ख़ुद ही जानना पड़ता है
जब आप टेलर मास्टर को कोट सिलने के लिए कपड़ा देते हैं, तो वह आपके जिस्म का नाप लेता है। नाप लेने का मक़सद आपके जिस्म की बनावट का अंदाज़ा लगाना है, ताकि कोट आपके बदन पर एकदम फ़िट आए और उसमें कहीं भी सिकुड़न या ढीलापन न रहे, मगर टेलर मास्टर जिस्म के जिन कुछ हिस्सों का नाप लेता है, वह इतना इल्म एक कामयाब कोट बनाने के लिए काफ़ी नहीं होता। एक सही कोट बनाने के लिए टेलर मास्टर को बहुत-सी बातें ख़ुद ही जाननी पड़ती हैं। इसकी वजह यह है कि जिस्म के उभार-गड्ढे इतने ज़्यादा हैं कि हर हिस्से का पूरा नाप लेना मुमकिन नहीं। अगर टेलर की जानकारी सिर्फ़ उन्हीं नापों तक सीमित रहे, तो वह कभी भी एक अच्छा कोट नहीं बना सकता।
यही बात ज़िंदगी के दूसरे मामलों के लिए भी सही है। चाहे घर चलाने का मामला हो या समाज का—हर काम तभी कामयाब हो सकता है, जब उसे ऐसे लोग मिल जाएँ, जो बताए बिना ही बातों को समझ जाएँ, जो बिना ज़्यादा जानकारी के हर मौक़े पर संतोषजनक जवाब ढूँढ लें।
जो लोग सिर्फ़ किताबों में लिखी बातों को जानते हैं और जहाँ किताब ख़त्म होती है, वहाँ अपना काम भी ख़त्म समझ लेते हैं— ऐसे लोग कभी कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। इसी तरह जब कोई मिशन चलाया जाता है, तो बार-बार ऐसी बातें सामने आती हैं, जिनके बारे में पहले से अंदाज़ा नहीं था या लोगों को पहले से आगाह नहीं किया जा सका था। ऐसे मौक़ों पर ज़रूरत होती है कि लोग बिना बताए ही बातों को समझ जाएँ। अगर उनकी समझ इतनी विकसित नहीं है, तो उन्हें मार्गदर्शकों पर भरोसा करते हुए स्थिति को स्वीकार कर लेना चाहिए और ख़ुद को उसके मुताबिक़ ढाल लेना चाहिए। जिस मिशन के लोगों में यह क़ाबिलियत नहीं होती, वे बार-बार ख़ुद-ब-ख़ुद शिकायतें लेकर बैठ जाएँगे, मामलों की हक़ीक़त जाने बिना अपनी मनमानी राय बना लेंगे और फिर नाराज़ होकर अलग हो जाएँगे।
किसी भी मिशन को कामयाबी तक पहुँचाने के लिए बहुत गहरी समझ और बहुत बड़ा दिल चाहिए। जिन लोगों में यह ख़ूबी नहीं होती, वे सिर्फ़ तारीख़ के कूड़ेदान में जगह पाएँगे, चाहे वे दीवारों के पोस्टरों पर अपने आपको तारीख़ बनाने वाला क्यों न लिखते रहें।
