अल्लाह की रहमत वही पाता है जो रहम करे
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—“जो इंसानों पर रहम नहीं करता, अल्लाह भी उस पर रहम नहीं करता।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2319)
मेहनत की कमाई सबसे अच्छी है
किसी ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा: “अल्लाह के रसूल, सबसे अच्छी कमाई कौन-सी है?” आप (सल्ल०) ने जवाब दिया: अपनी मेहनत से कमाई हुई रोज़ी, और ऐसा व्यापार जिसमें धोखा न हो। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 17265)
अपना इह्तेसाब (आत्म-परीक्षण), न की दूसरों का
हम्ज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ि०) रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आए और बोले—“ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे लिए कोई ऐसी बात तय कर दीजिए जिससे मैं ज़िंदगी गुज़ारूँ।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने पूछा—“हम्ज़ा! तुम्हें क्या ज़्यादा अच्छा लगता है—किसी की जान बचाना या किसी की जान लेना?” उन्होंने कहा—“मुझे किसी की जान बचाना ज़्यादा पसंद है।” आप (सल्ल०) ने कहा—”तुम्हारे ऊपर सिर्फ़ तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 6639)
खुशदिली से मिलो और नरम बात बोलो
इब्न उमर (रज़ि०) ने कहा—“नेकी आसान है—मुस्कराता चेहरा और नरम बोल।” (अल-जामिउस सग़ीर, हदीस संख्या 10271)
ईमान इंसान को अल्लाह वाला बनाता है
बरा बिन आज़िब कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—“ईमान की सबसे मज़बूत डोर यह है कि इंसान अल्लाह के लिए मोहब्बत करे और अल्लाह के लिए दुश्मनी करे। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 18524)
ख़ुदा के हुक्म के आगे झुकना
ताइफ़ के क़बीले सक़ीफ़ का एक घराना बनू अम्र बिन उमैर था और क़बीला बनू मख़ज़ूम का एक घराना था—बनू मुग़ीरा । इन दोनों घरानों के बीच इस्लाम से पहले सूद (ब्याज) का लेन-देन चलता था। मक्का फ़तह होने के बाद जब दोनों मुसलमान हो गए, उस वक़्त बनू अम्र बिन उमैर का सूद बनू मुग़ीरा पर बाक़ी था। उन्होंने अपना बक़ाया माँगा। बनू मुग़ीरा ने आपस में बात की और तय किया कि अब जबकि हम मुसलमान हो गए हैं, तो अपनी हलाल कमाई से सूद नहीं देंगे। इस बात पर झगड़ा बढ़ गया। उस समय मक्का में नबी (सल्ल०) की तरफ़ से अत्ताब बिन असीद हाकिम थे। उन्होंने नबी (सल्ल०) को यह मामला बताया। तो नबी (सल्ल०) ने जवाब में क़ुरआन की यह आयत लिखकर भेजी: “ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो और जितना सूद बाक़ी है, उसे छोड़ दो अगर तुम सच्चे मोमिन हो। और अगर ऐसा न करोगे तो अल्लाह और उसके रसूल से जंग के लिए तैयार रहो।” (2:278-279) यह आयत सुनते ही बनू अम्र बिन उमैर का मन बदल गया। उन्होंने कहा: “हम अल्लाह की तरफ़ लौटते हैं और बाक़ी सूद छोड़ते हैं।” (तफ़्सीर इब्ने कसीर, खण्ड 1, पृष्ठ. 553)
जो रहम करेगा, उस पर रहम किया जाएगा
सुनन अल-तिर्मिज़ी में वर्णन है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “जो रहम करने वाले हैं, रहम करने वाला (अल्लाह) उन पर रहम करता है। तुम ज़मीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम करेगा।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 1924)
जो कुछ होता है, अल्लाह ही की तरफ़ से होता है
अली बिन अबी तालिब (रज़ि०) से कहा गया: “क्या हम आपकी पहरेदारी करें?” उन्होंने कहा: “इंसान की तक़दीर ही उसकी हिफ़ाज़त करती है।” एक और रिवायत में है कि नबी (सल्ल०) ने कहा:
