एक व्यावहारिक समाधान
एक साइकोलॉजिस्ट ने कहा है—“जब किसी की ईगो को छेड़ा जाता है, तो वह एक सुपर ईगो बन जाता है और नतीजा ब्रेकडाउन होता है।”
अपने आख़िरी ज़माने में उमैर बिन हबीब बिन हम्माशा ने अपने पोते अबू जाफ़र को एक लंबी नसीहत दी। इस नसीहत का एक हिस्सा सब्र के बारे में था। इस सिलसिले में उन्होंने कहा—
“जो शख़्स किसी नादान के छोटे नुक़सान से राज़ी नहीं होगा, उसे उसी नादान के बड़े नुक़सान से राज़ी होना पड़ेगा।”
इन दोनों कथनों में अलग-अलग शब्दों के साथ एक ही बात कही गई है। वह यह है कि मौजूदा दुनिया में लोगों के नुक़सान से बचने की सिर्फ़ एक ही पक्की तरकीब है और वह यह कि ख़ुद को लोगों को नुक़सान पहुँचाने से दूर रखा जाए।
हर इंसान के अंदर जन्म से ही ‘ईगो’ मौजूद होता है। यह ईगो आम तौर पर सोया रहता है। इसके नुक़सान से ख़ुद को बचाने का सिर्फ़ यही तरीक़ा है कि इसे सोया ही रहने दिया जाए। अगर किसी कार्रवाई से इस ईगो को छेड़ दिया गया, तो यह साँप की तरह उठकर खड़ा हो जाएगा और फिर वह हर मुमकिन फ़साद मचाएगा, जो इसके बस में हो।
सामूहिक जीवन में बार-बार ऐसा होता है कि किसी नादान या उपद्रवी आदमी से आपको कोई नुक़सान पहुँच जाता है। ज़्यादातर हालात में इसका सबसे अच्छा हल यह होता है कि शुरुआती नुक़सान को बरदाश्त कर लिया जाए, क्योंकि अगर शुरुआती छोटे नुक़सान को बरदाश्त नहीं किया गया और उसका जवाब देने की कोशिश की गई, तो सामने वाला और भी ज़्यादा भड़क जाएगा। नतीजा यह होगा कि जिस आदमी ने एक कंकरी की चोट नहीं सही, उसे पत्थरों की बारिश सहने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा।
