अल्लाह के शआइर
(अल्लाह की निशानियाँ)

यह एक हक़ीक़त है कि ख़ुदा का हक़ीक़ी दीदार आख़िरत में होगा। मगर आख़िरत के ख़ुदाई दीदार पर यक़ीन रखते हुए भी इंसान यह चाहता है कि वह ख़ुदा को पाए। वह कल के आने से पहले आज के दिन ख़ुदा की क़ुर्बत (निकटता) हासिल करे। यह इंसान की फ़ितरत है। अब सवाल यह है कि इंसान की यह तलब मौजूदा दुनिया में किस तरह पूरी हो।

क़ुरआन, 2:158 में इसका जवाब अल्लाह के शआइर (निशानियों) की सूरत में दिया गया है। अल्लाह तआला ने कुछ चीज़ों को उनकी ख़ास तारीख़ी अहमियत की वजह से अपना शईरा (निशानी) क़रार दिया है। इन निशानियों या यादगारों के गिर्द ऐसे हालात जमा किए गए हैं कि उन्हें देखना ख़ुदा को देखना बन जाए। जिस ख़ुदा को इंसान सीधे तौर पर नहीं पा सकता, वह उसे इन यादगारों के ज़रिए पा ले। इंसान मौजूदा दुनिया में अल्लाह को नहीं देख सकता, अलबत्ता अल्लाह के शआइर को देख सकता है। वह मौजूदा दुनिया में अल्लाह को इस तरह नहीं पा सकता कि वह उसे छुए और उससे निकटता का एहसास करे। अलबत्ता वह अल्लाह की निशानियों को छू सकता है और उनके ज़रिये अल्लाह के क़रीब होने का एहसास हासिल कर सकता है।

शईरा का अर्थ है: निशान, अलामत, यादगार, और शआइर इसी की जमा (बहुवचन) है। यानी वह चीज़ जो खुद असल न हो, अलबत्ता वह किसी तअल्लुक़ की वजह से असल की याद दिलाए। इसकी एक मिसाल सफ़ा और मरवा की पहाड़ियाँ हैं जिन्हें क़ुरआन में शआइर कहा गया है  “सफ़ा और मरवा, बेशक अल्लाह की यादगारों में से हैं। (2:158)

सफ़ा और मरवा मक्का में काबा के क़रीब दो पहाड़ियाँ हैं जिनके दरमियान तक़रीबन 500 क़दम का फ़ासला है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जब अपनी पत्नी हाजरा और अपने दूध-पीते बच्चे इस्माईल को लाकर यहाँ बसाया तो यहाँ न कोई आबादी थी और न पानी। हज़रत हाजरा की मश्क का पानी ख़त्म हो गया तो वह सफ़ा और मरवा के बीच पानी की तलाश में सात बार दौड़ीं। उसी की याद में आज भी तमाम हाजी दोनों पहाड़ियों के दरमियान सात बार सई (दौड़) करते हैं।

यह अमल अल्लाह को पसंद आया और उसने सफ़ा और मरवा को अपनी निशानी क़रार दे दिया। यानी ख़ुदा-परस्ती की मुस्तनद (यक़ीनी) यादगार। सफ़ा और मरवा को देखकर वह पूरी तारीख़ याद आ जाती है जब कि अल्लाह के एक बंदे ने सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर अपने हरे-भरे वतन (इराक़) को छोड़ दिया और अपने बीवी और बच्चे को सूखे और वीरान इलाक़े में लाकर बसा दिया। यह अल्लाह पर यक़ीन और उस पर भरोसे की एक मुकम्मल मिसाल है।

इसी तरह काबा, हजरे अस्वद और हज से मुतअल्लिक दूसरी चीज़ें सब की सब अल्लाह की शआइर (निशानियाँ) हैं। ये दरअसल हज़रत इब्राहीम ख़लीलुल्लाह की ख़ुदा-परस्ती वाली ज़िंदगी की यादगार निशानियाँ हैं। इन्हें देखकर उनकी तौहीद से जुड़ी पूरी तारीख़ ज़हन में ताज़ा हो जाती है। इनके ज़रिये ख़ुदा की अज़मत और जलाल का एहसास भी दिल में फिर से जाग उठता है। इन शआइर के माहौल में पहुँचकर इंसान अपने आपको यूँ महसूस करता है, मानो वह ख़ुदाई माहौल में आ गया हो।

