बुराइयों से बचकर निकल जाने
का नाम तक़वा है।
अबू हुरैरा (रज़ि०) से पूछा गया—“तक़वा क्या है?” उन्होंने पूछने वाले से कहा—“क्या तुम कभी कांटेदार रास्ते से गुज़रे हो?” उसने कहा—हाँ। उन्होंने पूछा—“तब तुमने क्या किया?” पूछने वाले ने कहा—“जब मैंने कांटा देखा तो किनारे हो गया और उससे बचकर निकल गया।” अबू हुरैरा (रज़ि०) ने कहा—यही तक़वा है। (अज्ज़ूह्दुल कबीर, अल-बैहक़ी, असर संख्या, 963)
अपने आप को अल्लाह के हवाले करना और
लोगों के लिए भलाई चाहना
जरीर (रज़ि०) इस्लाम स्वीकार करने के लिए आए। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा—“ऐ जरीर, बैअत (वचन) के लिए हाथ बढ़ाओ।” उन्होंने कहा—“किस बात पर?” आप (सल्ल०) ने कहा—“अपने आप को अल्लाह के हवाले कर दो और हर मुसलमान की भलाई चाहो।” जरीर (रज़ि०) ने आप के हाथ पर बैअत की। वे बहुत समझदार व्यक्ति थे। जब बैअत करने लगे तो कहा—“या रसूलल्लाह, जितना मुझसे हो सकेगा।” इसके बाद यही उसूल सबके लिए तय हो गया—कि इंसान से उसकी सामर्थ्य के मुताबिक़ ही चाहा जाएगा। (अल-मोजम अल-कबीर, अल-तबरानी, हदीस संख्या 2365)
दुनिया का लालच इंसान को नष्ट कर देता है
अम्र बिन औफ़ अंसारी (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने अबू उबैदा बिन जर्राह (रज़ि०) को जज़िया (कर) लाने के लिए बहरीन भेजा। वे बहरीन से माल लेकर आए। जब अंसार (मदीना के लोगों) ने सुना कि अबू उबैदा (रज़ि०) आ गए हैं तो वे सुबह की नमाज़ में रसूलुल्लाह (सल्ल०) के साथ शामिल हुए। नमाज़ के बाद वे आपके सामने आए। आप (सल्ल०) उन्हें देखकर मुस्कुराए और कहा—“मुझे लगता है तुमने सुन लिया है कि अबू उबैदा बहरीन से कुछ लेकर आए हैं।” उन्होंने कहा—हाँ।
आप (सल्ल०) ने कहा—“ख़ुश हो जाओ और उम्मीद रखो। अल्लाह की क़सम, मुझे तुम्हारे फ़क़्र (ग़रीबी) का डर नहीं है। मुझे डर है कि तुम्हारे सामने दुनिया उसी तरह फैला दी जाएगी जैसे तुमसे पहले वालों के सामने फैलाई गई थी। फिर तुम भी उसमें लालच करोगे जैसे उन्होंने किया था। और जिस तरह वह लालच उन्हें बरबाद कर गया, उसी तरह वह तुम्हें भी हलाक कर देगा।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4015)
सबसे ज़्यादा बुद्धिमान, सबसे ज़्यादा कमज़ोर
हसन बिन अली (रज़ि०) जब मुआविया (रज़ि०) के हक़ में खिलाफ़त से हट गए, तो उन्होंने कूफ़ा की मस्जिद में ख़ुत्बा (भाषण) दिया और वजह बताते हुए कहा—“मुत्तक़ी (अल्लाह से डरने वाला) सबसे ज़्यादा बुद्धिमान है, और गुनाहगार सबसे ज़्यादा कमज़ोर ।” (अल-मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, असर संख्या 32729)
रिश्तेदारों का पक्ष नहीं लेना
अब्दुल्लाह बिन अरक़म, उमर (रज़ि०) के पास आए और कहा—“ऐ अमीरुल मोमिनीन! बैतुल माल में जलुला (ईरान) से आए हुए कुछ गहने और चाँदी के बर्तन हैं। आप उन्हें देख लीजिए और हमें उनके बारे में हुक्म दीजिए।” उमर (रज़ि०) ने कहा—“जब मुझे फ़ारिग़ (खाली) देखना तो बता देना।” फिर एक दिन वे आए और कहा—“आज आप फ़ारिग़ हैं।” आप (रज़ि०) ने कहा—“हाँ।” फिर आप बैतुल माल गए और गहनों और बर्तनों को निकलवाया। उन्हें देखकर आपने सूरह आले-इमरान की आयत 14 पढ़ी और दुआ की—“हे अल्लाह! हमसे यह नहीं हो सकता कि तूने जो चीजें हमारे लिए सजाई हैं उन्हें देखकर ख़ुश न हों। अल्लाह! हमें यह ताक़त दे कि हम उसे हक़ (सही जगह) में खर्च करें और इसके बुरे असर से तेरी पनाह चाहते हैं।” उसी समय उमर (रज़ि०) का एक बेटा आया और कहा—“अब्बा जान, मुझे एक अंगूठी दे दीजिए।” उमर (रज़ि०) ने कहा—“अपनी माँ के पास जाओ, वह तुम्हें सत्तू पिलाएगी।” और उन्होंने बेटे को कुछ नहीं दिया। (तारीख़ुल मदीनह, इब्न शब्बा, खंड 2, पृष्ठ 699)
