जैसा लोगों के साथ करोगे, वैसा ही
ख़ुदा तुम्हारे साथ करेगा
अम्र बिन मुर्रा (रज़ि०) कहते हैं कि मैं ने मुआविया से कहा: रसूलुल्लाह (सल्ल०) को मैं ने कहते सुना है—“जो शासक ग़रीब और कमज़ोर लोगों के लिए अपने दरवाज़े बंद कर लेगा, तो अल्लाह भी उसकी ज़रूरत और परेशानी के वक़्त उसके लिए आसमान के दरवाज़े बंद कर देगा।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 1332)
बुराई का जवाब भलाई से देना
उमर (रज़ि०) ने कहा: “अगर कोई तुम्हारे साथ किसी मामले में अल्लाह की नाफ़रमानी करे, तो उसका सबसे अच्छा जवाब यही है कि तुम उस मामले में अल्लाह की आज्ञा का पालन करो।” (तफ़्सीर इब्न कसीर, खंड 7, पृष्ठ. 165)
लोगों की बुराई से बचने के लिए सब्र करो
अहनफ़ बिन क़ैस कहते हैं: “ जो इंसान एक कड़वी बात पर सब्र नहीं करता, उसे आगे चलकर और भी कड़वी बातें सुननी पड़ती हैं। मैंने कई बार अपना ग़ुस्सा पी लिया, क्योंकि अगर मैं ऐसा न करता तो बात और बिगड़ जाती। बड़ी मुसीबत से बचने के लिए मैंने कई बार अपना ग़ुस्सा रोके रखा।” (अल-मुजालसा व जवाहिरुल इल्म, हदीस 3327)
अगर आप किसी के साथ कुछ गलत कर बैठें, तो उसकी भरपाई के लिए उसके हक़ में दुआ करें
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने दुआ की: “ऐ अल्लाह! मैं तुझसे एक वादा करता हूँ, तू उसे पूरा कर। मैं इंसान हूँ। अगर मैंने किसी व्यक्ति को तकलीफ़ दी हो, गाली दी हो, उसको मारा हो या लानत की हो—तो तू इसे उसके लिए रहमत और पाकीज़गी बना दे और क़ियामत के दिन उसे तेरे क़रीब आने का ज़रिया बना दे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस 2601)
जो दूसरे का बुरा चाहता है, असल में
वह अपना नुक़सान करता है
अबू अल-ऐना कहते हैं:
“मैंने अहमद बिन अबी दुआद से शिकायत की कि मेरे कुछ ज़ालिम दुश्मन हैं—सब मेरे ख़िलाफ़ इकट्ठे हो गए हैं। उन्होंने कहा: “अल्लाह का हाथ उनके हाथों के ऊपर है (यानी अल्लाह की ताक़त सबसे बड़ी है)।” मैंने कहा: “वे बहुत हैं और मैं अकेला हूँ।” उन्होंने जवाब दिया: “अक्सर छोटी जमाअतें भी अल्लाह की मदद से बड़ी जमाअतों पर जीत जाती हैं।”
मैंने कहा: “वे मेरे खिलाफ़ चालें चल रहे हैं।” उन्होंने कहा: “बुरी चाल आख़िरकार उसी पर वापस आती है जिसने वह चाल चली।” (क़ुरआन, 2:249; 35:43)” (तफ़्सीर रूहुल बयान, खंड 3, पृष्ठ 340)
अन्याय में किसी का साथ देना
ग़लत और गुनाह है
वासिला बिन असक़ा (रज़ि०) कहते हैं: मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा—‘असबियत(पक्षपात) क्या है?’ आपने फ़रमाया: “जब तुम ज़ुल्म में अपने लोगों की मदद करो, वही पक्षपात है।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 5119)
हर किसी से इंसाफ़ करना, चाहे वो
कमज़ोर हो या ताक़तवर
मुआविया बिन अबू सुफ़यान ने ज़िरार सुदाई से कहा: “मुझे अली की अच्छाई बताओ।”
उन्होंने कहा: “वो हम सबके बीच बिल्कुल एक आम इंसान जैसे रहते थे। कोई ताक़तवर इंसान ग़लत काम में उनसे उम्मीद नहीं रख सकता था और कोई कमज़ोर उनके इंसाफ़ से कभी निराश नहीं होता था।” (तारीख़े दमिश्क, इब्ने असाकिर, खंड 24, पृष्ठ 401)
जो माफ़ी माँगे, उसकी माफ़ी कुबूल करो