“हर चीज़ की एक सच्चाई होती है। और बंदा तब तक ईमान की असली सच्चाई तक नहीं पहुँच सकता जब तक वह यह न जान ले कि जो चीज़ उसे मिली, वह उससे चूक नहीं सकती थी। और जो चीज़ उससे चूक गई, वह उसे मिल नहीं सकती थी।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 27490)
ईमान की लज़्ज़त इंसान तब तक नहीं पाता जब तक यह न मान ले कि जो उसके साथ हुआ, वह टल नहीं सकता था, और जो नहीं हुआ, वह कभी होने वाला नहीं था।
इस्लाम की शिक्षा देना सबसे क़ीमती काम है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “अगर अल्लाह तुम्हारे ज़रिए किसी एक इंसान को भी हिदायत (सत्य का मार्ग) दिखा दे, तो ये तुम्हारे लिए उन सब चीज़ों से बेहतर है जिन पर सूरज निकलता है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2942)
दाई (संदेश वाहक) हमेशा भलाई चाहता है, चाहे उसकी बात कोई न माने और उसके साथ दुर्व्यवहार ही क्यों न करें
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने बीस दिन से ज़्यादा ताइफ़ का घेराव किया। जब मुसलमानों के लिए ये मुश्किल हो गया तो आपने लौटने का हुक्म दिया। एक आदमी ने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल, क़बीला सक़ीफ़ के लिए बद्दुआ कीजिए।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने दोनों हाथ उठाए और कहा: “ऐ अल्लाह, सक़ीफ़ को सत्य का मार्ग दिखा और उन्हें हमसे मिला दे।” (अल-बिदाया वन्-निहाया, खंड 4, पृष्ठ 47)
इसी तरह आपसे कहा गया कि क़बीला दोस विद्रोही और अवज्ञाकारी हो गया है, उसके लिए बद्दुआ कीजिए। आपने कहा: “ऐ अल्लाह, क़बीला दोस को हिदायत दे और उन्हें ईमान वाला बना दे।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6397)
वो नेकी, नेकी नहीं है जिससे घमंड पैदा हो
अहमद बिन अताउल्लाह अल-इस्कंदरी (658-709 हिजरी) ने अपनी किताब अल-हिकम में लिखा है: “वो गुनाह जिससे इंसान में विनम्रता और हीनता का भाव आए, उस नेकी से बेहतर है जिससे इंसान में घमंड और अकड़ आ जाए।”
अल्लाह की याद ही अमल का सार है
हज़रत अबू दरदा से उल्लेख है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: “क्या मैं तुम्हें न बताऊँ कि कौन-सा कर्म सबसे उत्तम है, और तुम्हारे पालनहार के निकट सबसे पवित्र है, और तुम्हारे दर्जे को ऊँचा करने वाला है, और तुम्हारे लिए सोने-चाँदी दान करने से भी बेहतर है, और इससे भी बढ़कर है कि तुम अपने दुश्मन से युद्ध करो, उनकी गर्दनें काटो और वे तुम्हारी गर्दनें काटें?” सहाबा ने कहा: “हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल!” आप ने फ़रमाया: “अल्लाह को याद करना।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 3377)
योग्य और नेक इंसान सबसे क़ीमती होता है
हज़रत उमर (रज़ि०) ने एक बार अपने दोस्तों से कहा: “अपनी-अपनी इच्छाएँ बताओ।” किसी ने कहा: “मेरी तमन्ना है कि यह घर दिरहम (चाँदी के सिक्कों) से भर जाए और मैं सब अल्लाह की राह में खर्च कर दूँ।” किसी ने कहा: “मेरे पास इस घर जितना सोना होता तो मैं उसे अल्लाह की राह में देता।” किसी ने कहा: “काश यह घर मोतियों से भर जाता और मैं उन्हें अल्लाह की राह में खर्च करता।” तब हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा: “लेकिन मेरी ख्वाहिश तो यह है कि यह घर अबू उबैदा बिन जर्राह, मुआज़ बिन जबल और हुज़ैफ़ा बिन अल-यमान जैसे लोगों से भर जाए, और मैं उन्हें अल्लाह के काम में लगाऊँ।” (उस्दुल ग़ाबा फ़ी मारिफ़तिस सहाबा, खण्ड 1, पृष्ठ 469)
नेता या सरदार की अच्छाईयाँ
