ख़ुदा की इबादत करना और लोगों
को तकलीफ़ न देना
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) कहते हैं: मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा —“ऐ अल्लाह के रसूल! कौन सा काम सबसे अच्छा है?” आपने फ़रमाया— “नमाज़ को वक़्त पर पढ़ना।” मैंने फिर पूछा—“उसके बाद कौन सा काम सबसे अच्छा है?” आपने फ़रमाया—“ये कि लोग तुम्हारी ज़बान से सुरक्षित रहें।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 9802)
अल्लाह को पहचानना सबसे बड़ी इबादत है
अनस बिन मालिक (रज़ि०) बयान करते हैं कि एक आदमी रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया और उसने पूछा, “अल्लाह के रसूल! सबसे बेहतरीन अमल कौन-सा है?”
आपने फ़रमाया, “अल्लाह को जानना।” उसने फिर वही सवाल दोहराया।
आपने कहा, “अल्लाह की मारिफ़त हासिल करना।” इस पर उस आदमी ने कहा, “मैं अमल के बारे में पूछ रहा हूँ और आप इल्म की बात कर रहे हैं।” तब रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया—
“इल्म के साथ किया गया थोड़ा-सा अमल भी फ़ायदेमंद होता है, लेकिन बिना इल्म के किया गया ज़्यादा अमल भी कोई लाभ नहीं देता।” (जामे बयानुल-इल्म व फ़ज़्लिहि, खण्ड 1, पृष्ठ 202)
दीन (धर्म) में असल अहमियत
अच्छे किरदार की है
तबरानी ने अब्दुर्रहमान बिन हारिस बिन अबी मिर्दास सुलमी से रिवायत की है: वो कहते हैं—हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास बैठे थे। आपने वुज़ू के लिए पानी मंगवाया, उसमें हाथ डाला और वुज़ू किया। हमने उस पानी को लिया और पी लिया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने पूछा—“तुम्हें ये करने पर किसने तैयार किया?” हमने कहा—“अल्लाह और उसके रसूल की मोहब्बत।” आपने फ़रमाया—“अगर तुम चाहते हो कि अल्लाह और उसका रसूल तुमसे मोहब्बत करें, तो जब तुम्हें अमानत दी जाए, उसे पूरा करो। जब बात करो, तो सच्चाई से बोलो। और अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव करो।” (अल-मोजम अल-अवसत, हदीस संख्या 6517)
रिवाजी नहीं, सजग और बौद्धिक इबादत चाहिए
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “इन्सान नमाज़ पढ़ता है, रोज़ा रखता है, ज़कात देता है, हज और उमरा करता है—यहाँ तक कि उसने सब अच्छे काम कर लिये। लेकिन क़ियामत के दिन उसे इन सब का इनाम उसकी अक़्ल के हिसाब से ही मिलेगा।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 4316)
सबसे श्रेष्ठ अमल है—अल्लाह की
याद दिल में समाई हो
सालिम बिन अबी जअद कहते हैं कि अबू दरदा (रज़ि०) से किसी ने कहा: “अबू सअद बिन मुनब्बेह ने सौ ग़ुलाम आज़ाद किये हैं।” अबू दरदा ने कहा: “ये सचमुच बड़ी बात है कि कोई अपने पैसे से सौ ग़ुलामों को आज़ाद करे। लेकिन अगर चाहो तो मैं तुम्हें बताऊँ, इससे भी बढ़िया काम कौन सा है।” फिर उन्होंने कहा: “वो ईमान जो हर पल दिल में समाया रहे, और जिसकी वजह से तुम्हारी ज़बान सदा अल्लाह की याद में तर रहे।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 618)
अल्लाह का ज़िक्र हर वक़्त की नमाज़ है
हज़रत इब्न मसऊद (रज़ि०) ने कहा: “आलिम (दीन की समझ रखने वाला) हर वक़्त नमाज़ में रहता है।” लोगों ने पूछा: “वो कैसे हर वक़्त नमाज़ में रहता है?” उन्होंने जवाब दिया: “क्योंकि अल्लाह की याद उसके दिल और ज़बान दोनों पर रहती है।” (जामि बयानुल इल्म, खंड 1, पृष्ठ 232)
