रोज़े का संबंध पूरी ज़िंदगी से
रमज़ान का रोज़ा साल में एक बार निभाई जाने वाली कोई रस्म नहीं है। यह एक जीवंत और रचनात्मक अमल है। रोज़े का संबंध केवल कुछ दिनों से नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी से है। रोज़े का वास्तविक उद्देश्य यही है कि मनुष्य की संपूर्ण जीवन-शैली रोज़ा-मुखी (Roza Oriented Life) बन जाए—ऐसी ज़िंदगी, जिसमें संयम, चेतना और आत्म-अनुशासन हर समय शामिल रहें।
रोज़े की असली सच्चाई इच्छाओं (desires) पर रोक लगाना है। इसी को हदीस में इच्छा को छोड़ना कहा गया है (सहीह अल-बुखारी, हदीस संख्या 7492)। प्यास एक इच्छा है, भूख एक इच्छा है, नींद एक इच्छा है, और रोज़ की आदत के अनुसार जीवन जीना भी एक इच्छा है। रोज़े के दिनों में इन सब इच्छाओं पर नियम के अनुसार रोक लगाई जाती है, ताकि इंसान इसी तरह अपनी दूसरी इच्छाओं पर भी अपनी मर्ज़ी से रोक लगाना सीख जाए। वह अपने फैसले से एक अनुशासित जीवन जीने लगे।
इंसान की ज़िंदगी के जितने भी काम हैं, उन सब में लगभग आधा-आधा का अनुपात होता है। यानी आधा किसी चीज़ से रुकना और आधा किसी चीज़ पर अमल करना। इस्लामी शिक्षाओं में ला-इलाह पहले आता है और उसके बाद इल्लल्लाह। नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं का यही संतुलन सभी धार्मिक कार्यों में पाया जाता है। इस दृष्टि से देखें तो रोज़े का उद्देश्य यह है कि इंसान अपनी इच्छाओं पर रोक लगाए, ताकि वह इस दुनिया में पसंदीदा कार्यों पर क़ायम रह सके।
उदाहरण के रूप में कहा जाए तो रोज़े की हैसियत इंसान की ज़िंदगी में इंजन में लगे ब्रेक (brake) जैसी है। ब्रेक इंजन को काबू में रखता है, इसलिए गाड़ी ठीक तरह से चलती है। अगर इंजन में ब्रेक न हो, तो इंजन सही ढंग से काम नहीं करेगा।
यही स्थिति एक सच्चे ईमान वाले की ज़िंदगी में रोज़े की है। इंसान को चाहिए कि वह रोज़े को अपनी ज़िंदगी में ब्रेक का स्थान दे, ताकि वह अल्लाह के रास्ते पर सही तरह से अपनी यात्रा पूरी कर सके। वही रोज़ा सच्चा रोज़ा है, जो इंसान के लिए अल्लाह की मना की हुई चीज़ों के सामने ब्रेक बन जाए।