इब्न सअद बताते हैं कि अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा—मैंने उमर (रज़ि०) की इतनी सेवा की कि उनके घरवालों में से भी किसी ने उतनी नहीं की। वे मुझे हमेशा अपने पास बिठाते और इज़्ज़त देते थे। एक दिन मैं उनके घर में अकेला था। अचानक उन्होंने इतनी गहरी सांस ली कि मुझे लगा अभी उनकी जान निकल जाएगी। मैंने पूछा—क्या आपने डर की वजह से यह आह भरी? उन्होंने कहा— हाँ। मैंने पूछा—कौन-सा डर? उन्होंने कहा—पास आओ। जब मैं पास गया तो बोले—इस काम (नेतृत्व) के लिए मुझे कोई सही आदमी नज़र नहीं आता। मैंने छह लोगों के नाम गिनाए और कहा—क्या आप फलां-फलां को भूल रहे हैं? मैं एक-एक नाम लेता गया और वे हर एक के बारे में कुछ न कुछ कहते रहे। आखिर में उन्होंने कहा—“यह काम उसी के लिए ठीक है जो सख़्त हो मगर अकड़ वाला न हो, नरम हो मगर कमज़ोर न हो, ख़र्च करने वाला हो मगर फ़ुज़ूलखर्च न हो, और रोकने वाला हो मगर कंजूस न हो।”
अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहा—ये सारे गुण उमर (रज़ि०) के अलावा किसी और में इकट्ठे नहीं मिले। (कन्जुल उम्माल, असर संख्या 14255)
अमीर (लीडर) के साथी कैसे हों
आमिर शाबी कहते हैं कि अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने बताया कि मेरे पिता ने मुझसे कहा—“बेटा! मैं देखता हूँ कि अमीरुल मोमिनीन (उमर रज़ि.) तुम्हें अपनी बैठकों में बुलाते हैं, पास बिठाते हैं और रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथियों के साथ तुमसे भी मशविरा करते हैं। तुम मेरी तीन बातें याद रखो: “अल्लाह से डरना। अमीरुल मोमिनीन तुम्हें कभी झूठा न पाएं। उनका राज़ कभी बाहर मत कहना और उनके सामने किसी की बुराई या चुग़ली मत करना।”
आमिर कहते हैं—मैंने अब्दुल्लाह बिन अब्बास से कहा, इनमें से हर एक नसीहत हज़ार के बराबर है। उन्होंने जवाब दिया—हर नसीहत तो दस हज़ार से भी बढ़कर है। (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, असर संख्या 10619)
चापलूस लोगों का साथ अच्छी निशानी नहीं है
आयशा (रज़ि०) कहती हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “जब अल्लाह किसी हाकिम (शासक) के लिए भलाई चाहता है तो उसके साथ सच्चा सलाहकार रखता है। अगर हाकिम भूल जाए तो उसे याद दिलाए, और अगर उसे याद हो तो उसका साथ दे। लेकिन जब अल्लाह उसके लिए भलाई नहीं चाहता, तो उसे बुरा सलाहकार दे देता है—वो अगर भूल जाए तो याद न दिलाए, और अगर याद हो तो साथ न दे।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2932)
सिर्फ़ शब्दों से जताया जाने
वाला लगाव काफ़ी नहीं
जुबैर बिन नुफैर कहते हैं: मेरे अब्बा बताते थे कि हम एक दिन मिक़दाद बिन असवद (रज़ि०) के पास बैठे थे। उसी वक़्त एक आदमी गुज़रा। उन्हें देखकर उसने कहा: “कितनी खुशनसीब हैं ये आँखें जिन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को देखा। ख़ुदा की क़सम! काश हम भी वो सब देखते जो आपने देखा और जिन मौक़ों पर आप रहे हम भी रहते।” मुझे उसकी बात अच्छी लगी और मैंने सोचा कि उसने तो अच्छी ही बात कही। लेकिन मिक़दाद (रज़ि०) नाराज़ हो गए और बोले: “इंसान को क्यों ऐसी जगहों की हाज़िरी की तमन्ना करनी चाहिए जिसे अल्लाह ने उससे बचाकर रखा है? कौन जाने उस वक़्त अगर ये मौजूद होता तो कैसा बर्ताव करता! ख़ुदा की क़सम, बहुत से लोग रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आए, लेकिन अल्लाह ने उन्हें जहन्नम में डाल दिया क्योंकि उन्होंने न आपकी बात मानी और न आप पर ईमान लाए।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 23810)
