इबादत का दिखावा
हज़रत अबू बकरा सक़फ़ी कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया, “तुम में से कोई यह न कहे कि मैंने रमज़ान के पूरे रोज़े रखे और पूरी रातों में इबादत की।”
इस हदीस को बयान करने के बाद हज़रत अबू बकरा ने कहा: “मुझे नहीं पता कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने यह बात इसलिए कही कि लोग अपनी दीनदारी (नेक होने) का दिखावा न करने लगेंगे, या इस वजह से कि नींद और लापरवाही इंसान से हो ही जाती है।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 20406)
इस हदीस का मतलब यह नहीं है कि रमज़ान में पूरे रोज़े रखना ज़रूरी नहीं है, या रात की नमाज़ ज़रूरी नहीं है। यहाँ बात रोज़ा और नमाज़ की अहमियत को कम करने की नहीं है। असल बात यह है कि इंसान अपने रोज़े और नमाज़ को लोगों के सामने बयान न करे। इबादत के बारे में इस तरह का दिखावा सच्ची नीयत के ख़िलाफ़ है। जब कोई इंसान अल्लाह की इबादत करता है, तो उसके दिल में विनम्रता पैदा होती है। अल्लाह की महानता को महसूस करके उसका हाल यह हो जाता है कि बहुत कुछ करने के बाद भी वह यही समझता है कि मैंने कुछ भी नहीं किया। यह एहसास बिल्कुल सच्चा होता है, दिखावे के लिए नहीं।
अगर कोई आदमी लोगों के सामने यह कहे कि “अल्लाह का शुक्र है, मेरे सारे रोज़े पूरे हो गए” या “मैंने रमज़ान की सारी रातों में नमाज़ पढ़ी”, तो यह इस बात की निशानी है कि उसने इबादत को केवल बाहरी रूप में लिया है, उसके अंदर की भावना को नहीं। इबादत का बाहरी रूप लोगों को दिखाई देता है, इसलिए उसके बारे में कहा जा सकता है। लेकिन इबादत की असली भावना दिल के अंदर होती है, और उसका सही हाल अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। इसी वजह से जो व्यक्ति इबादत की असली भावना को पा लेता है, वह अपनी इबादत के बारे में हमेशा डर और सोच में रहता है। उसे यह एहसास रहता है कि पता नहीं, अल्लाह के यहाँ मेरी इबादत स्वीकार हुई या नहीं।