दूसरों से पहले अपनी फ़िक्र करो
क़ासिम कहते हैं—एक व्यक्ति ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) से कहा—“मुझे नसीहत कीजिए।” उन्होंने कहा—“अपने घर में रहो, अपनी ज़बान रोके रखो और अपनी ग़लतियों को याद करके रोया करो।” (हिल्यतुल-औलिया व तुबक़ातुल-अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 135)
हैसियत से फायदा न उठाना
मालिक बिन औस बिन हदसान बताते हैं—रोम के बादशाह का एक क़ासिद (दूत) उमर (रज़ि०) के पास आया। उमर (रज़ि०) की पत्नी ने उससे एक दीनार उधार लिया, इत्र खरीदा और शीशे की बोतलों में भरकर उस क़ासिद के ज़रिए रोम की मलिका के पास भेज दिया। जब मलिका ने वह इत्र पाया तो बोतलें खाली कीं और उन्हें जवाहरात से भरकर क़ासिद से कहा—“इन्हें उमर की पत्नी के पास ले जाओ।” जब वह जवाहरात उमर (रज़ि०) के घर पहुँचे, तो उनकी पत्नी ने सब बिस्तर पर रख दिए । उमर (रज़ि०) घर आए और पूछा—“यह क्या है?” पत्नी ने पूरा हाल सुनाया। उमर (रज़ि०) ने वह जवाहरात लिए, सारे बेच डाले और उन पैसों में से एक दीनार अपनी पत्नी को दिया और बाक़ी सब बैतुल माल में जमा कर दिया। (अल-मुजालसा व जवाहिरुल इल्म, खंड 2, पृष्ठ 83)
शिकायत के वक़्त हक़ पर क़ायम रहना
उमर (रज़ि०) ने कहा—“जो व्यक्ति तुम्हारे मामले में अल्लाह की नाफ़रमानी करे, तुम उसके मामले में अल्लाह की आज्ञा का पालन करो। यही उसका सबसे अच्छा बदला है।” (अल-बिदाया वन्निहाया, खंड 12, पृष्ठ 83)
इंसान से कुछ न माँगना
सौबान (रज़ि०) कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने फरमाया: “कौन मेरी ओर से यह ज़िम्मेदारी लेता है कि वह लोगों से कुछ नहीं माँगेगा, और मैं उसके लिए जन्नत की ज़िम्मेदारी लेता हूँ?” सौबान (रज़ि०) ने कहा—“मैं”। इसलिए उसके बाद वे किसी से कोई चीज़ नहीं माँगते थे। (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 1643)
हालात ही इंसान की भावनाओं को जन्म देते हैं
अबू उमामा कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया: “मेरे पास अल्लाह का फ़रिश्ता आया और उसने कहा—ऐ मुहम्मद! अल्लाह ने आपको सलाम कहा है और फ़रमाया है कि यदि आप चाहें तो मक्का की पत्थरीली ज़मीन को सोने से बदल दिया जाए।” आप (सल्ल०) ने आसमान की ओर सिर उठाया और कहा: “नहीं, ऐ मेरे रब! बल्कि मुझे यह पसंद है कि एक दिन मैं पेट भर कर खाऊँ और एक दिन भूखा रहूँ। जब भूखा रहूँ तो तेरे आगे गिड़गिड़ाऊं और तुझसे मांगूँ और जब पेट भरे तो तेरा शुक्र अदा करूँ और तेरी तारीफ़ करूँ।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 22190)
दिल का सख़्त हो जाना सबसे बड़ी सज़ा है
मालिक बिन दीनार ने कहा—“दिल का सख़्त हो जाना किसी इंसान के लिए सबसे बड़ी सज़ा है।” (तफ़्सीर अल-क़ुर्तुब़ी, खंड 15, पृष्ठ 248)
नाराज़ होने पर भी किसी की बर्बादी न चाहो