इब्राहीम तैम़ी अपने अब्बा से रिवायत करते हैं: कूफ़ा का एक शख़्स हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ि०) से बोला: “अबू अब्दुल्लाह! क्या आपने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को देखा और उनकी संगत में रहने का अवसर मिला?” हुज़ैफ़ा (रज़ि०) ने कहा: “हाँ, भतीजे।” उसने पूछा: “आप लोग उस वक़्त क्या करते थे?” हुज़ैफ़ा (रज़ि०) बोले: “ख़ुदा की क़सम! हम बहुत मुश्किलें उठाते थे।” कूफ़ी ने कहा: “ख़ुदा की क़सम! अगर हम उस ज़माने में होते तो आपको ज़मीन पर चलने ही न देते, आपको अपनी गर्दनों पर उठाए रहते, आपकी सेवा करते और हर काम करते।” (अल-बिदायह वन्-निहायह, खण्ड 4, पृष्ठ 113)
सहीह मुस्लिम में ये अल्फ़ाज़ भी आए हैं कि उस आदमी ने कहा: “अगर हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) का ज़माना पाते तो आपके साथ लड़ते और हर सख़्ती झेलते।” इस पर हुज़ैफ़ा (रज़ि०) ने कहा: “क्या सच में तुम ऐसा करते?” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1788)
सच्चाई और निष्ठा के बिना कोई
भी बलिदान स्वीकार्य नहीं होता
उहुद की लड़ाई (3 हिजरी) में एक मुसलमान शामिल हुआ और लड़ते-लड़ते मारा गया। जब उसकी माँ को ख़बर मिली तो उसने कहा—“हाय, मेरा बेटा शहीद हो गया।” पैगंबर (सल्ल०) ने यह सुना तो कहा—“रुको, तुम्हें कैसे पता कि वह सच में शहीद हुआ? हो सकता है कि वह फुज़ूल बातें करता रहता हो और ऐसी चीज़ देने में कंजूसी करता रहा हो जिसके देने में उसका कोई नुक़सान न होता।” (मुस्नद अबू याला, हदीस संख्या 6646)
किसी को भी अल्लाह के बराबर मत ठहराओ
अब्दुल्लाह इब्न अब्बास बताते हैं—एक आदमी नबी (सल्ल०) के पास आया और बातचीत में कहने लगा—“जो अल्लाह चाहे और आप चाहें।” रसूल (सल्ल०) ने इस बात को अच्छा नहीं माना और कहा—“क्या तुमने मुझे अल्लाह के बराबर कर दिया? बल्कि यूँ कहो—जो केवल अल्लाह चाहे” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 2561)
आख़िरी वक़्त तक अल्लाह पर भरोसा
रसूलुल्लाह (सल्ल०) हिजरत के लिए मक्का से निकले तो सबसे पहले तीन दिन तक ग़ार-ए-सौर (सौर नामी गुफ़ा) में ठहरे। क़ुरैश के लोग उन्हें तलाश करते-करते उसी ग़ार तक पहुँच गए। अबू बक्र (रज़ि०) ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! दुश्मन इतने क़रीब आ गए हैं कि अगर उनमें से कोई अपने पैरों की तरफ़ देख ले तो हमें अपने क़दमों के नीचे देख लेगा।” रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया—“अबू बकर, तुम्हारा क्या ख़याल है उन दो के बारे में जिनका तीसरा साथी अल्लाह है?” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2381)
दुनियावी परेशानियों में ख़ुदा की याद का सहारा लेना
अली इब्न अबी तालिब (रज़ि०) बताते हैं कि फ़ातिमा (रज़ि०) का हाल ये था कि घर का सारा काम उन्हीं को करना पड़ता। चक्की पीसते-पीसते उनके हाथों में छाले पड़ गए थे। बाहर से मशक भरकर पानी लाना पड़ता, जिससे गर्दन पर निशान पड़ गया था। झाड़ू लगाने से उनके कपड़े गंदे हो जाते। एक बार रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास कुछ बंदी आए। मैंने फ़ातिमा से कहा—“तुम अपने अब्बा के पास जाओ और अपने लिए एक मुलाज़िम माँग लो।” फ़ातिमा (रज़ि०) गईं, लेकिन वहाँ बहुत सारे लोग थे। आप (सल्ल०) से मिल नहीं सकीं और वापस लौट आईं। अगले दिन रसूलुल्लाह (सल्ल०) हमारे घर आए और पूछा—“क्या काम था?” फ़ातिमा (रज़ि०) चुप रहीं। तब मैंने पूरा किस्सा बताया: “...चक्की पीसने से उन (फातिमा) के हाथों पर निशान पड़ गए हैं, पानी से भरा मश्कीज़ा लाने से उनकी गर्दन में (पट्टे का) निशान पड़ गया है, घर में झाड़ू लगाने से कपड़े मैले हो जाते हैं...।” ये सुनने के बाद रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उन्हें नौकर नहीं दिया, बल्कि फ़रमाया—
