कामयाबी की क़ीमत
एक छात्र के अभिभावक कॉलेज के प्रिंसिपल से मिले। उन्होंने कहा, “आप लोगों ने जो पढ़ाई का कोर्स बनाया है, वह बहुत लंबा है। छात्र की उम्र का बड़ा हिस्सा सिर्फ़ पढ़ाई में ही बीत जाता है।”
प्रिंसिपल ने जवाब दिया, “इसका हल तो बहुत आसान है।”
“वह कैसे?”
“आप एक छोटा कोर्स भी बना सकते हैं। असल में, समय इस बात पर निर्भर करता है कि आप छात्र के अंदर कैसा ज्ञान का स्तर चाहते हैं। क़ुदरत को शाहबलूत (ओक) का पेड़ उगाने में सौ साल लग जाते हैं, लेकिन जब वह खीरे का पौधा उगाना चाहती है, तो उसके लिए सिर्फ़ छह महीने चाहिए। अगर आप औसत स्तर चाहते हैं, तो कुछ साल की पढ़ाई भी काफ़ी हो सकती है, लेकिन किसी को उच्च शिक्षित बनाने के लिए आपको ज़्यादा समय देना ही पड़ेगा।”
यही नियम ज़िंदगी के सारे मामलों पर लागू होता है। छोटी तरक़्क़ी छोटी कोशिश से मिल सकती है, लेकिन अगर आप बड़ी तरक़्क़ी चाहते हैं, तो आपको बड़ी जद्दोजहद ज़रूर करनी पड़ेगी। छोटी कोशिश से कभी बड़ी कामयाबी हासिल नहीं हो सकती।
हैरोल्ड शर्मन ने इसी बात को इन शब्दों में कहा है—
“हर कामयाबी पर एक क़ीमत का टैग लगा होता है—सवाल यह है कि आप उसे हासिल करने के लिए मेहनत और क़ुर्बानी, सब्र, यक़ीन और डटे रहने के रूप में कितनी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं।”
हर कामयाबी के साथ एक क़ीमत जुड़ी होती है। अब यह आप पर निर्भर है कि आप उसे पाने के लिए मेहनत और क़ुर्बानी, सब्र, यक़ीन और हिम्मत के रूप में कितनी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं। बाज़ार में इंसान को वही चीज़ मिलती है, जिसकी उसने क़ीमत अदा की हो। ठीक उसी तरह हर तरक़्क़ी और हर कामयाबी की भी एक क़ीमत होती है और इंसान को वही तरक़्क़ी और वही कामयाबी मिलेगी, जिसकी उसने क़ीमत चुकाई हो—न इससे ज़्यादा और न इससे कम।
