पेरेस्त्रोइका
इन हालात ने रूसी प्रधानमंत्री मिस्टर मिखाइल गोर्बाचेव को मजबूर कर दिया कि वे हक़ीक़त का इकरार करें। उन्होंने साम्यवादी (कम्युनिस्ट) श्रेष्ठता के रवैये को छोड़ते हुए रूस में बदलाव लाने की एक नई मुहिम शुरू की, जिसे वे दो शब्दों में बयान करते हैं। पहला है ग्लास्नोस्त (glasnost)—यह एक रूसी शब्द है जिसका मतलब है खुलापन (openness)। दूसरा है पेरेस्त्रोइका (Perestroika)—इसका मतलब रूसी भाषा में पुनर्गठन (re-structuring) होता है। पेरेस्त्रोइका के नाम से मिस्टर गोर्बाचेव की एक किताब भी प्रकाशित हुई है, जिसका अंग्रेज़ी नाम इस तरह है:
Perestroika: New Thinking for our Country and the World.
इस आंदोलन के तहत रूस की पुरानी व्यवस्था में बड़े परिवर्तन किए जा रहे हैं। इनमें धार्मिक आज़ादी देना और अमेरिका जैसे पुराने विरोधी देश के साथ दोस्ताना संबंध बनाना भी शामिल है। इस सिलसिले में बहुत ही सीख देने वाली रिपोर्टें अख़बारों में छपी हैं। इनमें से एक रिपोर्ट वह है जो लॉस एंजेल्स और वॉशिंगटन पोस्ट न्यूज़ सर्विस के तहत अख़बारों में आई है। हिंदुस्तान टाइम्स (16 जनवरी 1988) ने इसे मिस्टर रॉय गट्टमैन (Roy Gutman) के नाम से प्रकाशित किया है। इसका शीर्षक इस प्रकार है:
Kremlin, White House now realistic. (p. 20)
रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल की घटनाओं के बाद रूस और अमेरिका के संबंधों में एक ऐतिहासिक परिवर्तन (historic shift) आया है। दोनों देशों में नई सोच (New thinking) पैदा हुई है। क्रेमलिन और व्हाइट हाउस—दोनों एक-दूसरे के मामले में हक़ीकत-पसंद बन रहे हैं। यह रिपोर्ट हम यहाँ अलग पेज पर नकल कर रहे हैं।
रूस के उप-विदेश मंत्री अलेक्ज़ेंडर बेस्मेर्टनिख ने कहा कि रूस और अमेरिका के बीच अब नई सोच उभर रही है। दोनों देशों के संबंधों में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है और उनके रिश्ते एक नए ऐतिहासिक दौर में प्रवेश कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी पहले कहा करते थे कि हम कम्युनिज़्म के फैलाव को रोक देंगे, हम उन्हें समुद्र में डुबा देंगे। मगर अब उन्होंने जान लिया है कि यह नामुमकिन है। पहले दोनों देश एक-दूसरे की निंदा करने और एक-दूसरे को काटने में लगे रहते थे, लेकिन यह नीति बिल्कुल बे-फायदा रही। अब दोनों तरफ के लोग हक़ीक़त-पसंद बन रहे हैं। अब हमारी टीम और उनकी टीम—दोनों हल-रुखी (solution-oriented) हैं:
That team and our team are solution-oriented.
पेरेस्त्रोइका के उद्देश्य और लक्ष्य क्या हैं, इसकी व्याख्या मिस्टर गोर्बाचेव ने विशेष साम्यवादी भाषा में इस तरह की है:
“और ज़्यादा लोकतंत्र, और ज़्यादा समाजवाद, मेहनतकश इंसान के लिए और बेहतर ज़िंदगी, क़ौम के लिए और ज़्यादा महानता, ऊँचाई और समृद्धि।”
मगर हक़ीक़त यह है कि पेरेस्त्रोइका समाजवाद की ओर “अगला क़दम” नहीं है—बल्कि समाजवाद से वापसी है। क्योंकि मार्क्स और लेनिन की व्याख्या के अनुसार समाजवाद की तरक़्क़ी पूँजीवाद की मौत के बाद होनी थी। समाजवाद की हर प्रगति पूँजीवादी व्यवस्था की वापसी और कमज़ोरी के बराबर थी। लेकिन आज सोवियत रूस, गोर्बाचेव की क़ियादत में, पूँजीवादी व्यवस्था से समझौता कर रहा है—बल्कि वह उसकी क़दरें अपनाकर अपने देश में तरक़्क़ी और खुशहाली का सपना देख रहा है।
पेरेस्त्रोइका समाजवादी सिद्धांतों की सत्यता का सबूत नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि इस दुनिया में सफलता सच्चाइयों को स्वीकार किए बिना मुमकिन नहीं। रेगन के शब्दों में: इस धरती पर हमें अच्छे और बुरे—दोनों तरह के लोगों के साथ रहना है। हक़ीक़त-पसंदी और समझौता ही इस दुनिया में तरक़्क़ी और कामयाबी का राज़ है।
