भावना और बाहरी प्रक्रिया
हज़रत अबू हुरैरा रज़ि० से वर्णित है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जब तुम में से कोई रोज़ा रखने वाला व्यक्ति फ़ज्र की अज़ान सुने और खाने का बर्तन उसके हाथ में हो, तो वह उसे तब तक न छोड़े, जब तक कि वह अपनी आवश्यकता पूरी न कर ले।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2350)
इस हदीस का अर्थ यह है कि एक व्यक्ति सहरी कर रहा था। उसने अभी खाना पूरा नहीं किया था कि फ़ज्र (सुबह की नमाज़) की अज़ान सुनाई दी। यदि कभी ऐसी स्थिति आ जाए, तो उसे तुरंत खाना या पानी छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। उसे चाहिए कि वह अपनी सहरी पूरी कर ले, और फिर फ़ज्र की नमाज़ के लिए मस्जिद जाए।
इस हदीस से यह बात समझ में आती है कि रोज़ा केवल समय और नियमों से जुड़ा हुआ काम नहीं है। रोज़े में नियमों का महत्व है, लेकिन वे मुख्य नहीं हैं। रोज़े का असली महत्व उसकी आत्मा और भावना में है। जिस काम में आत्मा और भावना को महत्व दिया जाता है, वहाँ नियमों की भूमिका अपने-आप सीमित हो जाती है। इस हदीस में इसी बात को उदाहरण के रूप में बताया गया है।
रोज़े जैसा जीवंत कर्म केवल नियमों पर आधारित नहीं है। यदि केवल नियमों पर ज़ोर दिया जाए, तो रोज़े की भावना कमज़ोर हो जाती है। इसी बात को स्पष्ट करने के लिए पैग़म्बर-ए-इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह बात कही। इसका संदेश यह है कि रोज़ा रखते समय हमारा ध्यान उसकी भावना पर होना चाहिए, न कि केवल नियमों पर।
धार्मिक उपासना के कर्मों में सदैव आत्मा और भावना को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। यदि रोज़ा केवल नियमों का यांत्रिक पालन होता, तो अज़ान की आवाज़ सुनते ही तुरंत खाना-पीना बंद कर देना अनिवार्य होता। किंतु जो रियायत दी गई है, उससे यह स्पष्ट होता है कि इबादत में उसकी आंतरिक आत्मा ही मूल है।
