बड़ी छलाँग कब?
जुलाई, 1969 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने पहली बार चाँद पर क़दम रखा था। जब वह अपने अंतरिक्ष यान के साथ चाँद पर उतरा, तो अमेरिका के मिशन कंट्रोल को उसके ये शब्द मिले—“यह एक इंसान के लिए एक छोटा क़दम है, लेकिन इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ी छलाँग है।”
आर्मस्ट्रॉन्ग और उसके दो साथी अमेरिका के 30 सबसे बेहतरीन अंतरिक्ष यात्रियों में से चुने गए थे। उनमें वे ख़ास बातें बहुत ज़्यादा मात्रा में मौजूद थीं, जो उस मुश्किल ऐतिहासिक मिशन के लिए ज़रूरी थीं... जैसे उड़ान में असाधारण कुशलता, दिमाग़ी ताक़त, जानकारी निकालने की क्षमता और बर्फ़ जितना ठंडा दिमाग़ रखते हुए भी चुनौती को बिना डर के स्वीकार करना।
इसके अलावा उन्हें बहुत कठिन ट्रेनिंग के कोर्स से गुज़रना पड़ा। मिसाल के तौर पर, वे लंबे समय तक गहरे पानी में रहे, ताकि वे बिना वज़न वाली हालत के आदी हो सकें। उन्होंने तरह-तरह की संभावित इमरजेंसी का अभ्यास किया। उन्होंने खगोल विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान और रॉकेट उड़ान के कोर्स को पढ़ा। उन्होंने अंतरिक्ष कंप्यूटर और चाँद की भौतिकी का अध्ययन किया।
उनका 3100 टन का अपोलो-11 एक विशालकाय दैत्य जैसा लगता था। यह 36 मंज़िला इमारत जितना ऊँचा था। इसके अंदर 80 लाख पुर्ज़े थे और 91 इंजन लगे हुए थे। सबसे ऊपर वह छोटा-सा यान कोलंबिया था, जिसके अंदर अंतरिक्ष यात्रियों को बैठकर अपनी यात्रा पूरी करनी थी।
अंतरिक्ष यान ऊपर उठा और ढाई घंटे तक धरती का चक्कर लगाया। उसके बाद उसकी रफ़्तार 403 मील प्रति मिनट हो गई। 3000 मील की ऊँचाई पर पहुँचकर कोलंबिया अलग हो गया। यह यान नीचे से ऊपर तक पुर्ज़ों से भरा हुआ था। अंतरिक्ष यात्रियों के बैठने के लिए मुश्किल से इतनी जगह थी, जितनी एक टैक्सी में होती है।
आख़िरकार अंतरिक्ष यात्री चाँद पर उतर गए। उन्होंने वहाँ से 46 पाउंड मिट्टी इकट्ठी की। उन्होंने चाँद की सतह पर पाँच लाख पाउंड वज़न के उपकरण छोड़े। दूसरी चीज़ों के साथ-साथ उन्होंने चाँद की सतह पर अपने पैरों के निशान भी छोड़े, जो वहाँ लगभग पाँच लाख साल तक बने रहेंगे।
इतनी ज़्यादा तैयारियों के बाद ही वह छोटा-सा क़दम उठाया जा सका, जिसका नतीजा एक बहुत बड़ी छलाँग था।
