अमेरिका और रूस
अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत युद्ध मशीन तैयार करने में लगा दी। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक क्षेत्र में वह अपने ही जीते हुए देश जापान से भी पीछे रह गया। आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज़दार देश है। उस पर 400 बिलियन डॉलर का बाहरी कर्ज़ है, जबकि जापान आज सबसे बड़ा उधार देने वाला देश है। उसने दुनिया को 240 बिलियन डॉलर उधार दे रखा है। अमेरिकी डॉलर, जो पिछले पचास साल से आर्थिक दुनिया का बादशाह बना हुआ था, उसकी यह हैसियत बुरी तरह कमज़ोर हो गई। यहाँ तक कि यह सवाल उठने लगा कि क्या अमेरिका अपने महा शक्ति होने की स्थिति (Super power status) को बचाए रख सकता है (विस्तृत जानकारी के लिए: टाइम, 4 जुलाई 1988).
डॉ. हेनरी किसिंजर ने एक इंटरव्यू (टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 9 अगस्त 1988) में कहा कि नई बुनियादी हक़ीक़त यह है कि दुनिया में कुछ नई ताक़तें उभर आई हैं। जैसे कि चीन और भारत। जापान दिन-प्रतिदिन ज़्यादा ताक़तवर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में अमेरिका को दूसरे देशों को नज़रअंदाज़ करने की नीति छोड़नी पड़ेगी। अमेरिका के लिए ज़रूरी है कि वह नए शक्ति-केंद्रों के साथ तालमेल बिठाए:
The US will have to adjust to new centers.
19वीं ऑल सोवियत पार्टी कॉन्फ़्रेंस जून 1988 के आख़िरी हफ़्ते में मॉस्को में हुई, जिसमें पूरे देश से पाँच हज़ार डेलीगेट शामिल हुए। इस मौके पर रूसी प्रधानमंत्री गोर्बाचेव ने साढ़े तीन घंटे का भाषण दिया। इस लंबे भाषण में उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ आत्म-आलोचना (self-criticism) की वकालत की। उनके इस भाषण का संक्षिप्त पाठ टाइम्स ऑफ़ इंडिया (29 जून 1988), पेज 11 पर देखा जा सकता है।
मिस्टर क्वेंटिन पील (Quentin Peel) एक अख़बार के पत्रकार की हैसियत से स्वयं मॉस्को की इस कॉन्फ़्रेंस में मौजूद थे। उन्होंने रूसी नेताओं के भाषण सुने और उनसे मुलाक़ातें कीं। उन्होंने रूसी प्रधानमंत्री मिस्टर गोर्बाचेव के साढ़े तीन घंटे के भाषण का सार इन शब्दों में बयान किया है:
The message seemed plain enough: the party would have to renounce its stifling role in the administration and economy of the country. Power and privilege would have to be curbed, science and initiative given their head, if the Soviet Union were to compete with the rest of the world, let alone be a superpower.
संदेश बाहर से बिल्कुल साफ़ था। कम्युनिस्ट पार्टी को देश की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था पर अपने कड़े नियंत्रण को छोड़ना होगा। ताक़त और विशेषाधिकार को सीमित करना होगा। विज्ञान और पहल (initiative) को आगे बढ़ाना होगा—अगर सोवियत यूनियन को बाकी दुनिया का मुक़ाबला करना है, महा-शक्ति (superpower) की हैसियत को बनाए रखना तो दूर की बात है।