“ऐ फ़ातिमा! अल्लाह से डरो, अपने रब के फ़र्ज़ निभाओ और अपने घर का काम खुद करो। जब बिस्तर पर जाओ तो 33 बार ‘सुब्हान अल्लाह’ कहो, 33 बार ‘अल्हम्दु लिल्लाह’ कहो और 34 बार ‘अल्लाहु अकबर’ कहो। ये पूरे सौ होंगे और ये तुम्हारे लिए नौकर से बेहतर है।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2988)
आख़िरत का ज़िक्र आते ही
अपना दावा छोड़ दिया
उम्मे सलमा (रज़ि०) कहती हैं कि—अनसार के दो आदमी एक पुरानी विरासत का झगड़ा लेकर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के पास आए। उस मामले में दोनों के पास न तो कोई गवाह था और न सबूत। रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया—“तुम लोग अपना झगड़ा मेरे पास लाते हो और मैं भी एक इंसान हूँ, हो सकता है तुममें से कोई अपनी बात ज़्यादा अच्छे ढंग से रखे और मैं उसी हिसाब से फ़ैसला कर दूँ। लेकिन अगर मैंने किसी के हक़ में ऐसा फ़ैसला कर दिया जिसमें मैंने उसके भाई का हिस्सा काटकर उसे दे दिया हो, तो वह उसे न ले। क्योंकि असल में मैंने उसे आग का टुकड़ा दिया है जिसे वह क़ियामत के दिन अपनी गर्दन में लटकाए हुए आएगा।” यह सुनकर दोनों अनसारी आदमी रो पड़े। दोनों ने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपना हक़ अपने भाई को देता हूँ।” रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया—“जब तुमने ऐसा कर दिया है तो अब जाओ, विरासत को दो हिस्सों में बाँटो। फिर पर्ची डालकर तय करो और जो हिस्सा तुम दोनों में से किसी को मिले, दूसरा उसको उसके लिए हलाल कर दे।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 26717)
अल्लाह के डर से कोड़ा हाथ से गिर पड़ा
अबू मसऊद बदरी (रज़ि०) कहते हैं—एक दिन मैं किसी बात पर अपने ग़ुलाम से नाराज़ हो गया और उसे कोड़े से मारने लगा। तभी पीछे से आवाज़ आई—“ऐ अबू मसऊद! जान लो।” लेकिन मैं ग़ुस्से में था, आवाज़ को पहचान न सका। जब आवाज़ देने वाला क़रीब आया तो देखा कि वह अल्लाह के रसूल (सल्ल०) हैं। आप फ़रमा रहे थे—
“अबू मसऊद! जान लो, जितना क़ाबू तुम्हें इस इंसान पर है, उससे कहीं ज़्यादा क़ाबू अल्लाह को तुम पर है।”
यह सुनकर कोड़ा मेरे हाथ से गिर पड़ा। मैंने कहा—“अब मैं कभी किसी ग़ुलाम को नहीं मारूँगा। मैं इस ग़ुलाम को अल्लाह की ख़ुशी के लिए आज़ाद करता हूँ।” आपने फ़रमाया—“अगर तुम ऐसा न करते तो आग की लपट तुम्हें छू लेती।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 1659)
कमज़ोर से व्यवहार करते समय भी
ख़ुदा की सज़ा का भय बनाए रखो
रसूलुल्लाह (सल्ल०) अपनी पत्नी उम्मे सलमा (रज़ि०) के घर पर थे। आपको किसी काम के लिए ख़ादिमा (नौकरानी) की ज़रूरत हुई। आपने उसे आवाज़ दी, मगर वह न आई। आपके चेहरे पर ग़ुस्से का असर नज़र आने लगा। उम्मे सलमा (रज़ि०) उठीं और परदे के पास जाकर देखा तो वह ख़ादिमा बाहर बकरियों के बच्चों से खेल रही थी। उम्मे सलमा ने दोबारा उसे बुलाया, तब वह आई। उस वक़्त रसूलुल्लाह (सल्ल०) के हाथ में एक मिस्वाक थी। आपने उससे कहा— “अगर मुझे क़ियामत के दिन की सज़ा का डर न होता, तो मैं तुझे इसी मिस्वाक से मारता।” (अल-अदबुल-मुफरद, हदीस संख्या 184)
अल्लाह से माँगने की सबसे बड़ी
चीज़—मग़फ़िरत (क्षमा)
