जीने का रहस्य
आज की दुनिया में हमेशा ऐसा होता है कि कई वजहों से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नाराज़गी के कारण पैदा हो जाते हैं। अगर कोई आगे बढ़ गया है, तो दूसरों में उसके प्रति जलन की भावना; अगर किसी को ज़्यादा मिल गया है, तो उसकी तुलना में अपने कम मिलने का एहसास; अगर किसी के ख़िलाफ़ शिकायत का कोई कारण है, तो उसके प्रति ग़ुस्सा और बदले की भावना वग़ैरह। इस तरह की भावनाएँ बेहद आम हैं और हर समाज में, यहाँ तक कि हर घर में मौजूद हैं, लेकिन सामान्य हालात में ये दिलों में दबी रहती हैं। लोगों की दिनचर्या भी इनके उभरने में एक रुकावट का काम करती है। हालाँकि अगर कोई असामान्य घटना हो जाए, तो ये भावनाएँ सामने आ जाती हैं।
असल में, सामाजिक शांति इन नकारात्मक भावनाओं को दबा हुआ रहने देने का नाम है। इसके उलट सामाजिक अशांति का मतलब है कि किसी मूर्खता के कारण इन छुपी हुई भावनाओं को भड़का दिया जाता है।
यह जीवन का एक अटल सच है। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में, कोई भी समाज, यहाँ तक कि एक परिवार भी इससे मुक्त नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में जीने का सिर्फ़ एक ही रहस्य है और वह यह है कि सब्र और समझदारी के रास्ते को अपनाकर इन दबी हुई भावनाओं को दबा हुआ ही रहने दिया जाए। इनके सामने आने को हर क़ीमत पर रोका जाना चाहिए।
यही जीने का वह रहस्य है, जिसे एक विचारक ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—“इस दुनिया में हर किसी के पास दूसरों की ख़ामियों को दफ़नाने के लिए एक विशाल क़ब्रिस्तान होना चाहिए।”
