बाद के दौर में लोगों की तबाही का सबसे बड़ा
कारण आपसी झगड़े और मतभेद होंगे
उक़बा बिन आमिर रज़ि० कहते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०), उहुद की लड़ाई के आठ साल बाद, उहुद की जगह पर गए और वहाँ शहीदों के लिए दुआ की। ये दुआ वैसी थी जैसी कोई अलविदा लेते वक्त करता है। फिर आप मिम्बर (मस्जिद का उपदेश-स्थान) पर खड़े हुए और कहा: “मैं तुम्हारे लिए आगे बढ़ने वाला हूँ, तुम्हारे ऊपर गवाह हूँ। हमारी मुलाक़ात की जगह हौज़ (हौज़े कौसर) है। मैं उसे यहीं से देख रहा हूँ। अल्लाह की कसम! मुझे डर नहीं कि मेरे बाद तुम लोग शिर्क करोगे, लेकिन मुझे डर है कि तुम दुनिया की चाहत में पड़ जाओगे, आपस में लड़ोगे और बर्बाद हो जाओगे, जैसे पिछली क़ौमें बर्बाद हुईं।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4042)
अपनी निजी शिकायत को धर्म
का मसला मत बनाओ
तारिक़ बिन शहाब कहते हैं: हज़रत ख़ालिद और हज़रत सअद रज़ि० में किसी बात पर मतभेद हुआ। एक शख़्स, हज़रत सअद के पास आया और ख़ालिद के खिलाफ़ कुछ कहने लगा। उन्होंने कहा: “रुको! हमारे और उनके बीच जो झगड़ा है, उसका कोई असर हमारे धर्म पर नहीं पड़ेगा।” (अल-मुसन्नफ़, इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 26048)
आपसी लड़ाई में किसी भी पक्ष
का साथ न देना
वाइल बिन हुज्र रज़ि० हज़्रमौत के शाही ख़ानदान से थे। जब हज़रत अली और अमीर मुआविया के बीच हज़रत उस्मान के क़त्ल के मसले पर जंग हुई, तो अमीर मुआविया ने वाइल से कहा: “तुम हमारे साथ क्यों नहीं हो?” वाइल ने जवाब दिया: “मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को कहते सुना है—फितने ऐसे आएँगे जैसे काली रात का टुकड़ा। मैंने पूछा: हम उस वक्त क्या करें? आपने कहा: ऐ वाइल! जब इस्लाम में दो तलवारें आपस में भिड़ें, तो तुम दोनों से अलग रहो।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 117)
समाज को सँवारना नेता का कर्तव्य है,
और खुद को सँवारना हर व्यक्ति
की ज़िम्मेदारी
बैहक़ी लिखते हैं कि एक आदमी हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रज़ि.) के पास आया और पूछने लगा: “मेरे लिए क्या बेहतर है—अल्लाह के मामले में लोगों की निंदा की परवाह न करना, या बस अपनी ही हालत पर ध्यान देना?” उमर (रज़ि.) ने जवाब दिया: “जो व्यक्ति मुसलमानों के मामलों का ज़िम्मेदार बनाया गया है, उसे अल्लाह के हक़ में किसी निंदक की परवाह नहीं करनी चाहिए। और जो ज़िम्मेदार नहीं है, वह अपने सुधार पर ध्यान दे और अपने हाकिम को नरमी से नसीहत करता रहे।” (शुअबुल ईमान, असर संख्या 7155)
निजी शिकायतों को हर हाल में सहना
वासिला बिन असक़ा रज़ि० इस्लाम क़ुबूल करने के लिए मदीना आए। उस वक्त रसूलुल्लाह (सल्ल०) नमाज़ पढ़ा रहे थे। वह आख़िरी क़तार (पंक्ति) में शामिल हो गए। नमाज़ के बाद उन्होंने आपके हाथ पर बैअत की (निष्ठा का संकल्प लिया)। कलिमा-ए-तौहीद के साथ आपने उनसे यह वादा लिया: “तुम्हें हुक्म मानना होगा—तंगी में भी, आसानी में भी, पसंद में भी, नापसंद में भी, और भले ही तुम्हारे ऊपर दूसरों को तरजीह (प्राथमिकता) दी जाए।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 4782)
साम्प्रदायिक भावनाएँ भड़काना
अज्ञानता के दौर की मानसिकता है
