रोज़े की वास्तविक्ता
क़ुरआन और हदीस में रोज़े के लिए “सौम” का शब्द आया है। सौम के शाब्दिक अर्थ हैं—रुकना, किसी चीज़ से परहेज़ करना। इंसान जैसे प्राणी के लिए इसकी बहुत ज़्यादा अहमियत है। इंसान का मामला पचास प्रतिशत रुकने का है और पचास प्रतिशत करने का। जब इंसान किसी निरर्थक चीज़ से खुद को रोकता है, तभी वह किसी उद्देश्यपूर्ण कार्य को करने में सक्षम होता है। यही वह आवश्यक क्षमता है, जिसका अभ्यास इंसान को रोज़े के माध्यम से कराया जाता है। एतिहासिक तौर पर सुरक्षित और संरक्षित न होने के कारण
उदाहरण के तौर पर एकेश्वरवाद को ही देखिए। जब इंसान अल्लाह के सिवा किसी और को बड़ा मानने से स्वयं को रोकता है, तभी उसके लिए यह संभव होता है कि वह अल्लाह को अपना वास्तविक सर्वोच्च माने। इसी तरह, जब वह पैग़म्बरी मार्गदर्शन के अलावा अन्य तमाम मानवीय रहनुमाइयों को छोड़ देता है, तभी वह पैग़म्बर के बताए हुए मार्गदर्शन को स्वीकार कर पाता है। और जब इंसान यह समझ लेता है कि क़ुरआन के अलावा दूसरी किताबें एतिहासिक तौर पर सुरक्षित और संरक्षित न होने के कारण प्रमाणिक मार्गदर्शन का स्रोत नहीं हैं, तभी वह क़ुरआन को एकमात्र विश्वसनीय हिदायतनामा और मार्गदर्शक के रूप में अपनाता है।
इसी तरह इंसान जब शैतान की संगत को छोड़ता है, उसके बाद ही वह अपने आप को फ़रिश्तों की संगत के क़ाबिल बनाता है। जब इंसान अपनी इच्छाओं की पैरवी छोड़ देता है, तभी वह अल्लाह की रज़ा के अनुसार चलने के योग्य बनता है। जब वह अपने भीतर से घमंड और अहंकार को मिटा देता है, तभी उसके स्वभाव में विनम्रता जन्म लेती है। जब वह अपने धन में फ़िज़ूलख़र्ची से पूरी तरह बचता है, तभी वह सादगी और क़नाअत (संतोष) की राह अपनाता है। और जब इंसान ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैये को त्याग देता है, तभी वह गंभीरता और संजीदगी के साथ जीवन जीने में सक्षम होता है।
छोड़ने और अपनाने का यह सिद्धांत पूरी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है। इस मार्ग को अपनाए बिना कोई भी व्यक्ति अपनी ज़िंदगी को वास्तव में इस्लामी जीवन नहीं बना सकता। रोज़े का उद्देश्य इंसान के भीतर इसी भावना को विकसित करना है। जो व्यक्ति “छोड़ने” के इस उसूल को स्वीकार नहीं करता, वह “अपनाने” की नेमत और उसके लाभ का अनुभव भी नहीं कर पाता।