नमाज़ पढ़ने वाला अल्लाह की
ज़िम्मेदारी में आ जाता है
सलमान फ़ारसी (रज़ि०) कहते हैं: “मैं अबू बक्र (रज़ि०) के पास गया और कहा—मुझे नसीहत कीजिए। उन्होंने कहा: ‘ऐ सलमान! अल्लाह से डरते रहो। जान लो, जल्द ही फ़तहें (जीत) होंगी। उसमें तुम्हारा हिस्सा वही होगा, जो तुम खा लो या पहन लो। और याद रखो—जिसने पाँचों नमाज़ें पढ़ीं, वो सुबह और शाम अल्लाह की हिफ़ाज़त में होता है। तो किसी ऐसे बन्दे को मत मारना, जो अल्लाह की हिफ़ाज़त में हो। अगर ऐसा किया तो अल्लाह अपनी हिफ़ाज़त हटा देगा और तुम्हें मुँह के बल जहन्नम में डाल देगा।’” (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 97)
ईमान वाले की मदद करना बड़ी इबादत है
तबरानी और बैहक़ी ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) का वाक़िया बयान किया है। वे मस्जिद-ए-नबवी में एतकाफ़ (ध्यान) में थे। एक आदमी आया, और सलाम कर के बैठ गया। इब्न अब्बास ने कहा: “तुम उदास और ग़मगीन लग रहे हो।” उसने कहा: “हाँ, ऐ रसूलुल्लाह (सल्ल०) के चचेरे भाई! मेरे ऊपर फलाँ आदमी का क़र्ज़ है। और इस क़ब्र वाले (अल्लाह के रसूल) की इज़्ज़त की क़सम, मैं उसे चुका नहीं सकता।” इब्न अब्बास ने कहा: “क्या मैं तुम्हारे लिए उससे बात करूँ?” आदमी ने कहा: “हाँ, अगर आप चाहें।” फिर इब्न अब्बास ने जूते पहने और मस्जिद से बाहर चले गये। आदमी ने कहा: “शायद आप भूल गये कि आप एतकाफ़ में हैं।” इब्न अब्बास (रज़ि०) ने कहा: “नहीं, मैं भूला नहीं। मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते सुना है (और यह कहते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गये):
“‘जो शख़्स अपने भाई की मदद के लिए निकला और पूरी कोशिश की, तो यह उसके लिए दस साल के एतकाफ़ से भी बेहतर है।’” (शुअबुल ईमान, अल-बैहक़ी, हदीस संख्या 3679)
मुफ़लिस (निर्धन) वह है जो आखिरत
में मुफ़लिस रहे
अबू हुरैरा (रज़ि०) कहते हैं कि एक दिन हम रसूलुल्लाह (सल्ल.) के पास बैठे हुए थे। आपने कहा—“क्या तुम जानते हो कि मुफ़लिस कौन है?” लोगों ने कहा —“हमारे बीच मुफ़लिस वह है जिसके पास न पैसा है और न कोई सम्पत्ति।” आपने फ़रमाया—“मेरी उम्मत में मुफ़लिस वह है जो क़ियामत के दिन नमाज़, रोज़ा और ज़कात के साथ आएगा। मगर वह इस हालत में आएगा कि उसने किसी को गाली दी होगी, किसी पर झूठा इल्ज़ाम लगाया होगा, किसी का माल खा लिया होगा, किसी का ख़ून बहाया होगा, किसी को मारा-पीटा होगा। तो उसकी कुछ नेकियाँ एक को दी जाएँगी, कुछ नेकियाँ दूसरे को। और जब उसकी सारी नेकियाँ ख़त्म हो जाएँगी और हिसाब बाक़ी रहेगा, तब दूसरों के गुनाह लेकर उसके ऊपर डाल दिए जाएँगे और फिर उसे आग में झोंक दिया जाएगा।” (सुनन अल-तिर्मिज़ी, हदीस संख्या 2418)
परेशानियों के दौर में नमाज़ की पनाह लेना
हुज़ैफ़ा (रज़ि०) कहते हैं—ग़ज़वा-ए-ख़ंदक में हमारी तादाद लगभग तीन सौ थी। यह एक बेहद कठिन रात थी। ऊपर की तरफ़ अबू सुफ़ियान और उनकी फ़ौज थी, नीचे की तरफ़ बनू क़ुरैज़ा थे, जिनकी ओर से हम अपने घर-परिवार को बिल्कुल असुरक्षित समझते थे। सर्दी बहुत सख्त थी। इसके बाद तेज़ हवा चली जिसमें बिजली की कड़क-चमक थी। पत्थर उड़कर गिर रहे थे। अँधेरा इतना था कि कुछ दिखाई नहीं देता था।
