दो सौ साल
1782 में एक अंग्रेज़ एडिनबर्ग से ग्लास्गो आया। उसके पास दो सौ पाउंड और एक लकड़ी का प्रेस था। इसी का इस्तेमाल करके उसने एक अख़बार शुरू किया। शुरुआत में इसका नाम था—‘ग्लास्गो एडवरटाइज़र’। यह वही अख़बार है, जो आज ‘ग्लास्गो हेराल्ड’ के नाम से मशहूर है और इसकी रोज़ाना चार लाख प्रतियाँ बिकती हैं। इसकी शुरुआत को अब दो सौ साल हो गए हैं।
इसके संस्थापक जॉन मेनंस को हर तरह की मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। हालाँकि एक आलोचक के शब्दों में, एक चीज़ उनमें बहुतायत में थी, वह था उनका असीम उत्साह। यह असीम उत्साह उनकी हर कमी का विकल्प बन गया। उन्होंने एक ऐसे अख़बार की नींव रखी, जो लगातार दो सौ सालों से चल रहा है। बीच में साझेदारों के बीच गंभीर मतभेद भी पैदा हुए, लेकिन उन्हें समझदारी और धैर्य से सुलझा लिया गया।
जो अख़बार दो सौ साल पहले लकड़ी के प्रेस पर हाथ से छापा जाता था, अब वह पूरी तरह से स्वचालित मशीनों से बनता है। इसमें अक्षरों को न तो जोड़ा जाता है और न ही ढाला जाता है, बल्कि उन्हें लेज़र किरणों की मदद से प्लेट पर प्रोजेक्ट किया जाता है। अख़बार अपने आप छप जाता है और बाहर आ जाता है। वह अपने आप फोल्ड हो जाता है। उसके बाद बंडल बनाए जाते हैं। बंडलों के चारों तरफ़ पॉलिथीन लपेटी जाती है और फिर उन्हें डिस्पैच डिपार्टमेंट भेज दिया जाता है। यह सारा काम कंप्यूटरों के ज़रिए होता है।
(टाइम्स ऑफ़ इंडिया; 22 जनवरी, 1984)
चूँकि ऊपर बताया गया अंग्रेज़ी अख़बार लगातार दो सौ सालों से चल रहा है, इसलिए इस दौरान हुई प्रिंटिंग और प्रकाशन की सारी तरक़्क़ी इसके इतिहास का हिस्सा बन पाई। वे सब इसकी प्रगति के लिए ज़रिया बनती गईं। अगर कल्पना करें, यह शुरुआती 25 या 50 सालों में बंद हो गया होता, तो भले ही दुनिया में हर तरह की तरक़्क़ी होती, लेकिन वह अख़बार उस तरक़्क़ी में शामिल होने के लिए मौजूद नहीं होता।
आज की दुनिया में कोई भी काम ‘दो दिन’ में पूरा नहीं होता। इसे करने के लिए ‘दो सौ साल’ लगते हैं। हालाँकि दो सौ साल की योजना को पूरा करने के लिए दो चीज़ों की ज़रूरत होती है—काम करने का जज़्बा और लगातार कोशिश। इन दो चीज़ों के बिना यहाँ कोई बड़ी तरक़्क़ी मुमकिन नहीं है।