अनस बिन मालिक (रज़ि०) कहते हैं—अंसार के पास काम करने वाले ऊँटों की कमी हो गई। वे रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आए ताकि आप उनके लिए ऊँटों का इंतज़ाम कर दें या कोई बहती नहर खुदवा दें। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उन्हें देखकर कहा—“अंसार के लिए स्वागत है, अंसार के लिए स्वागत है। अल्लाह की क़सम! आज तुम मुझसे जो भी माँगोगे, मैं तुम्हें ज़रूर दूँगा। और तुम्हारे लिए जो चीज़ भी मैं अल्लाह से माँगूँगा, वह ज़रूर देगा।” यह सुनकर अंसार का दिल बदल गया। उन्होंने सोचा—माँगने की सबसे बड़ी चीज़ तो आख़िरत है। ऐसे क़ीमती मौक़े पर दुनिया क्यों माँगें? उन्होंने एक-दूसरे से कहा—“इस मौक़े को ग़नीमत जानो और मग़फ़िरत (क्षमा) माँगो।” उन्होंने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! हमारे लिए मग़फ़िरत की दुआ कीजिए।” आपने फ़ौरन कहा—“ ऐ अल्लाह! अंसार को माफ़ कर दे, उनके बेटों को माफ़ कर दे, उनकी औरतों को माफ़ कर दे।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 12414)
ग़ुस्सा न कर, ग़ुस्सा न कर, ग़ुस्सा न कर
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं—एक व्यक्ति रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया और कहा—“मुझे नसीहत कीजिए।” आपने फ़रमाया—“ग़ुस्सा न कर।” उसने फिर कहा—“मुझे नसीहत दीजिए।” आपने फिर फ़रमाया—“ग़ुस्सा न कर।” वह बार-बार कहता रहा और आप हर बार यही कहते रहे—“ग़ुस्सा मत कर।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 6116)
दुनिया से भरे हुए, पर आख़िरत से ख़ाली
हज़रत अबू दरदा ने कहा—“यह क्या बात है कि खाने-पीने की चीज़ों से तुम्हारे पेट भरे हुए हैं लेकिन इल्म (ज्ञान) व मारिफ़त से तुम ख़ाली हो” (जामि बयानुल इल्म, खण्ड 2, पृष्ठ 202)
वे अल्लाह को देखकर खुश होंगे और
अल्लाह उन्हें देखकर खुश होगा
तल्हा बिन बरा (रज़ि०) नबी (सल्ल०) से बैअत करने आए। उस समय वे जवान थे। उन्होंने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! आप जो भी कहेंगे, मैं मानूँगा। कभी नाफ़रमानी नहीं करूँगा।” आप (सल्ल०) ने पूछा—“अगर मैं कहूँ कि माँ-बाप से रिश्ता तोड़ दो, तब भी मानोगे?” रावी बताते हैं—उनकी माँ थी और वे उनका बहुत ध्यान रखते थे। लेकिन तल्हा बिन बरा फिर भी तैयार हो गए। तब आप (सल्ल०) ने कहा—“ऐ तल्हा! हमारे धर्म में रिश्ते तोड़ना नहीं है। मैंने तो बस यह चाहा कि तुम्हें अपने ईमान पर पूरा यक़ीन हो।”
तल्हा बिन बरा ने इस्लाम क़बूल किया और अपनी मृत्यु तक सच्चे और नेक मुसलमान बने रहे। जब वे अपनी अंतिम बीमारी से गुज़र रहे थे, नबी (सल्ल०) उनका हालचाल लेने आए। आपने देखा कि वे बेहोश हैं। आपने कहा—“मुझे लगता है कि तल्हा आज रात ही इस दुनिया से चले जाएँगे।” फिर आप यह कह कर वापस आ गए—“जब इन्हें होश आए तो मुझे बुला लेना।” आधी रात को उन्हें होश आया, लेकिन उन्होंने कहा—“किसी को मत भेजो, रात को अंधेरे में कहीं आपको कोई नुकसान न पहुँचे।” उसी रात उनका इंतक़ाल हो गया। सुबह की नमाज़ के बाद जब नबी (सल्ल०) को ख़बर दी गई तो आपने दुआ की:
“ऐ अल्लाह! तू तल्हा से ऐसे मिलना कि वह तुझे देखकर प्रसन्न हो और तू उसे देखकर प्रसन्न हो।”
(अल-जामिउल कबीर, अल-सुयूती, हदीस संख्या 9769)
महत्त्व उस इंसान का है जो तुम्हारे
भीतर बसता है
रसूलुल्लाह (सल्ल०) से अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा के बारे में शिकायत की गई कि वे मज़ाक़ और हँसी-ठिठोली करते रहते हैं। आप (सल्ल०) ने कहा—“उन्हें छोड़ दो। उनके दिल में अल्लाह और उसके रसूल से सच्चा प्यार है।” (अल-जामिउल कबीर कबीर, अल-सुयूती, हदीस संख्या 715)
दो संभावनाओं के बीच