हज़रत उमर (रज़ि०) ने फरमाया: “किसी के साथ मोहब्बत में दीवाने मत बनो और दुश्मनी के समय उसे तकलीफ़ पहुँचाने का प्रयास न करो।” रावी कहते हैं कि मैंने पूछा, “कैसे?” आपने कहा: “इस तरह कि जब तुम मोहब्बत करो तो बच्चों की तरह मुहब्बत करो, और जब किसी से नाराज़ हो तो उसकी तबाही और बर्बादी मत चाहो।” (अल-अदबुल-मुफ्रद, खण्ड 1, पृष्ठ 448)
माँगकर मिलने वाली चीज़ और अपने-आप मिलने वाली चीज़ में फ़र्क़ होता है।
अता बिन यसार कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उमर (रज़ि०) को एक तोहफ़ा भेजा। उमर (रज़ि०) ने उसे वापस कर दिया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे पूछा: “तुमने इसे क्यों लौटाया?” उन्होंने कहा: “ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आपने हमें नहीं बताया कि हमारी भलाई इसी में है कि हम किसी से कोई चीज़ न लें।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “यह बात मैंने माँगने के बारे में कही थी। लेकिन जो चीज़ बिना माँगे आ जाए, वह तो वही रोज़ी है जो अल्लाह ने तुम्हें दी है।” उमर (रज़ि०) ने कहा: “उस ख़ुदा की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, अब मैं किसी चीज़ के लिए किसी से सवाल नहीं करूँगा। लेकिन जो चीज़ बिना माँगे मेरे पास आएगी, उसे ज़रूर लूँगा।” (मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस संख्या 9)
शोहरत (प्रसिद्धि) से दूर रहना
साद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि०) बाद के समय में बकरियाँ चराने लगे थे। वे मदीना से दूर एक मैदान में बकरियाँ चरा रहे थे। एक दिन उनका बेटा उमर बिन साद घोड़े पर सवार होकर उनके पास आया और बोला: “क्या आपको यह अच्छा लगता है कि आप भेड़-बकरियों में लगे रहें, जबकि लोग मदीना में हुकूमत और राजनीति के मामलों पर चर्चा कर रहे हैं?” साद (रज़ि०) ने अपने बेटे के सीने पर हाथ मारा और कहा: “चुप रहो! मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते हुए सुना है कि अल्लाह उस बंदे को पसंद करता है जो परहेज़गार हो, बेनियाज़ (आत्मनिर्भर) हो और गुमनाम रहता हो।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2965)
इल्म नाम है अल्लाह से डरने का
इब्न मसऊद (रज़ि०) ने कहा: “ज्ञान बहुत सारी रिवायतें (कहानियाँ या घटनाएँ) बयान करने का नाम नहीं है। ज्ञान तो यह है कि आदमी अल्लाह से डरने लगे।” (जामि बयानुल-इल्म व फज़्लिह, खण्ड 1, पृष्ठ 758)
आख़िरत की चिंता ने उन्हें दीवाना
बना दिया था
हसन बसरी ताबिई ने बड़ी संख्या में रसूलुल्लाह (सल्ल०) के सहाबा को देखा था। उन्होंने अपने समय के लोगों से कहा: मैंने बद्र की लड़ाई में शामिल सत्तर सहाबा को देखा है। उनका पहनावा ज़्यादातर ऊन का होता था। अगर तुम उन्हें देखते, तो शायद कहते कि ये सीधेसादे लोग हैं। और अगर वे तुम्हारे अच्छे लोगों को देखते, तो कहते—‘इनका धर्म में कोई हिस्सा नहीं।’ और अगर वे तुम्हारे बुरे लोगों को देखते, तो कहते—‘ये लोग हिसाब के दिन पर ईमान ही नहीं रखते।’
मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिनके लिए यह दुनिया पैरों की मिट्टी से भी अधिक बेकार और बिना कीमत की थी।” (हिल्यतुल-औलिया व तुबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 1, पृष्ठ 134)