अबू हुरैरा रज़ि० बताते हैं कि रसूल (सल्ल०) ने कहा: “अगर तुम्हारा भाई तुम्हारे पास माफ़ी माँगने आए, तो तुम्हें उसका बहाना मान लेना चाहिए, चाहे वो सही हो या ग़लत। अगर तुम उसकी माफ़ी क़ुबूल नहीं करोगे तो हौज़-ए-कौसर पर मुझ तक नहीं पहुँच पाओगे।” (अल-मुस्तद्रक अल-हाकिम, हदीस संख्या 7258)
क़ुरआन में ग़ीबत के तीन प्रकार
हसन बसरी ने कहा: “ग़ीबत की तीन क़िस्में हैं—ग़ीबत (backbiting), इफ़्क और बहुतान। ग़ीबत, अपने भाई के बारे में वही बुरी बात कहना जो सचमुच उसमें है। इफ़्क़, वो बात कहना जो तुमने किसी और से सुनी हो। बहुतान, वो बात कहना जो उसके अंदर है ही नहीं।” (तफ़्सीर क़ुर्तुबी, खंड 16, पृष्ठ 335)
एक सच्चा मुसलमान लोगों से
कैसा बर्ताव करे
अली बिन अबी तालिब रज़ि० ने रसूल (सल्ल०) के बारे में बताया: “आप तीन चीज़ों से हमेशा दूर रहते थे—झगड़ा, घमंड और बेकार के काम। और लोगों को भी तीन चीज़ों से बचाए रखा—किसी की बुराई नहीं करते थे, किसी में ऐब नहीं निकालते थे और किसी की कमज़ोरी नहीं खोजते थे। आप सिर्फ़ उसी विषय पर बात करते थे जिसमें सवाब (नेकी) की उम्मीद होती थी।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 351)
कम बोलना और किसी के
ख़िलाफ़ द्वेष न रखना
रसूल (सल्ल०) के एक साथी की मौत के समय लोग उनके पास गए। उनका चेहरा चमक रहा था। लोगों ने वजह पूछी तो उन्होंने कहा: “मेरे लिए मेरी दो आदतें सबसे बड़ी पूँजी हैं—पहली, मैं बेकार की बातें नहीं करता था। दूसरी, मेरा दिल सबके लिए हमेशा साफ़ रहता था।” (सियर आलामिन्नुबला, खंड 3, पृष्ठ 152)
बुराई का जवाब भलाई से देना
उबादा बिन सामित रज़ि० कहते हैं: रसूल (सल्ल०) ने कहा: “क्या मैं तुम्हें ऐसा काम न बताऊँ जिससे अल्लाह तुम्हारे दर्जे ऊँचे करता है? लोगों ने कहा: हाँ, बताइए ऐ अल्लाह के रसूल। आपने कहा: जो तुम्हारे साथ बुरा बर्ताव करे, उस पर सब्र करो। जो तुम पर ज़ुल्म करे, उसे माफ़ कर दो। जो तुम्हें न दे, उसे तुम दो। जो रिश्ता तोड़े, उससे तुम रिश्ता जोड़ो।” (मजमउज्ज़वाइद, हदीस संख्या 13694)
ग़ुस्सा पी जाने से ईमान बढ़ता है
रसूल (सल्ल०) ने कहा: “जो इंसान ग़ुस्से पर काबू पा ले, जबकि वो चाहे तो उसे दिखा भी सकता हो, अल्लाह उसका दिल ईमान और सुकून से भर देता है।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 5823)
इबादत, एकता और भलाई
सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ि० से रिवायत है: रसूल (सल्ल०) ने कहा: “अल्लाह तीन कामों से प्रसन्न होता है —
तुम उसी की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न करो, और अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ो और आपसी फूट में न पड़ो, और जो तुम्हारे मामलों का ज़िम्मेदार हो, उसके साथ भलाई करो।”
मुस्नद अहमद में ज़ुबैर बिन मुतइम (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने ख़ुत्बा देते हुए फ़रमाया: “तीन बातें ऐसी हैं जिनमें ईमान वाले का दिल कभी धोखा नहीं खाता—
अल्लाह के लिए पूरी सच्चाई के साथ अमल करना,
हुक्मरानों के लिए दिल से भलाई चाहना, और सबके साथ मिल-जुल कर रहना।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 13350)
गुमान या शक की बातों के पीछे मत पड़ो
नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “गुमान की तहक़ीक़ मत करो” अर्थात जब तुम्हें किसी के बारे में शक हो तो उसकी पड़ताल मत करो। (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 2174)
जिसकी बात हो ख़ुद उससे
पूछे बिना न मानो
अबुल आलिया (वफ़ात 93 हिजरी) कहते हैं: “हम बसऱा में लोगों से सुनते थे कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथियों ने ऐसा कहा है, लेकिन हम सिर्फ़ सुनकर मान नहीं लेते थे, हम सवारी करके मदीना जाते और खुद उनकी ज़बान से सुनते।” (अल-किफ़ाया फ़ी मारिफ़ती उसूलि इल्मिर्रिवाया, खण्ड 2, पृष्ठ 211)
इजाज़त न मिले तो बुरा माने
बिना लौट आओ
रसूलुल्लाह (सल्ल०) जब किसी के यहाँ जाते तो तीन बार सलाम करते। अगर इजाज़त मिल जाती तो अंदर जाते, वरना वापस लौट आते। (मुस्नद अल-बज़्ज़ार, हदीस संख्या 6872)
माँ-बाप का ख्याल अपने से
भी ज़्यादा रखना
हज़रत अबू हुरैरा अपनी माँ का बहुत ध्यान रखते थे। वो बताते हैं: “मदीना के शुरुआती दिनों में एक बार मैं भूख से घर से निकला और मस्जिद पहुँचा। वहाँ और लोग भी थे। उन्होंने पूछा, ‘क्यों आए हो?’ मैंने कहा, ‘भूख से।’ उन्होंने कहा, ‘खुदा की क़सम, हम भी भूख से आए हैं।’ फिर हम सब रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास गए। आप (सल्ल०) ने पूछा, ‘क्यों आए हो?’ हमने कहा, ‘भूख से।’ आपने खजूरों का एक बर्तन मंगवाया और सबको दो-दो खजूरें दीं। आपने कहा, ‘इन दो खजूरों को खा लो और पानी पी लो, आज के लिए काफ़ी होंगी।’ अबू हुरैरा कहते हैं: ‘मैंने एक खजूर खा ली और दूसरी छुपा ली।’ आप (सल्ल०) ने पूछा: ‘क्यों छुपाई?’ मैंने कहा, ‘अपनी माँ के लिए।’ आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, ‘इसे खा लो, तुम्हारी माँ के लिए हम और दो खजूरें देंगे।’” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 9960)
मुसलमान की मुसीबत उसकी
अपनी लाई हुई होती है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) एक रात बाहर निकले और बुनू मुआविया की मस्जिद गए। आपने दो रकअत नमाज़ पढ़ी और लंबी दुआ की। हज़रत ख़ब्बाब कहते हैं: “मैंने कहा, ‘ऐ रसूलल्लाह, मेरे माँ-बाप आप पर फ़िदा हों, आज आपने ऐसी नमाज़ पढ़ी जैसी मैंने आपको पढ़ते हुए पहले कभी नहीं देखा।’” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “ हाँ, यह डर और दुआ की नमाज़ थी। मैंने अल्लाह से तीन बातें माँगीं। दो मान ली गईं, और एक नहीं।” मैंने दुआ की कि हमें पिछली क़ौमों की तरह ख़त्म न किया जाए—यह दुआ मान ली गई। मैंने दुआ की कि हमारे अलावा कोई दुश्मन हम पर हावी न हो—यह भी मान ली गई। मैंने दुआ की कि हम आपस में न लड़ें और न बँटें—यह दुआ नहीं मानी गई।” (सुनन नसाई, हदीस संख्या 1636; मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 21053; सहीह इब्ने हिब्बान, हदीस संख्या 7236)
सख़्त बात पर ग़ुस्सा न होना
एक दिन हज़रत उमर (रज़ि.) ने लोगों से कहा: “अगर तुम्हें मुझमें कोई टेढ़ी बात या गलती दिखे, तो उसे ठीक कर देना।” तुरंत एक आदमी उठकर बोला: “ख़ुदा की क़सम! अगर हमें आपमें कोई टेढ़ापन दिखा, तो हम उसे तलवार से भी सीधा कर देंगे।” हज़रत उमर (रज़ि.) ने कहा: “अल्लाह का शुक्र है कि इस उम्मत में ऐसे लोग मौजूद हैं जो उमर की गलती को तलवार से भी ठीक कर देंगे।” (अत्तहसील मिनल-महसूल, खण्ड 1, पृष्ठ 99)