रसूलुल्लाह (सल्ल०) दुआ करते समय अक्सर कहते थे—“ऐ दिलों को पलटने वाले, मेरा दिल अपने धर्म पर मज़बूत कर दे।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 3587) एक दिन हज़रत आयशा ने सुना तो पूछा—ऐ ख़ुदा के रसूल! आप ये दुआ बार-बार क्यों करते हैं? आपने फरमाया—
हर इंसान का दिल अल्लाह की उँगलियों में से दो उँगलियों के बीच होता है। जब वो चाहता है उसे सीधा कर देता है और जब चाहे तो उसे पलट देता है। (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 19504)
इससे पता चलता है कि कोई भी इंसान भटकने के ख़तरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हर किसी को अपने ईमान की लगातार देखभाल करनी है। हर वक्त अल्लाह से ये दुआ माँगनी चाहिए कि वो हमें भटकने या ग़लती करने से बचाए। जिस पल अल्लाह की मदद इंसान से हट जाएगी, उसी पल वो रास्ता भटक जाएगा। इंसान हमेशा हिदायत और गुमराही के बीच खड़ा होता है और सिर्फ़ अल्लाह की मदद ही उसे सही रास्ते पर टिकाए रख सकती है।
ज़बान और दिल—सबसे अच्छे भी,
सबसे बुरे भी
लुक़मान हकीम एक हब्शी ग़ुलाम थे। उनके मालिक ने एक दिन कहा—एक बकरी ज़बह करो और उसमें से दो सबसे अच्छे टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़बह की और ज़बान और दिल निकालकर मालिक को दे दिए। कुछ दिन बाद मालिक ने फिर कहा—एक बकरी ज़बह करो और उसमें से दो सबसे बुरे टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़बह की और फिर ज़बान और दिल निकालकर सामने रख दिए। मालिक ने हैरानी से पूछा—जब मैंने सबसे अच्छे टुकड़े माँगे तो तुमने ज़बान और दिल निकाले, और जब सबसे बुरे टुकड़े माँगे तब भी यही निकाले। क्यों? लुक़मान हकीम ने जवाब दिया—अगर ज़बान और दिल ठीक हों तो इनसे अच्छी कोई चीज़ नहीं, और अगर ये बिगड़ जाएँ तो इनसे बुरी भी कोई चीज़ नहीं। (तफ़्सीर इब्ने कसीर, खंड 11, पृष्ठ 50)
हर हाल में पैग़म्बर (सल्ल०) की आज्ञा मानना
हज़रत मुग़ीरा बिन शोबा ने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से कहा कि मैं फ़लाँ की बेटी से शादी करना चाहता हूँ। आपने कहा—पहले जाकर उसे देख लो। वे लड़की के माँ-बाप के पास गए, अपना इरादा बताया और रसूल का पैग़ाम सुनाया। माँ-बाप को यह बात अच्छी नहीं लगी कि उनकी बेटी किसी अजनबी के सामने आए और वह उसे देखे। उस वक्त लड़की घर के अंदर थी और परदे के पीछे से बातें सुन रही थी। उसने ज़ोर से कहा—अगर अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने हुक्म दिया है तो आकर मुझे देख लो। और अगर उन्होंने हुक्म नहीं दिया है तो मैं तुम्हें ख़ुदा की क़सम देती हूँ कि ऐसा बिलकुल मत करना। (अस्सुननुल कुबरा, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 13490)
इस्लाम के कलिमा की वास्तविकता—
इख्लास (निष्ठा) और परहेज़गारी है
हज़रत उस्मान बिन अफ्फान कहते हैं—मैंने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को कहते सुना कि मैं ऐसा कलिमा जानता हूँ, जो भी इंसान उसे दिल से कहेगा, उस पर आग हराम हो जाएगी। हज़रत उमर फ़ारूक़ ने कहा—मैं बताता हूँ कि वह कलिमा क्या है। वह है निष्ठा (इख़लास) का कलिमा, जिसे अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल०) और उनके साथियों पर फ़र्ज़ किया था। यह परहेज़गारी (तक़्वा) का कलिमा है, जिसकी सीख अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने अपने चाचा अबू तालिब को मौत के वक़्त दी थी। वह है इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं है। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 447)
ईमान की असलियत यह है कि इंसान
अदृश्य वास्तविकताओं को देखने लगे