सबसे बुरी चीज़: आत्ममोह
हज़रत अबू हुरैरा कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “तीन चीज़ें बचाने वाली हैं और तीन चीज़ें बर्बाद करने वाली। बचाने वाली: छुपकर और खुले में अल्लाह का डर रखना, ख़ुशी और नाराज़गी दोनों में सच कहना, अमीरी और ग़रीबी दोनों स्थिति में संतुलन रखना।
बर्बाद करने वाली चीजें हैं: इच्छाओं के पीछे चलना, कंजूसी करना, और अपने आप पर घमंड करना। और यह आख़िरी चीज़ सबसे बुरी है।” (हिल्यतुल-औलिया व तुबक़ातुल अस्फिया, खण्ड 2, पृष्ठ 343)
कमज़ोरों के मामले में अल्लाह से डरना
जंग-ए-बद्र (624 ई.) में जिन 70 लोगों को पकड़कर मदीना लाया गया, उनमें से एक सुहैल बिन अम्र थे। नबी (सल्ल०) से कहा गया: “सुहैल बहुत अच्छा बोलने वाला है, आपके खिलाफ़ भाषण करता रहता है। उसके दाँत तुड़वा दीजिए।” नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “अगर मैं उसके दाँत तुड़वाऊँ तो अल्लाह मेरे दाँत तोड़ देगा, चाहे मैं रसूल ही क्यों न हूँ।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने क़ैदियों को अलग-अलग सहाबा के घरों में बाँट दिया और हिदायत दी: “क़ैदियों के साथ अच्छा सुलूक करो।” उनमें से एक क़ैदी अबू अज़ीज़ कहते हैं: “जिन अंसारी के घर में मैं था, वे सुबह-शाम मुझे रोटी खिलाते और ख़ुद सिर्फ़ खजूरें खाकर रह जाते।” इसी तरह यमामा के सरदार सुमामा बिन उसाल जब क़ैद हुए, तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) के हुक्म से उन्हें कैद में अच्छा खाना और दूध दिया जाता रहा। (अल-मोजम अल-कबीर अल-तबरानी, हदीस संख्या 977)
सच्चे ईमान वाला हमेशा याद रखता है
कि उसकी आखिरी मंज़िल क़ब्र है
हज़रत उरवा बताते हैं कि हज़रत उमर (रज़ि०) एक दिन हज़रत अबू उबैदा (रज़ि०) के पास गए। आपने देखा कि वे ऊँट की काठी के टाट पर लेटे हुए हैं और एक गठरी को तकिया बनाया हुआ है। हज़रत उमर (रज़ि०) ने कहा—“तुमने वह नहीं किया जो तुम्हारे साथियों ने किया है।” हज़रत अबू उबैदा (रज़ि०) ने कहा—“ऐ अमीरुल मोमिनीन! यह मेरी आरामगाह (क़ब्र) तक पहुँचाने के लिए काफ़ी है।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 101)
आख़िरत की सज़ा का एहसास इंसान
को हर चीज़ से मोह-मुक्त कर देता है
हज़रत अबू दरदा (रज़ि०) इस्लाम से पहले व्यापार करते थे। इस्लाम के बाद उनका व्यापार छूट गया। इब्न असाकिर की एक रिवायत के मुताबिक उन्होंने कहा—“उस हस्ती की क़सम जिसके कब्ज़े में अबू दरदा की जान है, आज मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि मस्जिद के दरवाज़े पर मेरी एक दुकान हो और मेरी कोई जमात की नमाज़ न छूटे, मैं रोज़ाना चालीस दीनार मुनाफ़ा कमाऊँ और सबका सब अल्लाह के रास्ते में दे दूँ।” उनसे पूछा गया—“ऐ अबू दरदा! किस चीज़ ने आप के लिए इसको नापसंद कर दिया?” उन्होंने जवाब दिया—“हिसाब-किताब की सख़्ती।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 209)
आदमी बड़े-बड़े इंतज़ाम करता रहता है, जबकि उसकी ज़िंदगी थोड़े समय में ही खत्म होने वाली है
अबू नुऐम कहते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) ने जब अपना घर बनाया तो उन्होंने हज़रत अम्मार बिन यासिर (रज़ि०) से कहा—“आओ देखो मैंने क्या बनाया है।” अम्मार (रज़ि०) गए और उनका मकान देखा। फिर कहा—“तुम दूर की उम्मीद कर रहे हो, जबकि जल्द ही मर जाओगे।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 10256)
