इनाम की रात
हज़रत अबू हुरैरा से एक लंबी हदीस रिवायत की गई है। इस रिवायत का एक हिस्सा यह है: रमज़ान की आख़िरी रात में रोज़ा रखने वाले पुरुषों और महिलाओं की मग़फ़िरत (ग़लतियों की क्षमा) कर दी जाती है। लोगों ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल०), क्या इससे मुराद शब-ए-क़द्र (क़द्र की रात) है? आपने फ़रमाया, नहीं। बल्कि काम करने वाले को उसका पूरा इनाम तब दिया जाता है, जब उसका काम पूरा हो जाता है। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 7917)
इस हदीस का मतलब यह है कि पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) के अनुयाईयों में से जो लोग रोज़े की सही भावना और निष्ठा के साथ रोज़ा रखते हैं, महीने की आख़िरी रात में उनके अमल का पूरा-पूरा सवाब (प्रतिफल) उनके रिकॉर्ड में लिख दिया जाता है। रमज़ान की इस आख़िरी रात को एक दूसरी हदीस में “लैलतुल जाइज़ह” (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 3421) यानी ‘इनाम की रात’ कहा गया है। अल्लाह हर अच्छे काम पर अपने बंदों को इनाम देता है। रमज़ान की इबादत की खास अहमियत की वजह से, इस इनाम का ज़िक्र खास तौर पर किया गया है।
अक्सर ऐसा होता है कि जब रमज़ान का महीना ख़त्म होने लगता है, तो ईद से पहले की रात लोग लापरवाही में या तमाशे में गुज़ार देते हैं। बहुत से लोग उस रात ज़्यादा ख़रीदारी में लग जाते हैं। यह हदीस ऐसी ग़फ़लत से बचाने की चेतावनी है। इनाम की इस रात का सही इस्तेमाल यह है कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा दुआ और इबादत में बिताया जाए। पूरे महीने का हिसाब किया जाए और आगे की ज़िंदगी के लिए नई योजना बनाई जाए। इस रात को फ़िज़ूल ख़र्च और बेकार कामों में लगाना, इस बरकत वाली रात की अहमियत को न समझना है। हक़ीक़त यह है कि जो लोग रमज़ान को उसकी सही भावना के साथ गुज़ारते हैं, वे कभी यह पसंद नहीं करेंगे कि रमज़ान की आख़िरी रात बेख़बरी में बीते। उनके लिए यह रात दुआ और इबादत की रात होती है, न कि लापरवाही की रात।