हज़रत मालिक बिन अनस कहते हैं कि हज़रत मुआज़ बिन जबल, अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के पास आए । रसूल (सल्ल०) ने उनसे पूछा—“मुआज़, तुम्हारी सुबह किस हाल में हुई?” उन्होंने कहा—“मैंने अल्लाह पर ईमान रखते हुए सुबह की।” रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया—“हर बात का एक आधार होता है और हर बात की वास्तविकता होती है। तो जो तुम कह रहे हो, उसका साक्ष्य क्या है?” उन्होंने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी कभी ऐसी सुबह नहीं हुई जिसमें मुझे यह ख़याल न आया हो कि शायद शाम तक मैं ज़िंदा न रहूँ। और कभी ऐसी शाम नहीं हुई जिसमें यह ख़याल न आया हो कि शायद मैं सुबह तक न पहुँचूँ। मैंने कभी कोई क़दम ऐसा नहीं उठाया जिसमें यह डर न रहा हो कि शायद अगला क़दम न उठा पाऊँ। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं घुटनों के बल गिरी हुई सारी क़ौमें देख रहा हूँ, जिन्हें उनके कर्म-पत्र (आमालनामे) की तरफ़ बुलाया जा रहा है और उनके साथ उनका नबी है। और उनके साथ वे मूर्तियाँ भी हैं जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे। और मुझे ऐसा मालूम होता है जैसे मैं जहन्नम वालों की सज़ा और जन्नत वालों का इनाम अपनी आँखों से देख रहा हूँ।” यह सुनकर रसूल (सल्ल०) ने कहा—“तुम मारिफ़त (सच्चे बोद्ध) तक पहुँच गए हो, अब उसी पर क़ायम रहो।” (हिल्यतुल औलिया व तबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 242)
क़ुरआन नसीहत के लिए है, न कि सिर्फ़
तिलावत के लिए
हज़रत आयशा (रज़ि०) को बताया गया कि कुछ लोग रात को क़ुरआन पढ़ते हैं और एक रात में पूरा क़ुरआन एक-दो बार ख़त्म कर डालते हैं। हज़रत आयशा ने कहा—“उन्होंने पढ़ा लेकिन असल में उन्होंने नहीं पढ़ा। मैं रातभर रसूल (सल्ल०) के साथ खड़ी रहती थी। आप सूरह बक़रा, सूरह आल-ए-इमरान और सूरह निसा पढ़ते। जब भी आप किसी ऐसी आयत से गुज़रते जिसमें अल्लाह से डर का ज़िक्र होता, तो आप अल्लाह से दुआ करते और उसकी पनाह माँगते। और जब भी ऐसी आयत आती जिसमें खुशख़बरी होती, तो आप अल्लाह से दुआ करते और उसे पाने की तमन्ना करते।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 24609)
दुनियावी तकलीफ़ों को सब्र के साथ सहने
से इंसान के गुनाह मिट जाते हैं।
हज़रत अबू बक्र ने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के सामने यह आयत पढ़ी: “जो व्यक्ति कोई बुराई करेगा, वह उसका बदला पाएगा।” और पूछा कि: अब हमारे लिए भलाई की क्या सूरत है? जो भी बुराई हमने की है, उसकी सज़ा तो हमें मिलेगी। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “ऐ अबू बकर, अल्लाह तुम्हें माफ़ करे, क्या तुम बीमार नहीं होते? क्या तुम्हें थकान नहीं होती? क्या तुम ग़मगीन नहीं होते? क्या तुम पर मुसीबत नहीं आती? क्या तुम्हें ठोकर नहीं लगती?” उन्होंने कहा: “हाँ, यह सब तो होता है।” आप ने फ़रमाया: “यह उन्ही गुनाहों का बदला है।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 68)
बड़ों को चाहिए कि वे छोटे या ग़रीब
लोगों के जनाज़े में भी शरीक हों
मदीना में एक काले रंग की पागल-सी औरत थी। वह मस्जिद की सफ़ाई किया करती थी। उसका निधन हो गया तो कुछ लोगों ने उसे दफ़ना दिया और रसूलुल्लाह (सल्ल०) को इसकी ख़बर न दी। जब आपको पता चला तो आपने फ़रमाया: “मुसलमानों में से किसी का भी निधन हो तो मुझे उसकी सूचना दिया करो।” और फिर बाद में आपने उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की। (अस्सुननुल कुबरा, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 6999)
