समझदारी के ज़रिए
क्या यह मुमकिन है कि ज़िंदा शेर का अध्ययन खुले जंगल में उसके बिलकुल पास बैठकर किया जाए? इतने पास कि इंसान उसे छू सके और उसके शरीर के अंगों की सही नाप ले सके? ऊपर से देखने में यह एक नामुमकिन-सी बात लगती है, लेकिन ईश्वर ने इंसान को जो दिमाग़ दिया है, वह इतना अजीबो-ग़रीब है कि वह हर नामुमकिन को मुमकिन बना सकता है, बशर्ते उसे सही तरीक़े से इस्तेमाल किया जाए।
अमेरिका के एक जानवरों के विशेषज्ञ जॉर्ज बी. शैलर ने इस नामुमकिन को मुमकिन बना दिया। शैलर को शेरों की आदतों और ख़ासियतों पर एक किताब लिखनी थी, इसलिए उन्होंने दो साल तक खुले जंगल में ज़िंदा शेरों के बिलकुल क़रीब जाकर उनका अध्ययन किया। इस क़रीबी अध्ययन के ज़रिए उन्होंने जंगल के राजा के बारे में हैरतअंगेज़ सच्चाइयाँ खोज निकालीं। मिसाल के तौर पर, यह कि शेर बहुत सुस्त और आलसी जानवर है। शेरों के ज़्यादातर बच्चे भूखे मर जाते हैं, क्योंकि उनके माँ-बाप अपनी सुस्ती की वजह से अपने बच्चों के लिए खाना जुटा नहीं पाते वग़ैरह।
श्री शैलर को यह मौक़ा कैसे मिला कि वे खुले जंगल में ज़िंदा शेर के बिलकुल पास जाकर उसका अध्ययन कर सकें? जवाब है— दिमाग़ के इस्तेमाल से। श्री शैलर ने ऐसी कारतूसें तैयार कीं, जिनमें गोली की जगह बेहोश करने वाली दवा भरी होती थी। वे इस बेहोश करने वाली कारतूस को एक ख़ास बंदूक़ में डालकर दागते तो वह शेर के पास पहुँचकर मिनटों में उसे बेहोश और सुस्त कर देती थी। उन्होंने इस तरीक़े से लगभग सौ शेरों को बेहोश करने वाली दवा का निशाना बनाकर सुला दिया और जब वे बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़े, तो वे उनके पास जाकर उनकी हर चीज़ देखते और ग़ौर से उनका पूरा अध्ययन करते।
जिस तरह इंसान जंगल के ख़ूनी जानवरों को क़ाबू में कर लेता है, उसी तरह वह इंसानी बस्ती के इंसानी चेहरे वाले भेड़ियों पर भी क़ाबू पा सकता है। शर्त यह है कि इन इंसानी भेड़ियों पर भी ईश्वर का दिया हुआ दिमाग़ उसी तरह इस्तेमाल किया जाए, जिस तरह जंगल के भेड़ियों पर इस्तेमाल किया जाता है।
अगर कोई शख़्स किसी लिहाज़ से आपसे बड़ा है और आपसे अपनी बड़ाई मनवाना चाहता है, तो आप उसकी बड़ाई मानकर उसे ‘बेहोश’ कर दीजिए यानी उसके अहंकार को शांत कर दीजिए और फिर अपनी ख़ामोश तरक़्क़ी में लग जाइए। अगर आप ऐसा करेंगे, तो आख़िरकार वह वक़्त आएगा कि ख़ुद उस शख़्स को वह हक़ीक़त माननी पड़ेगी, जिसका दावा वह पहले आपसे कर रहा था।