एक हदीस के मुताबिक़ हजरे अस्वद ज़मीन में अल्लाह का हाथ है (कंज़ुल उम्माल, हदीस संख्या 38072)। यह हक़ीक़ी मायनों में नहीं बल्कि तम्सीली (प्रतिकात्मक) मायनों में है। आदमी के अंदर उठने वाले रब्बानी जज़्बात अपनी तसकीन (तृप्ति) के लिए यह चाहते थे कि वे अल्लाह के हाथ को छुएँ और उसे छूकर अपने जज़्बे को मुतमइन करें, हजरे अस्वद को चूमकर आदमी अपने इसी जज़्बे की तसकीन (तृप्ति) हासिल करता है। इसी तरह आदमी चाहता था कि वह अल्लाह को पाकर उसके गिर्द घूमे, काबा के मुक़द्दस घर का तवाफ़ करके वह अपने इसी जज़्बे को तसकीन देता है। आदमी चाहता था कि वह अल्लाह की रज़ा के लिए दौड़े, वह सफ़ा और मरवा के दरमियान दौड़ता है तो उसे यही तसकीन (तृप्ति) हासिल होती है। इसी तरह हज के तमाम मरासिम किसी न किसी एतबार से इंसान के छिपे हुए जज़्बात की तस्कीन हैं। वे अपने रब से महसूस तअ़ल्लुक़ क़ायम करने का ज़रिया हैं।

माबूद की इबादत का जज़्बा फ़ितरी तौर पर इंसान के अंदर छिपा हुआ है। शिर्क और बुत-परस्ती इसी फ़ितरी जज़्बे का ग़लत इस्तेमाल है। एक ख़ुदा पर ईमान यह फ़ितरी जज़्बे को सही दिशा देता है, यही बात हज के मरासिम में भी है। हज एक तरह से इंसानी ग़लती को ठीक करना है। यह इंसान की चाहत को ग़लत दिशा में जाने से रोकता है और उसे सही दिशा में लगा देता है। हज इंसान के उसी जज़्बे को सुकून देने का सही तरीक़ा है, जिसे इंसान ग़लत तरीक़े से सुकून देना चाहता है।

इंसान यह चाहता है कि वह ख़ुदा को देखे, वह महसूस तौर पर उसे पाकर उसके आगे इबादत के मरासिम  अदा करे। इंसान ने अपने इस जज़्बे की तसकीन के लिए यह किया कि उसने न दिखाई देने वाले ख़ुदा की दिखने वाली तस्वीर (image) बनाई और इस खुद-साख़्ता (self-made) तस्वीर को ख़ुदा की तस्वीर समझकर उसकी पूजा शुरू कर दी। मगर यह क़ुरआन के अल्फ़ाज़ में इलहाद (बे-दीनी) है। इंसान अपने जिस फ़ितरी जज़्बे का जवाब खुदा के बुतों में तलाश कर रहा है उसका जवाब ज़्यादा सही तौर पर ख़ुदाई यादगारों में मौजूद है।

ख़ुदा का बुत बनाना वैसा ही है जैसे किसी इंसान की मूर्ति बनाना। मूर्ति वही बनाता है जिसने उस इंसान को या उसकी तस्वीर को देखा हो। लेकिन ख़ुदा के बारे में कोई भी यह दावा नहीं कर सकता। जब कोई इंसान ख़ुदा का बुत बनाता है, तो वह असीम को सीमित बना देता है। वह एक ऊँची और श्रेष्ठ हस्ती को साधारण चीज़ों में ढाल देता है। इस तरह का हर काम हक़ीक़त के ख़िलाफ़ है और असल में यह सरकशी जैसा है।

हज एक तरह से इंसानी ज़ेहन को ठीक करने का ज़रिया है। हज का पैग़ाम यह है कि ख़ुदा को “मुजस्समा” के स्तर पर उतारने की कोशिश न करो, बल्कि उसे उसके “शआइर” की सतह पर समझो। इस दुनिया में तुम ख़ुदा को उसकी ज़ात के स्तर पर नहीं पा सकते, लेकिन उसे उसकी निशानियों के स्तर पर पा सकते हो। ये शआइर वे हैं जो ख़ुदा के सच्चे इबादत करने वालों के अमल से क़ायम हुए हैं। ये तारीख़ के उन पलों की भौतिक यादगारें हैं, जब ख़ुदा और बंदे के बीच सीधा रिश्ता क़ायम हुआ—जब बंदे ने ख़ुदा को पाया और ख़ुदा ने अपने आप को बंदे के लिए ज़ाहिर किया।

तारीख़ के वे क़ीमती लोग जिन्होंने ख़ुदा-परस्ती को उसकी आला और मेयारी शक्ल में इख़्तियार किया, उनके आसार ही का नाम अल्लाह के शआइर (यादगारें) हैं। इन्हीं शआइर के दरमियान हज के तमाम मरासिम (विधियाँ) अदा किए जाते हैं। उनसे दूरी ख़ुदा से दूरी है और उनसे ताल्लुक़ ख़ुदा से तल्ल्लुक़।

Maulana Wahiduddin Khan
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