हज अल्लाह से मुलाक़ात है
हज के कई पहलू होते हैं, लेकिन उसका ख़ास पहलू यह है कि हज अल्लाह तआला से मुलाक़ात जैसा है। जब आदमी सफ़र करके हज के मक़ामात तक पहुँचता है, तो उस पर एक ख़ास कैफ़ियत छा जाती है। उसे ऐसा लगता है जैसे वह “अपनी दुनिया” से निकलकर “ख़ुदा की दुनिया” में आ गया हो। वह अपने रब को छू रहा है, उसके गिर्द घूम रहा है, उसकी तरफ़ दौड़ रहा है, उसकी ख़ातिर इधर-उधर जा रहा है। वह उसके सामने क़ुर्बानी पेश कर रहा है, उसके दुश्मन को कंकरीयाँ मार रहा है। वह उससे माँग रहा है जो कुछ माँगना चाहता है, और उससे पा रहा है जो कुछ पाना चाहता है।
अरफ़ात का मैदान इस सिलसिले में बड़ा अजीब मंज़र पेश करता है। ख़ुदा के बंदे काफ़िला दर काफ़िला चारों तरफ़ से चले आ रहे हैं। सबके जिस्म पर एक ही सादा लिबास है, और हर व्यक्ति अपनी अलग पहचान और खासियत को पीछे छोड़ दिया है। सब की ज़बान पर एक ही कलाम जारी है (हाज़िर हूँ ख़ुदाया मैं हाज़िर हूँ, हाज़िर हूँ ख़ुदाया मैं हाज़िर हूँ)।
यह मंज़र देखकर क़ुरआन की वह आयत याद आने लगती है जिसमें बताया गया है कि जब सूर फूँका जाएगा तो अचानक तमाम लोग क़ब्रों से निकल कर अपने रब की तरफ़ दौड़ पड़ेंगे (36:51)। हक़ीक़त यह है कि अरफ़ात का इज्तिमा हश्र के इज्तिमा की पेशगी ख़बर है। यह आज की दुनिया में आने वाली दुनिया की तस्वीर दिखाना है। हदीस में आया है कि “अरफ़ात के मैदान में ठहरना ही हज है (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 889)। इससे मालूम होता है कि हज का सबसे अहम मक़सद क्या है। वह यह है कि आदमी हश्र के मैदान में ख़ुदा के सामने अपनी हाज़िरी को याद करे। जो कुछ कल अमली तौर पर होने वाला है उसे आज ही ज़ेहनी तौर पर अपने ऊपर तारी कर ले।
काबा अकेले ख़ुदा का घर है। इसे दो अज़ीम पैग़म्बरों (हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल) ने मिलकर बनाया। इन पैग़म्बरों की श्रेष्ठ ज़िंदगी और ख़ुदा के लिए उनकी क़ुर्बानी के हैरतअंगेज़ वाक़ये इस घर से संबंधित हैं। फिर आख़िरी पैग़म्बर (सल्ल०) और उनके अस्हाब की ज़िंदगियाँ और उनकी ख़ुदा-परस्ताना सरगर्मियाँ इसके माहौल में बसी हुई हैं।
ख़ुदा-परस्ती और ख़ुदा के लिए क़ुर्बानी की इस बे-मिसाल तारीख़ को आदमी किताबों में पढ़ता है। वह बचपन से लेकर हज के सफ़र तक इसे लगातार सुनता है। यहाँ तक कि यह उसके हाफ़िज़े (याददाश्त) का हिस्सा बन जाती है। ऐसी हालत में जब वह सफ़र करके काबा के सामने पहुँचता है तो ज़ेहन की तमाम यादें अचानक उसके अंदर जाग उठती हैं। वह अपने आप को एक तारीख़ के सामने खड़ा हुआ पाता है। ख़ुदा से ख़ौफ़ और मोहब्बत की तारीख़, ख़ुदा के लिए क़ुर्बान हो जाने की तारीख़, ख़ुदा को अपना सब कुछ बना लेने की तारीख़, ख़ुदा को सर्वशक्तिमान के रूप में पा लेने की तारीख़, ख़ुदा की ख़ातिर अपने आप को मिटा देने की तारीख़।
इस तरह एक महान रूहानी तारीख़ इंसान के सामने काबा की शक्ल में आ जाती है। काबा उसे पत्थर की सिर्फ़ एक ईमारत नहीं बल्कि अल्लाह की एक अज़ीम तारीख़ी निशानी महसूस होने लगता है। और यह अनुभव उसके दिमाग़ को हिला देता है, वह उसके सीने को पिघला देता है। वह उसे बदल कर नया इंसान बना देता है।