आख़िरत से पहले दुनिया में बदला
अबू फरात कहते हैं कि हज़रत उस्मान (रज़ि०) का एक ग़ुलाम था। एक दिन आपने अपने ग़ुलाम से कहा—“मैंने तुम्हारा कान मरोड़ दिया था, तुम मुझसे उसका बदला ले लो।” उसने आपका कान पकड़ा। आपने कहा—“ज़ोर से पकड़ो!” फिर कहा—“कितना अच्छा है कि बदला दुनिया में हो जाए और आख़िरत के लिए न रहे।” (तारीख़ वासित, खण्ड 1, पृष्ठ 184)
मौत के क़रीब पहुँच कर
हज़रत बिलाल बिन रबाह (रज़ि०) के निधन का समय आया तो उनके घर के लोग इकट्ठा हुए और कहा—“हाय ग़म!” तो हज़रत बिलाल ने जवाब दिया—“हाय खुशी! कल मैं अपने प्यारे दोस्तों से मिलूँगा—मुहम्मद और उनके साथियों से।” (शज़रातुज़ ज़हब, खण्ड 1, पृष्ठ 171)
दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रज़ि०) का आख़िरी समय आया तो आपकी ज़बान से निकला—“अगर मैं बराबरी पर छूट जाऊँ, न सज़ा मिले और न इनाम, तो यक़ीनन मैं सफल रहा।” (तारीख़ अत्तबरी, खण्ड 4, पृष्ठ 228)
सबसे ज़्यादा फ़िक्र जहन्नम के
अज़ाब से बचने की
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की पत्नी उम्मे हबीबा ने एक दिन दुआ की: “ऐ ख़ुदा! मेरे पति रसूल अल्लाह, मेरे पिता अबू सुफियान और मेरे भाई मुआविया की उम्र लंबी कर।”
यह सुनकर आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: उम्मे हबीबा! सबकी उम्रें अल्लाह ने पहले से ही तय कर दी हैं। तुम्हें तो यह दुआ करनी चाहिए थी कि अल्लाह तुम्हें जहन्नम की सज़ा से बचाए। (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 2663)
ईमान वाले की असली खुशी—
उसकी औलाद का नेक होना
मिक़दाद (रज़ि.) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़माने में अक्सर ऐसा होता था कि एक ही घर में कोई इस्लाम को मानने वाला होता और कोई उसे न मानने वाला। एक मुसलमान अपने पिता, बेटे या भाई को बिना ईमान के देखता, और यह उसके लिए बहुत बड़ी तकलीफ़ होती। क्योंकि अल्लाह ने उसके दिल को ईमान के लिए खोल दिया होता, और उसे पूरा यक़ीन रहता कि अगर यह रिश्तेदार इसी हालत में मर गया तो बर्बाद हो जाएगा और आग की सज़ा पाएगा। यही वजह थी कि अपने इतने क़रीबी लोगों को देखकर भी उसके दिल को सुकून नहीं मिलता था। (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 23810)
इन्हीं हालतों के बारे में अल्लाह ने कुरआन में दुआ सिखाई है:
“ऐ हमारे रब! हमारी पत्नियों और हमारी औलाद को हमारे लिए आंखों की ठंडक बना दे, और हमें परहेज़गारों का सरदार (इमाम) बना।” (25:74)
जन्नत पाने की चाह
बशीर असलमी (रज़ि०) कहते हैं कि मक्का के मुसलमान जब मदीना हिजरत करके आए तो यहाँ का पानी उन्हें अच्छा नहीं लगा। बनी ग़िफ़ार क़बीले के एक आदमी के पास एक कुआँ था जिसे “बिरे रूमह” कहते थे। मुहाजिरीन को उसका पानी अच्छा लगता था। लेकिन उसका मालिक एक मश्क पानी एक “मुद्द” (साअ का चौथा हिस्सा) के बदले बेचता था। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उस आदमी से कहा: “यह कुआँ मुझे जन्नत के एक सोते के बदले बेच दो।”
