धन: दीन और दुनिया के लिए सहायक
हज़रत असलम कहते हैं कि हज़रत उमर (रज़ि०) ने अबू उबैदा बिन जर्राह को कोई सरकारी काम सौंपा और बाद में उनके पास हज़ार दीनार भेजे। अबू उबैदा (रज़ि०) ने उसे लौटा दिया और कहा—“ऐ इब्ने ख़त्ताब! यह काम मैंने तुम्हारे लिए नहीं किया था। मैंने यह अल्लाह के लिए किया था। इसलिए मैं इस के बदले कुछ नहीं लूँगा।” उमर (रज़ि०) ने कहा—“रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हमें काम पर भेजा और हमें इनामात दिए। उस वक़्त हमें लेने में हिचक हुई। लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—‘इसे क़ुबूल करो और इससे अपने दीन और अपनी दुनिया में मदद लो।’” उसके बाद अबू उबैदा (रज़ि०) ने उसे क़ुबूल कर लिया। (अस्सुननुल कुबरा, हदीस संख्या 13016)
रिश्तेदारों को दान देने में अधिक सवाब
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) की एक रिवायत में है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—“ऐ मुहम्मद की उम्मत! अल्लाह की क़सम—अल्लाह उस इंसान का दान क़ुबूल नहीं करता जिसके अपने ज़रूरतमंद रिश्तेदार हों और वह उन्हें छोड़कर दूसरों को दे।”
और दूसरी रिवायत में है: “अल्लाह की क़सम, क़ियामत के दिन अल्लाह ऐसे व्यक्ति की तरफ़ नज़र भी नहीं करेगा।” (अल-मोजम अल-औसत, खण्ड 8, पृष्ठ 346)
मेहनत की कमाई ईमान वाले के लिए बेहतर है
अनस बिन मालिक (रज़ि०) कहते हैं कि एक अंसारी मुसलमान नबी (सल्ल०) के पास आए और सवाल किया। आप (सल्ल०) ने पूछा—“तुम्हारे घर में कुछ है?” उन्होंने कहा—“एक मामूली चादर है जिसे ओढ़ता हूँ और एक प्याला है जिससे पानी पीता हूँ।” आप (सल्ल०) ने प्याला मंगवाया और वहां मौजूद लोगों से कहा—“इस प्याले की क़ीमत लगाओ।” एक शख़्स ने एक दिरहम की क़ीमत लगाई। दूसरे ने बढ़ाकर दो दिरहम में ले लिया। आप (सल्ल०) ने वे दो दिरहम उस अंसारी को दिए और फ़रमाया—“एक दिरहम का खाना खरीदकर अपने घर वालों को दो और एक दिरहम से कुल्हाड़ी खरीदकर मेरे पास लाओ।” वह कुल्हाड़ी लेकर आए। आपने उसमें अपने हाथ से दस्ता लगाया और फ़रमाया—“जाओ, जंगल से लकड़ी काटकर लाओ और बेचो। पंद्रह दिन तक मेरे पास मत आना।”
वह अंसारी काम में लग गए। लकड़ी काटते और बेचते रहे। दो हफ़्ते बाद नबी (सल्ल०) के पास आए और अपनी आमदनी-खर्च का हिसाब बताया। खर्च पूरे करने के बाद उनके पास दस दिरहम बच गए थे।
आप (सल्ल०) खुश हुए और फ़रमाया—“यह तुम्हारे लिए इस से बेहतर है कि तुम हाथ फैलाते और वह क़ियामत के दिन तुम्हारे चेहरे पर दाग़ बन जाता।” (सुनन इब्ने माजह, हदीस संख्या 2198)
फ़ुज़ूल-खर्ची किसी ज़रूरी खर्च
के बदले होती है
हज़रत मुआविया कहते हैं कि जब भी मैंने किसी को फ़ुज़ूल-खर्ची करते देखा, तो समझा कि उसने किसी असली ज़रूरत को अनदेखा किया है। मतलब, जब इंसान ग़ैर-ज़रूरी जगह पैसा उड़ाता है, तो वही पैसा किसी ज़रूरी काम में नहीं लग पाता। (मुहाज़रातुल उदबा व मुहावरातुश्शुअरा वल बुलग़ा, अल-अस्फ़हानी, पृष्ठ 579)
पैसे पर नहीं, ख़ुदा पर भरोसा
