एक नया दौर
इतिहास का एक ज़माना बीसवी सदी के साथ ख़त्म हो गया है। इक्कीसवीं सदी एक नए ऐतिहासिक दौर की शुरुआत है। इसके अलावा हमारी क़िस्मत अच्छी है कि आज वे सारे अनुकूल हालात पूरी तरह मौजूद हैं, जो एक नए और बेहतर दौर को शुरू करने के लिए ज़रूरी हैं।
जब रात का अँधेरा ख़त्म होता है और नए दिन के सूरज निकलने के संकेत दिखते हैं, तो यह प्रकृति की तरफ़ से एक चुपचाप ऐलान होता है कि दिन और रात का एक चक्र पूरा हो गया है। अब इसका दूसरा चक्र शुरू होने वाला है। जो कोई चाहे, वह इसकी रोशनी में अपनी नई यात्रा शुरू कर सकता है और अपने मुक़ाम तक पहुँच सकता है।
सुबह के वक़्त सूरज का निकलना हर इंसान को दो चीज़ों के बीच में खड़ा कर देता है—एक वह मौक़ा, जो बीत चुका है और दूसरा वह मौक़ा, जो सामने मौजूद है। जो कोई भी इन मौक़ों का इस्तेमाल करेगा, वह यक़ीनन अपने मक़सद तक पहुँच जाएगा। हालाँकि इम्तिहान की इस दुनिया में मौक़े सिर्फ़ उन्हीं के लिए होते हैं, जो इन्हें भुनाते हैं। जो लोग मौक़ों का इस्तेमाल करने में नाकाम रहते हैं, उनके लिए कोई मौक़ा नहीं रह जाता। कामयाबी, दूसरे शब्दों में, मौजूद मौक़ों का इस्तेमाल करने का ही दूसरा नाम है।
कोई भी इंसान अपनी यात्रा बीते हुए कल में शुरू नहीं कर सकता। यात्रा चाहे कभी भी शुरू हो, वह ‘आज’ से ही शुरू होगी, बीते हुए ‘कल’ से नहीं। जो लोग आज के दिन भी कल में जीते हैं, उनके लिए इस दुनिया में बरबादी के सिवा और कुछ नहीं है।
जो मौक़े बीत चुके हैं, उन्हें भूल जाइए। जो मौक़े आज मौजूद हैं, उन्हें पहचानिए और उनका इस्तेमाल कीजिए। ईश्वर की कृपा से आप यक़ीनन कामयाब होंगे। याद रखिए कि बीता हुआ दिन कभी किसी के लिए वापस नहीं आता। बीता हुआ दिन आपके लिए भी वापस आने वाला नहीं है।