उसने जवाब दिया: “मेरे और मेरे घरवालों के पास इसके अलावा कोई सहारा नहीं है, मैं इसे ऐसे नहीं दे सकता।” यह ख़बर उस्मान (रज़ि०) को मिली। उन्होंने बिरे रूमह को 35 हज़ार दिरहम देकर खरीद लिया। फिर रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आकर कहा: “अल्लाह के रसूल! क्या इस कुएं के बदले मेरे लिए भी जन्नत का सोता मिलेगा?” आप (सल्ल०) ने फ़रमाया: “हाँ।” इसके बाद उस्मान (रज़ि०) ने यह कुआँ आम मुसलमानों के लिए दान कर दिया। (अल-मोजम अल-कबीर, अत्तबरानी, हदीस संख्या 1226)
एक के लिए बरकत, दूसरे के लिए बोझ
सईद बिन मुसय्यब कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने हकीम बिन हिज़ाम (रज़ि०) को ग़ज़वा-ए-हुनैन के बाद कुछ इनाम दिया। हज़रत हकीम को वह कम लगा। आपने दोबारा दिया। उन्होंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपके दिए हुए में कौन सा बेहतर था? आपने कहा: पहला। फिर आपने कहा:
“ऐ हकीम बिन हिज़ाम! यह माल हरा-भरा और मीठा है। जिसने इसे खुले दिल से और अच्छे तरीके से लिया, उसके लिए इसमें बरकत दी जाएगी। और जिसने इसे लालच से और बुरे तरीक़े से लिया, उसके लिए इसमें बरकत नहीं होगी। और वह उस आदमी की तरह होगा जो खाता है मगर कभी पेट नहीं भरता। और देने वाला हाथ लेने वाले हाथ से बेहतर है।” उन्होंने पूछा: “ख़ुद आपसे लेना भी” आपने (सल्ल०) कहा: “हाँ, मुझसे भी।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 3078)
दुनिया में दिखावा, आखिरत में शर्मिंदगी
अबू मिजलज़ कहते हैं कि हज़रत मुआविया बाहर निकले और एक जगह पहुँचे जहाँ अब्दुल्लाह बिन आमिर (रज़ि०) और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ि०) बैठे थे। हज़रत मुआविया को देखकर अब्दुल्लाह बिन आमिर खड़े हो गए और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर बैठे रहे। हज़रत मुआविया ने कहा: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया है: “जिस इंसान को यह अच्छा लगे कि अल्लाह के बंदे उसके लिए खड़े रहें, तो वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 16845)
आखिरत के लिए दुनिया छोड़ना
अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला कहते हैं कि हज़रत उमर (रज़ि०) के पास इराक़ से कुछ लोग आए। खाने का समय हुआ तो आपने उनके सामने एक बड़ा प्याला रखा, जिसमें मोटे आटे की रोटी और ज़ैतून का तेल था। आपने कहा: खाओ। उन्होंने धीरे-धीरे बहुत कम खाना शुरू किया। हज़रत उमर ने कहा: “ऐ इराक़ वालो! जो कुछ तुम कर रहे हो, मैं देख रहा हूँ। सुनो! अगर मैं चाहूँ तो मेरे लिए भी अच्छा और मुलायम खाना तैयार हो सकता है, जैसा तुम्हारे लिए होता है। लेकिन हम अपनी दुनिया में इसे छोड़ देते हैं ताकि उसे आखिरत में पा सकें। क्या तुमने नहीं सुना कि अल्लाह ने एक क़ौम से कहा था: ‘तुम अपनी अच्छी चीज़ें दुनिया की ज़िंदगी में ही ख़त्म कर चुके।’” (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 305612)
एक और रिवायत में है कि आपने कहा: “तुम लोग क्या चाहते हो? मीठा और नमकीन, गर्म और ठंडा? जो भी खाओगे, पेट में जाकर कचरा ही बनेगा।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 49)
दुनिया के मामलों में बेनफ़्सी (निस्वार्थता)