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि०) बताते हैं: एक बार हम लोग जंग में थे। मुहाजिरों (मक्का से आए मुसलमान) में से एक ने अंसार (मदीना के मुसलमान) के एक शख़्स को मुक्का मार दिया। वह नाराज़ हो गया और चिल्लाया—“अंसार वालो, मदद करो!” दूसरी तरफ़ मुहाजिर ने आवाज़ दी—“मुहाजिरो, मदद करो!” दोनों तरफ़ के लोग जुट गए और झगड़ा शुरू हो गया। फिर कुछ लोगों ने बीच में पड़कर दोनों को अलग किया।
जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) को पता चला तो आपने फ़रमाया—“ये कैसी जाहिलियत (अज्ञानता) वाली बातें हैं?” लोगों ने कहा—“एक मुहाजिर ने अंसारी को मारा था।” आपने कहा—“इन बातों को छोड़ दो, ये गंदी बातें हैं।” (सहीह मुस्लिम, हदीस 2584)
विवाद में भागीदार बन्ने से बचो
इमाम अहमद बताते हैं: कुछ लोग अबू ज़र (रज़ि०) के लिए सामान लेकर गए। वे रबज़ा पहुँचे तो वहाँ नहीं मिले, बताया गया कि वे हज के लिए गए हैं। लोग मिना पहुँचे और अबू ज़र (रज़ि०) के पास बैठे थे। तभी किसी ने कहा—“ख़लीफ़ा उस्मान (रज़ि०) ने यहाँ चार रकअत नमाज़ पढ़ी है।” यह सुनकर अबू ज़र (रज़ि०) को बुरा लगा। उन्होंने कहा—“मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ दो रकअत नमाज़ पढ़ी, अबू बक्र और उमर (रज़ि०) के साथ भी दो रकअत पढ़ी।” इसके बाद अबू ज़र (रज़ि०) उठे और चार रकअत नमाज़ पढ़ी।
लोगों ने कहा—“आपने मुसलमानों के ख़लीफा के चार रकअत पढ़ने पर एतराज़ किया और ख़ुद वही कर लिया।” उन्होंने कहा—“मतभेद करना और भी बुरा है।” (मुस्नद अहमद, असर संख्या 21460)
ऐसी ही घटना अब्दुर्रज़ाक़ ने क़तादा (रज़ि०) से भी बयान की है। अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) ने भी ख़लीफ़ा उस्मान (रज़ि०) के चार रकअत पढ़ने पर एतराज़ किया और फिर ख़ुद चार रकअत पढ़ीं। जब पूछा गया तो कहा—“मतभेद पैदा करना बुराई है।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस 1962)
अपनों से नाराज़ होकर विरोधियों से
जा मिलना सही नहीं
काब बिन मालिक (रज़ि०) ग़ज़वा-ए-तबूक में शामिल न हो पाए। वे कहते हैं: जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने जंग का ऐलान किया उस वक्त खजूरें पक चुकी थीं और (इस मौसम में) छाँव अच्छी लगती है। मैंने तैयारी में लापरवाही की और सोचा—मैं सक्षम हूँ, जब चाहूँगा निकल जाऊँगा। लेकिन फौज निकल गई और मैं पीछे रह गया। जब रसूलुल्लाह (सल्ल०) लौटे तो मैं मिला। आपने पूछा—“क्यों नहीं आए?” मैंने सच कहा—“मेरे पास कोई बहाना नहीं था, मैं जा सकता था।” फिर रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हुक्म दिया कि काब (और हिलाल बिन उमय्या और मुरारा बिन रबी) से कोई बात न करे। पचास दिन तक सबने उनका बाईकाट किये रखा। यहाँ तक कि उनकी हालत ऐसी हो गई कि क़ुरआन ने ख़ुद उसका ज़िक्र इस तरह से किया—“यहां तक कि जब ज़मीन अपनी विशालता के बावजूद उन पर तंग हो गई और वे ख़ुद अपनी जानों से तंग आ गए और उन्होंने समझ लिया कि अल्लाह से बचने के लिए ख़ुद अल्लाह के सिवा कहीं शरण नहीं मिल सकती।” (9:118)
काब (रज़ि०) कहते हैं: एक दिन मैं बाज़ार में था तो शाम का एक व्यापारी मिला। उसने मुझे ग़स्सान के राजा का ख़त दिया। रेशमी कपड़े में लिपटा हुआ। उसमें लिखा था— “मुझे पता चला है तुम्हारे सरदार ने तुम पर ज़ुल्म किया है। अल्लाह तुम्हें ज़लील न करे। हमारे पास आ जाओ, हम तुम्हारी क़दर करेंगे।”
