इत्तेहाद का मरकज़

हज अपनी असल हक़ीक़त के एतबार से ख़ुदा की तरफ़ सफ़र है। आम इंसान मौत के बाद ख़ुदा के दरबार में हाज़िर होंगे, सच्चे ईमान वाला मौत से पहले ही अपने आप को ख़ुदा के दरबार में हाज़िर कर देता है। दूसरों की ख़ुदा के यहाँ हाज़िरी जबरन हाज़िरी है और सच्चे ईमान वाले की ख़ुदा के यहाँ हाज़िरी अपनी मर्ज़ी से हाज़िरी। अरफ़ात के मैदान में एक वक़्त में सारी दुनिया के हाजियों का इज्तिमा यही मंज़र पेश करता है। इसी लिए हदीस में आया है: अरफ़ा ही हज है। (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 889)

हज एक ऐसी व्यापक इबादत है, जिसके अंदर दूसरी इबादतों के पहलू भी किसी न किसी रूप में शामिल होते हैं। इनमें से एक यह भी है कि हज इस्लाम के आलमी इत्तेहाद का ज़रिया है। काबा मानो वह केंद्र बिंदु है, जिसके चारों ओर खुदा के मानने वाले दुनिया भर के लोगों का घेरा बनता है।

अरफ़ात की हाज़िरी का असल पहलू वही है जो आख़िरत से मुतअल्लिक है। हालाँकि इसमें मुसलमानों  के इत्तेहाद का भी गहरा राज़ छुपा हुआ है। क्योंकि इत्तेहाद एक मरकज़ पर जमा होने का नाम है। मुसलमान जब हज के मौक़े पर अपने रब के गिर्द इकट्ठा होते हैं तो इस अमल के दौरान वह उस केंद्र बिंदु को भी पा लेते हैं जो उनकी अनेकता को एकता में बदल सके। वह अपनी आख़िरत का राज़ पाने के साथ अपनी दुनिया का राज़ भी पा लेते हैं।

मेरे सामने दीवार पर बैतुल्लाह (काबा) की तस्वीर है। कुशादा मस्जिद के बीच काबा की जानी-पहचानी इमारत है और उसके चारों तरफ़ लाखों इंसान गोल दायरे में अपने रब के आगे झुके हुए इबादत कर रहे हैं। यह सालाना इज्तिमाई (सामूहिक) नमाज़ है जो हर बार हज के महीने में अदा की जाती है। इसमें दुनिया भर के 25 लाख से ज़्यादा मुसलमान शरीक होते हैं। यह पूरी तरह एक दिखाई देने वाला वाक़िया है और इसका फोटो लिया जा सकता है।

मगर काबा को क़िब्ला बनाकर उसके गिर्द नमाज़ पढ़ने वाले सिर्फ़ वही लोग नहीं हैं जो हरमे काबा (तवाफ़ करने की जगह) में दिखाई देते हैं, हरमे काबा के बाहर के मुसलमानों का मामला भी यही है। तमाम अरब के लोग इसी तरह रोज़ाना काबा की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ अदा करते हैं। इसी तरह पूरी दुनिया के हर देश के मुसलमान भी ऐसा ही करते हैं। यह दायरा बढ़ता रहता है यहाँ तक कि वह पूरी ज़मीन पर फैल जाता है।

आप तसव्वुर की आँखों से देखिए तो जो वाक़िया काबा के सेहन में होता है वही वाक़िया ज़्यादा बड़े पैमाने पर हर रोज़ सारी दुनिया में हो रहा है। सारी दुनिया के लोग रोज़ाना पाँच बार काबा की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ अदा करते हैं।

वह सारी दुनिया में काबा के चारों तरफ़ खड़े होते हैं। इस तरह गोया हर रोज़ पाँच बार ज़मीन पर मुसलमानों का गोल घेरा बनता है। बीच में काबा होता है और सारी दुनिया में उसके गिर्द घेरा बनाए हुए मुसलमान नमाज़ अदा कर रहे होते हैं। यह एक ऐसी अज़ीम और मुकम्मल एकजुटता है जिसकी मिसाल किसी भी दूसरे मज़हबी या ग़ैर-मज़हबी के यहाँ नहीं मिलती।

हक़ीक़त यह है कि काबा ज़मीन पर ख़ुदा का निशान है और इसी के साथ मुसलमानों के इत्तेहाद और एकजुटता का निशान भी। एकता के इस अज़ीमतर बुनियादी निज़ाम ही का यह भी एक ज़ाहिरी पहलू है कि तमाम लोगों से उनके अपने लिबास उतरवा कर सब को एक ही सादा लिबास पहना दिया जाता है। यहाँ बादशाह और जनता का फ़र्क़ मिट जाता है। यहाँ पूरबी लिबास और पश्चिमी लिबास के फ़र्क़ हवा में गुम हो जाते हैं। एहराम के साझा लिबास में तमाम लोग इस तरह नज़र आते हैं जैसे कि तमाम लोगों की सिर्फ़ एक हैसियत है। तमाम लोग सिर्फ़ एक ख़ुदा के बंदे हैं। इसके सिवा किसी को कोई और हैसियत हासिल नहीं।

हज के मुक़र्रर मरासिम (विधियाँ) अगरचे मक्का में ख़त्म हो जाते हैं मगर अक्सर हाजी हज से फ़ारिग़ होकर मदीना भी जाते हैं। मदीना का क़दीम नाम यस्रिब था। मगर पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी ज़माने में इसे अपना मरकज़ बनाया। उस वक़्त से इसका नाम मदीना-तुन-नबी (नबी का शहर) पड़ गया। मदीना इसी का इख़्तिसार (छोटा नाम) है। मदीना में रसूलुल्लाह (सल्ल०) की बनाई हुई मस्जिद है। यहाँ आपकी क़ब्र है। यहाँ आपकी पैग़म्बर वाली  ज़िंदगी के निशानात बिखरे हुए हैं।

इन हालात में हाजी जब मदीना पहुँचते हैं तो यह उनके लिए ज़्यादा इत्तेहाद और इज्तिमाइयत का अज़ीम सबक बन जाता है। यहाँ की मस्जिदे नबवी में वह इस याद को ताज़ा करते हैं कि उनका रहनुमा सिर्फ़ एक है। वह यहाँ से यह एहसास लेकर लौटते हैं कि उनके अंदर चाहे कितना ही इलाक़े और मुल्क का फ़र्क़ पाया जाता हो, उन्हें एक ही पैग़म्बर के बताए हुए रास्ते पर चलना है। उन्हें एक ही मुक़द्दस हस्ती को अपनी ज़िंदगी का रहनुमा बनाना है। वह चाहे कितने ही ज़्यादा और कितने ही मुख़्तलिफ़ हों मगर उनका ख़ुदा भी एक है और उनका पैग़म्बर भी एक।

Maulana Wahiduddin Khan
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