल्लाह को वही इंसान सबसे प्यारा है
जो अच्छे बर्ताव वाला हो
उसामा बिन शरीक (रज़ि०) कहते हैं: “हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास बैठे थे, ऐसे ख़ामोश जैसे सिर पर चिड़ियाँ बैठी हों। हम में से कोई कुछ बोल नहीं रहा था। इतने में कुछ लोग आए और पूछने लगे, ‘अल्लाह को उसके बंदों में सबसे ज़्यादा कौन पसंद है?’ आपने फ़रमाया: ‘जो इंसान सबसे अच्छे अख़लाक़ वाला हो।’” (सहीह इब्न हिब्बान, हदीस संख्या 4406)
लोगों के हक़ (अधिकार) पूरे करना
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अपनी वफ़ात से कुछ दिन पहले लंबा ख़ुत्बा दिया। आख़िर में आपने कहा: “मैं अल्लाह के सामने अपनी ज़िंदगी का सहीफ़ा (बही खाता) साफ़-सुथरा लेकर जाना चाहता हूँ। अगर किसी का कोई क़र्ज़ मुझ पर बाक़ी रह गया हो, या किसी को मुझसे जान-बूझकर या अनजाने में तकलीफ़ पहुँची हो, तो वह मुझसे बदला ले ले या मुझे माफ़ कर दे।” आपने रुककर इंतज़ार किया, मगर कोई आगे नहीं आया। फिर ज़ुहर की नमाज़ का वक़्त हो गया। आपने जमात के साथ नमाज़ पढ़ी। इसके बाद फिर मिम्बर (मस्जिद का उपदेश स्थान) पर आए और वही बात दोहराई। तब एक आदमी खड़ा हुआ और बोला: “ऐ अल्लाह के रसूल! आप पर मेरा तीन दिरहम कर्ज़ है।” आपने फ़ौरन हुक्म दिया और उसी वक़्त मस्जिद में तीन दिरहम अदा कर दिए गए। (अल-मोजम अल-अवसत, हदीस संख्या 2629)
हर एक के साथ इंसाफ़ करना,
चाहे कमज़ोर हो या ताक़तवर
मुआविया बिन अबू सुफ़यान ने ज़िरार सुदाई से कहा: “मुझ से अली की सिफ़त बयान करो।” उन्होंने कहा: “वह हम सबके बीच आम इंसान की तरह रहते थे। कोई ताक़तवर अपनी ग़लत बात पर उनसे फ़ायदा नहीं उठा सकता था और कोई कमज़ोर उनके इंसाफ़ से मायूस नहीं हो सकता था।” (तारीख़े दमिश्क़, खंड 24, पृष्ठ 401)
अल्लाह का डर सबसे बड़ी समझदारी है
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “हिकमत (सूझ-बूझ) की जड़ अल्लाह का डर है।” अबुल आलिया ने क़ुरआन की आयत “जिसे चाहे अल्लाह हिकमत देता है” (2:269) की तफ़सीर में कहा: “हिकमत का मतलब अल्लाह का डर है, क्योंकि अल्लाह का डर ही हर हिकमत की असल है।” (तफ़सीर इब्न कसीर, खंड 1, पृष्ठ 396)