काब (रज़ि०) ने वह ख़त फाड़कर आग में डाल दिया। पचासवें दिन अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल कर ली। (तफ़सीर इब्ने कसीर, खण्ड 4, पृष्ठ 430)
आपसी झगड़े से अल्लाह की
मदद छिन जाती है
ख़ब्बाब बिन अल-अरत (रज़ि०) कहते हैं: एक बार नबी (सल्ल०) ने बहुत लंबी नमाज़ पढ़ी। सहाबा ने पूछा तो आपने कहा—“ये डर और उम्मीद की नमाज़ थी। मैंने तीन दुआएं कीं, दो क़ुबूल हुईं, एक नहीं।”
आपने कहा—“पहली दुआ, कि मेरी उम्मत भूख से खत्म न हो, यह मान ली गई। दूसरी दुआ, कि उन पर ऐसा दुश्मन हावी न हो जाए जो सबको मिटा दे, यह भी मान ली गई। तीसरी दुआ, कि वे आपस में न लड़ें, यह क़ुबूल नहीं हुई।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 1574)
मतभेद की क़ीमत पर सरदारी नहीं
इब्न सअद एक घटना बताते हैं: हज़रत मुआविया ने अम्र बिन आस (रज़ि०) को अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) के पास भेजा। मक़सद था यह जानना कि वे ख़िलाफ़त चाहते हैं या नहीं। अम्र बिन आस (रज़ि०) ने कहा—“अबू अब्दुर्रहमान! आपको क्या रोक रहा है कि आप आगे आएँ, हम आपसे बैअत करें। आप नबी (सल्ल०) के सहाबी हैं, उमर (रज़ि०) के बेटे हैं, आप सबसे हक़दार हैं।” अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) ने पूछा—“क्या सब लोग तुम्हारी बात से सहमत हैं?” उन्होंने कहा—“थोड़े से लोग छोड़कर।” अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) ने कहा—“अगर हजर (बहरीन में एक शहर और उसके आसपास का इलाक़ा) में सिर्फ़ तीन मोटे गैर-अरबी लोग भी बच जाएँ तो भी मुझे इस काम (ख़िलाफ़त) की कोई चाह नहीं।” (अत्तबक़ातुल-कुबरा, असर संख्या 5189)
सामूहिक काम में निजी झगड़े से बचना
हुदैबिया की संधि के बाद अरब में अमन हो गया और रास्ते सुरक्षित हो गए। फिर पैग़म्बर (सल्ल०) ने ज़िल-हिज्जा 6 हिजरी में साथियों को बुलाकर इस्लाम की शिक्षा देने के काम की तरफ़ ध्यान दिलाया। आपने कहा: “अल्लाह ने मुझे सारी दुनिया के लिए रहमत बनाकर भेजा है। तुम लोग मेरा यह पैग़ाम हर क़ौम तक पहुँचा दो। और आपस में मत लड़ना, जैसे बनी-इस्राईल ने ईसा बिन मरियम से झगड़ा किया था।” सहाबा ने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल! हम कभी आपसे मतभेद नहीं करेंगे। आप हमें हुक्म दीजिए और हमें भेज दीजिए।” (अल-बिदाया वन्निहाया, खंड 4, पृष्ठ 306)
बहस और झगड़ा नेकी को मिटा देता है
आमिर बिन हौशब कहते हैं: “धर्म में बहस और झगड़े से बचो, क्योंकि इससे इंसान के अच्छे काम बेकार हो जाते हैं।” (जामि बयानुल इल्म व फ़ज़लिहि, खंड 2, पृष्ठ 594)
सामाजिक जीवन हर हाल में आवश्यक है
हज़रत अबू दर्दा (रज़ि०) कहते हैं — मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते हुए सुना:
“जिस बस्ती या जंगल में तीन आदमी हों और वहाँ जमात के साथ नमाज़ न होती हो, तो उन पर शैतान हावी हो जाता है। इसलिए नमाज़ की जमात को ज़रूरी समझो, क्योंकि भेड़िया हमेशा अकेली बकरी को खा जाता है।” इसी तरह इंसान का भेड़िया शैतान है। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 27514)