ज़ुह्द (त्याग) यह नहीं है कि तुम ह़लाल चीज़ों को हराम कर लो, या धन को बरबाद करो। बल्कि असली त्याग यह है कि तुम्हें अपने पास मौजूद वस्तुओं से ज़्यादा भरोसा उस पर हो जो अल्लाह के पास है। और मुसीबत आने पर तुम्हारा हाल वही हो जैसा मुसीबत से पहले होता है। और सत्य के मामले में तुम्हारे लिए प्रशंसा करने वाला और निंदा करने वाला—दोनों समान हो जाएँ। (शुअबुल ईमान, असर संख्या 10774)
ख़ुदा को हमारे दिल की तड़प चाहिए
अब्दुल्लाह बिन जुदआन एक बहुदेववादी लेकिन नेकदिल अरब था। वह पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) के पैग़म्बरी मिलने से पहले मर गया। उसने अज्ञानता के ज़माने में बहुत से ऐसे काम किए जो आम तौर पर अच्छे काम माने जाते थे। पैग़म्बर (सल्ल०) से उसके बारे में पूछा गया कि क्या उसे इन कामों का बदला मिलेगा। आपने फ़रमाया—उसकी ज़बान से कभी यह नहीं निकला: “ऐ अल्लाह, आखिरत में मेरे गुनाह माफ़ कर दे।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 518)
इससे साफ़ होता है कि अल्लाह अपने बंदों से असल में यही चाहता है कि उनके भीतर विनम्रता और असहायता की भावना हो। वे गहराई से महसूस करें कि सब कुछ केवल अल्लाह का है। वही देगा तो मिलेगा, अगर वह न दे तो कुछ भी नहीं मिल सकता। इस सच्चाई को अपने भीतर उतार लेने का नाम ईमान है। जो इस स्तर तक न पहुँचा उसकी पूरी ज़िंदगी बेकार है—यहां तक कि उसके अच्छे दिखने वाले काम भी।
अल्लाह के यहाँ वही काम क़बूल होता है जो केवल उसी की खातिर किया गया हो। सिर्फ़ मानवीय हमदर्दी या सेवा-भाव से किया गया काम अल्लाह को पसंद नहीं, क्योंकि वह इंसान की अपनी बड़ाई की तृप्ति के लिए होता है—जबकि इस दुनिया में बड़ाई का हक़ केवल अल्लाह को है।
किसी मामले में कमी चाहिए और
किसी मामले में बढ़ोतरी
पैग़म्बर (सल्ल०) ने फ़रमाया—भाग्यशाली है वह व्यक्ति जिसने अपनी ज़बान को ज़्यादा बोलने से रोका और अपने ज़्यादा धन को खर्च किया और अपने इल्म के मुताबिक अमल किया। (शुअबुल ईमान, असर संख्या 3116)
दुनियावी स्वार्थ रुकावट बन जाते हैं
नजरान (यमन) का ईसाई प्रतिनिधि-दल हिजरत के दसवें साल मदीना आया। उसके लंबे किस्से में यह घटना बयान हुई है कि मदीना से लौटते समय उनका बड़ा पादरी अबू हारिसा बिन अलक़मा एक खच्चर पर सवार था। खच्चर ने एक जगह ठोकर खाई और पादरी ज़मीन पर गिर पड़ा। पादरी का भाई कुरज़िन अलक़मा जो साथ था, उसके मुँह से निकला—“ तेइसल अबअद” (यानी “मुहम्मद का बुरा हो”)। पादरी ने तुरंत कहा—“तइसत उम्मक” (तेरी माँ का बुरा हो)। कुर्ज़ बिन अल्क़मः हैरानी से बोला—आपने ऐसा क्यों कहा?
पादरी ने जवाब दिया—“खुदा की क़सम, हम अच्छी तरह जानते हैं कि यह वही इंतज़ार किए हुए नबी हैं जिनकी खुशखबरी हमारी किताबों में दी गई है।” यह सुनकर कुर्ज़ बिन अलक़मा ने कहा—फिर आप लोग उनकी पैग़म्बरी का इकरार क्यों नहीं करते? पादरी ने कहा—
“क्योंकि ये राजा हमें बहुत सा धन देते हैं और हमारी इज़्ज़त करते हैं। अगर हम मुहम्मद की नबूवत मान लेंगे तो ये सारी चीज़ें हमसे छीन लेंगे।” (अल-तफ़सीर अल-कबीर, खण्ड 7, पृष्ठ 128)
कर्तव्य से ज़्यादा कोशिश करना
रसूलुल्लाह (सल्ल०) अपने साथियों के साथ बद्र के लिए निकले। रोहा पहुँचकर आपने पड़ाव डाला और लोगों के सामने ख़ुत्बा दिया। आपने पूछा—“तुम्हारी क्या राय है?”