सलमा बिन सईद और अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) बताते हैं कि उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) के ज़माने में इराक़ से बहुत सारा धन आया। आपने उसको बाँटना शुरू किया। लग रहा था कि सब बाँटकर ख़त्म कर देंगे। तब अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रज़ि०) खड़े होकर बोले: “अमीर-उल-मोमिनीन! थोड़ा धन बचाकर रख लीजिए। हो सकता है दुश्मन से लड़ाई हो जाए या कोई अचानक मुसीबत आ पड़े।” उमर (रज़ि०) ने कहा: “तुम्हें क्या हो गया! ये बात तुम्हारी ज़बान से शैतान ने कहलवाई है। अल्लाह की क़सम, मैं कल के डर से आज अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं करूँगा।” (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 36012)
दुनिया से ज़्यादा आख़िरत की फ़िक्र
मदीना में एक मुसलमान अपना घर बना रहा था। वह दीवार पर मिट्टी लगा रहा था और उसको सुन्दर बना रहा था। तभी नबी (सल्ल॰) वहाँ से गुज़रे और पूछा: “क्या कर रहे हो?” उसने कहा: “मिट्टी लगा रहा हूँ।” आपने फ़रमाया: “फ़ैसले (मौत) की घड़ी इससे भी ज़्यादा क़रीब है।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 5235)
शहीद होने से भी क़र्ज़ माफ़ नहीं होता
अबू क़तादा बिन रिबई (रज़ि०) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल॰) ने कहा: “ख़ुदा के रास्ते में जिहाद और ख़ुदा पर ईमान, सबसे बढ़िया काम हैं।” एक आदमी ने पूछा: “अगर मैं अल्लाह के रास्ते में मारा जाऊँ, तो क्या मेरी सारी ग़लतियाँ माफ़ हो जाएँगी?” आपने जवाब दिया: “हाँ, अगर तुम सब्र करने वाले हो, तुम्हारी नीयत अल्लाह की ख़ुशी पाना हो, तुम आगे बढ़ने वाले हो और पीछे मुड़ने वाले न हो।” फिर थोड़ी देर बाद आपने ख़ुद पूछा: “अभी तुमने क्या कहा था?” उसने वही सवाल दोहराया। रसूलुल्लाह (सल्ल॰) ने कहा: “हाँ, अगर तुम सब्र करने वाले हो, नीयत अल्लाह की ख़ुशी पाना हो, आगे बढ़ने वाले हो, पीछे हटने वाले न हो, तो तुम्हारी ग़लतियाँ माफ़ हो जाएँगी—सिवाय क़र्ज़ के। क्योंकि जिब्रईल ने मुझे यही बताया।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 22542)
दान: अपने आप को आग से बचाने की लिए
अदी बिन हातिम कहते हैं: मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल॰) को कहते सुना: “आग से बचो, चाहे खजूर का एक टुकड़ा देकर ही क्यों न हो। और अगर यह भी न हो, तो एक भली बात कहकर।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6563)
ईमान वाला दूसरे ईमान वाले के लिए
दिरहम-दीनार से ज़्यादा क़ीमती है
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) कहते हैं: “हमने एक ज़माना ऐसा देखा जब कोई भी अपने मुसलमान भाई से ज़्यादा ख़ुद को दिरहम-दीनार का हक़दार नहीं मानता था। और अब ऐसा वक़्त है कि दिरहम-दीनार हमें अपने भाई से ज़्यादा प्यारे लगने लगे हैं।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 13583)
ज़्यादा होने के बावजूद भी सँभलकर खर्च करना
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) हज़रत सअद (रज़ि०) के पास से गुज़रे। वह बड़े बर्तन में पानी से बेपरवाही से वुज़ू कर रहे थे। आपने कहा—“ऐ सअद! यह कैसी फ़ुज़ूलखर्ची है?” सअद ने पूछा—“क्या वुज़ू में भी फ़ुज़ूलखर्ची होती है?” आपने कहा—“हाँ, चाहे तुम बहती नदी के किनारे क्यों न हो।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 7065)
किसी का हक़ हो, तो उसे तुरंत पूरा करें
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—“मज़दूर को उसकी मज़दूरी पसीना सूखने से पहले ही दे दो।” (सुनन इब्ने माजह, हदीस संख्या 2443)