मिलजुलकर रहना ज़रूरी है
हज़रत अबू दरदा कहते हैं—मैंने अल्लाह के रसूल को कहते सुना—“किसी बस्ती या जंगल में अगर तीन आदमी हों और वे नमाज़ जमात से न पढ़ें, तो उन पर शैतान क़ाबू पा लेता है। इसलिए जमात को ज़रूरी समझो। भेड़िए अकेली भेड़ को खा जाते हैं, इसी तरह शैतान अकेले इंसान को गुमराह कर देता है।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 21710, 22029)
मतभेद को रिश्तों के बिगड़ने की
वजह न बनने देना
इमाम तबरी बताते हैं कि एक बार हज़रत ख़ालिद बिन वलीद और हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास में किसी निजी मसले पर मतभेद हो गया। बाद में किसी ने हज़रत सअद के सामने ख़ालिद की बुराई करनी चाही। हज़रत सअद ने तुरंत रोका और कहा—“उसे छोड़ो। हमारे बीच मतभेद है, लेकिन इसका हमारे धार्मिक रिश्तों को प्रभावित नहीं कर सकता।” (अल-मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 25535)
नफ़रत इंसान का ईमान खा जाता है
नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया—“द्वेष मूंडने वाली चीज़ है। मैं यह नहीं कहता कि वह बाल मूंडती है, बल्कि वह धर्म को मूंड देती है। उस अल्लाह की क़सम, जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है—तुम जन्नत में नहीं जा सकते जब तक ईमान वाले न बनो, और ईमान वाले नहीं बन सकते जब तक आपस में मोहब्बत न करो।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2510)
लड़ाई-झगड़ा अच्छे कर्म नष्ट कर देता है
अव्वाम बिन हौशब ने कहा—“लोगो! धर्म में झगड़े से बचो, क्योंकि इससे इंसान के अच्छे काम भी बर्बाद हो जाते हैं।” (जामे बयानुल-इल्म, खण्ड 2, पृष्ठ 932)
ज़्यादा बहस गिरावट की निशानी है
औज़ाई कहते हैं—“जब अल्लाह किसी क़ौम के लिए बुराई चाहता है, तो उन्हें बहस में उलझा देता है और उन्हें अच्छे कामों से रोक देता है।” (जामे बयानुल-इल्म, खण्ड 2, पृष्ठ 933)
ईमान वाले के लिए असली लज्ज़त
ग़ुस्सा पी जाने में है
हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा—“किसी इंसान के लिए दूध या शहद का घूँट पीना उतना मीठा नहीं जितना ग़ुस्से का घूँट पी जाना।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 8748)
आपस की लड़ाई इस्लाम के ख़िलाफ़ है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जो हम पर हथियार उठाए, वह हममें से नहीं।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6874)
अल्लाह के हवाले कर के सब्र करना
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) ने जब यज़ीद की बैअत की तो कहा—“अगर यह भलाई है तो हम राज़ी हैं, और अगर यह बुराई है तो हमने सब्र किया।” (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 30575)
दोस्ती और दुश्मनी में संतुलन
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “दोस्ती भी इतेदाल (बीच) की करो, शायद वह कभी तुम्हारा दुश्मन बन जाए। और दुश्मनी भी बीच की करो, शायद वह कभी तुम्हारा दोस्त बन जाए।” (अल-अदबुल-मुफ़रद, हदीस संख्या 1321)