पहले हज़रत अबू बक्र ने उत्तर दिया, मगर आपने ध्यान नहीं दिया। फिर दोबारा पूछा—“तुम्हारी क्या राय है?” इस बार हज़रत उमर उठे, मगर आपने ध्यान नहीं दिया। फिर आपने तीसरी बार पूछा—“तुम्हारी क्या राय है?” अब सअद बिन मुआज़ अंसारी उठे। उन्होंने कहा—“खुदा की क़सम, शायद आपका इशारा हमारी तरफ है ऐ अल्लाह के रसूल।” आपने फ़रमाया—“हाँ”।
असल में, अंसार ने आपसे बैअत-ए-निसा की थी, जिसका मतलब था कि वे मदीना में आपकी रक्षा करेंगे। मगर बाहर (बद्र में) दुश्मनों से लड़ना इस बैअत में शामिल नहीं था। इसलिए उनसे राय लेना ज़रूरी था। मिक़दाद बिन अम्र ने कहा—“हम उस तरह नहीं कहेंगे जिस तरह मूसा की क़ौम ने मूसा से कहा था कि तुम और तुम्हारा रब जाकर लड़ो, हम तो यहाँ बैठे रहेंगे।” (क़ुरआन, 5:24)
सअद बिन मुआज़ ने कहा—“हम आपसे वादा कर चुके हैं कि हम आपकी सुनेंगे और आपकी आज्ञा का पालन करेंगे। ऐ अल्लाह के रसूल, चलिए—आप जो भी इरादा करें हम आपके साथ हैं। उस ख़ुदा की क़सम जिसने आपको हक़ देकर भेजा है, अगर आप हमें हुक्म दें कि हम अपनी सवारियों को समुद्र में उतार दें तो हम उन्हें उतार देंगे। अगर आप कहें कि हम अपनी ऊँटनियों को बरक गिमाद (यमन) तक ले जाते हुए उनका कलेजा छलनी कर दें तो हम ऐसा भी करेंगे। हममें से एक आदमी भी पीछे न रहेगा।” रावी कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) अंसार की इस तक़रीर से बहुत प्रसन्न हुए और फ़रमाया—“चलो, अल्लाह ने तुम्हारे लिए जीत और मदद का फ़ैसला कर दिया है।” (अल-मुस्तदरक, अल-हाकिम, हदीस संख्या 5486)
ज़िन्दगी उसी की है जो मौत से निडर हो जाए
ख़लीफ़ा-ए-अव्वल हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) ने एक बार इस्लामी सेनापति हज़रत ख़ालिद बिन वलीद को नसीहत करते हुए कहा—“ऐ ख़ालिद, मौत के चाहने वाले बन जाओ, तुम्हें ज़िन्दगी मिल जाएगी।” (अल-मुजालसा व जवाहिरुल इल्म, खण्ड 3, पृष्ठ 61)
दीन वही है जो आदमी के भीतर गहरी
तब्दीली पैदा करे
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मुझसे फ़रमाया—“ऐ अबू हुरैरा, अल्लाह से डरने वाले बनो—तुम सबसे बड़े इबादत करने वाले बन जाओगे। संतुष्ट रहो—तुम सबसे बड़े शुक्र करने वाले बन जाओगे। और लोगों के लिए वही पसंद करो जो तुम अपने लिए पसंद करते हो—तुम सच्चे ईमान वाले बन जाओगे। अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करो—तुम सच्चे मुसलमान बन जाओगे। और हँसना कम करो, क्योंकि ज़्यादा हँसना दिल को मुर्दा कर देता है।” (सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 4217)
तौबा नाम है अपने किए पर पछताने का
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—“तौबा शर्मिंदगी है” यानी तौबा ये है कि आदमी को अपने किए पर शर्म और पछतावा हो।” (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, हदीस संख्या 27751)