अच्छी नसीहत की कीमत माल-दौलत
से भी बढ़कर होती है
अबू उमैर सूरी कहते हैं—“तुम्हारा भाई तुम्हें हिकमत (दूरदर्शिता) की एक बात दे, यह इस से बेहतर है कि वह तुम्हें माल दे। क्योंकि माल तुम्हें घमंडी बना देता है और हिकमत (दूरदर्शिता) की बात तुम्हें सही राह दिखाती है।” (जामे बयानुल-इल्म, खण्ड 1, पृष्ठ 236)
किसी का काम देखकर उसे छोटा
समझना बिल्कुल ग़लत है
बद्र की लड़ाई में विरोधियों की फ़ौज का सरदार अबू जहल था। अंसार के दो नौजवान –मुअव्विज़ बिन अफ़रा और मुआज़ बिन अफ़रा—ने तय किया कि वह अबू जहल को मारेंगे। दोनों भाई दुश्मन की पंक्तियों में घुस गए और उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उसे मार डाला। अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) कहते हैं कि जब अबू जहल मरने लगा और उसे पता चला कि उसे मारने वाले मदीना के लोग हैं, तो उसने कहा—“काश! मुझे किसी किसान के बजाय कोई और मारता।” (शरह नववी अला मुस्लिम, खण्ड 12, पृष्ठ 160)
मदीना के लोग ज़्यादातर खेती करते थे, और अबू जहल किसानों को नीचा समझता था।
दौलत और सत्ता से नफ़रत और
दुश्मनी पैदा होती है
मिसवर बिन मख़रमा बताते हैं कि जब क़ादिसिया की जंग से मिला माल उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) के पास आया, तो वे उसे देखकर रो पड़े। अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रज़ि०) ने पूछा, “ऐ अमीरुल मोमिनीन, आप क्यों रो रहे हैं? अल्लाह ने आपको जीत दी, दुश्मनों पर विजय दिलाई और उनका माल आपके हाथ में दे दिया।” उमर (रज़ि०) ने कहा, “मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से सुना है कि जब किसी क़ौम को बहुत ज़्यादा दुनिया मिल जाती है, तो उनके बीच क़ियामत तक आपसी नफ़रत और दुश्मनी पैदा हो जाती है। मुझे इसी बात का डर है।” (मज्मउज़-ज़वाइद, हदीस संख्या 17741)
असली परीक्षा तो तब होती है
जब इंसान आराम और दौलत में हो
साद बिन अबीवक़ास (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“मैं तुम्हारे बारे में गरीबी की परीक्षा से कम, और सुख-सुविधा तथा संपन्नता की परीक्षा से ज़्यादा डरता हूँ।
गरीबी की परीक्षा में तुमने सब्र किया था, लेकिन दुनिया बहुत मीठी, बहुत मनमोहक और बहुत लुभाने वाली है।” (मुस्नद अल-बज़्ज़ार, हदीस 1168)
तबरानी ने औफ़ बिन मालिक से ये बात नक़ल कि है:
पैग़म्बर (सल्ल०) ने फ़रमाया: “दुनिया तुम पर यूँ बरसेगी जैसे पानी बरसता है। मेरे बाद अगर तुम्हारे दिल बिगड़ेंगे, तो वो सिर्फ़ दुनिया के लालच की वजह से होगा।” (हयातुस सहबा, खण्ड 3, पृष्ठ 534)
देने से माल कम नहीं होता
अबू हुरैरा (रज़ि०) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“सदक़ा देने से माल कम नहीं होता। जब कोई माफ़ करता है तो अल्लाह उसकी इज़्ज़त बढ़ा देता है। और जो अल्लाह की खातिर झुकता है, अल्लाह उसे ऊँचा कर देता है।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2588)
देने वाले को और दिया जाता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“हर सुबह दो फ़रिश्ते उतरते हैं। उनमें से एक कहता है—ऐ अल्लाह! खर्च करने वाले को और दे। और दूसरा कहता है—ऐ अल्लाह! कंजूस के माल को नष्ट कर दे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1010)
