मदीना की हाज़िरी
मदीना जाना, मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ना और रौज़ा-ए-रसूल पर दरूद पढ़ना अगरचे हज के अरकान (अनिवार्य कामों) व फर्ज़ों में दाख़िल नहीं, इसके बावजूद इसका बहुत सवाब है और हाजी को ज़रूर वहाँ भी हाज़िरी देनी चाहिए। हाजी को चाहिए कि तवाफ़े विदा के बाद मक्का से मदीना के लिए रवाना हो।
मदीना के सफ़र में ज़बान पर रसूलुल्लाह (सल्ल०) के लिए ज़्यादा से ज़्यादा दरूद जारी रहना चाहिए। मदीना पहुँचकर ग़ुस्ल करे और मस्जिदे नबवी में दाख़िल होकर दो रकअत नमाज़ पढ़े और इसके बाद दुआ करे। नमाज़ के बाद अदब के साथ रौज़ा शरीफ़ की जालियों के पास आए और सलात व सलाम पढ़े। मदीना में ठहरने के दिनों में नमाज़ें ज़्यादा से ज़्यादा मस्जिदे नबवी में अदा करे।
मस्जिदे नबवी में नमाज़ और दरूद से फ़ारिग होकर मदीना के उन जगहों की ज़ियारत करना चाहिए जिनसे इस्लाम की तारीख़ जुड़ी हुई है, मिसाल के तौर पर जन्नतुल बक़ीअ, जहाँ बहुत से सहाबा दफ़्न हैं, मस्जिदे कुबा जहाँ रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मदीना आकर पहली नमाज़ पढ़ी, जबले उहुद जहाँ मुसलमानों से दूसरी बड़ी जंग हुई, मस्जिद क़िब्लतैन जहाँ ठीक हालाते नमाज़ में क़िबले के बदलने का हुक्म नाज़िल हुआ, वग़ैरह।