ऐसी हालत में रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने मुझे हुक्म दिया कि ख़ंदक के पार जाकर विरोधियों के पड़ाव की ख़बर लाओ—कि वे वापसी की बात कर रहे हैं या अभी डटे हुए हैं। मैं लोगों में सबसे ज़्यादा डरने वाला था और मुझे सर्दी भी बहुत लगती थी। लेकिन रसूलुल्लाह (सल्ल.) का हुक्म पाकर उठ खड़ा हुआ। आपने मेरे लिए हिफ़ाज़त की दुआ की। मैं अपने मिशन पर निकला और अबू सुफ़ियान की फ़ौज में घूम-फिरकर ख़बर लाया। वे लोग “अल-रहील, अल-रहील” (वापस चलो, वापस चलो) कह रहे थे।
जब मैं रसूलुल्लाह (सल्ल.) के पास पहुँचा तो आप चादर ओढ़े नमाज़ में मशग़ूल थे।
रसूलुल्लाह (सल्ल.) की आदत थी कि जब भी कोई कठिन मामला पेश आता तो आप नमाज़ पढ़ते। (कन्ज़ुल उम्माल, खण्ड 7, पृष्ठ. 69)
क़ुरआन से अपने दिलों को हरकत दो
अबू हम्ज़ा ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) से कहा—“मैं तेज़ पढ़ने वाला आदमी हूँ। कभी-कभी एक ही रात में एक-दो बार पूरा क़ुरआन पढ़ लेता हूँ।” हज़रत इब्न अब्बास (रज़ि०) ने जवाब दिया—“मुझे तुम्हारे इस काम से ज़्यादा अच्छा लगेगा अगर तुम एक सूरह पढ़ो। लेकिन जब पढ़ो, तो ऐसे पढ़ो कि तुम्हारे कान उसकी तिलावत को महसूस करें और तुम्हारा दिल उसकी बातों को अपना ले। क़ुरान ऐसे पढ़ो कि उसकी गहराई पर ठहर सको, और वह तुम्हारे दिल को झकझोर कर ज़िंदा कर दे। तुम्हारी कोशिश यह न हो कि बस किसी तरह आख़िर तक पहुँच जाओ।” (मुख़्तसर ज़ादुल मआद, खण्ड 1, पृ.26)
नमाज़ इंसान को अल्लाह की पनाह में रखती है
मुआज़ बिन जबल (रज़ि०) से एक लम्बी रिवायत का एक हिस्सा यह है:
“जो व्यक्ति फ़र्ज़ नमाज़ जानबूझकर छोड़ दे, तो वह अल्लाह की हिफ़ाज़त से बाहर हो जाता है।” (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 233)
जुमा की नमाज़ का उद्देश्य अल्लाह
के करीब होना है
नबी (सल्ल.) ने हिजरत से पहले मुसअब बिन उमैर (रज़ि०) को सामूहिक इबादत करने के बारे में तहरीरी हिदायत भेजी थी। दारे क़ुतनी की रिवायत के मुताबिक़ उसका एक वाक्य यह था: “जुमे के दिन जब सूरज आधे दिन से ढल जाए, तो दो रकअत नमाज़ के ज़रिये अल्लाह की निकटता हासिल करो।” (अल-जामिउत्तफ़्सीर अल-इमाम इब्न रजब हनबली, खण्ड 2, पृष्ठ 436)
दुनियादारी इंसान को ख़ुदा से दूर करती है
दुनियादार (लोभी) आलिमों के बारे में एक हदीस-ए-क़ुदसी में आया है: “सबसे छोटी सज़ा जो मैं उन्हें दूँगा, वह यह होगी कि मैं उनके दिलों से दुआ की मिठास और रूह छीन लूँगा।” (जामे बयानुल इल्म व फ़ज़लिही, खण्ड 1, पृष्ठ 668)
ख़ुशू आदमी के दिल से जुड़ा होता है,
बाहरी सज-धज से नहीं
हज़रत आयशा (रज़ि०) ने एक बुज़ुर्ग को देखा। वह बहुत कमज़ोर और बुझी हुई हालत में चल रहे थे। आपने पूछा: इनका क्या हाल है? जवाब दिया गया: ये क़ुर्रा़ में से हैं (यानि क़ुरआन पढ़ाने-पढ़ने वाले और तालीम व इबादत में लगे रहने वाले)। यह सुनकर हज़रत आयशा (रज़ि०) ने कहा: “उमर (रज़ि०) कुर्रा़ के सरदार थे, लेकिन उनका हाल यह था कि जब चलते तो मज़बूती से चलते, जब बोलते तो ताक़त के साथ बोलते।” (मदारिजुस्सालिकीन, इब्न क़य्यिम, खण्ड 1, पृष्ठ 517)
हलाल चीज़ों से रोज़ा रखना,
हराम चीज़ों से इफ़्तार करना
अनस बिन मालिक (रज़ि०) कहते हैं: दो औरतों ने रोज़ा रखा और साथ बैठकर लोगों की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) और शिकायत करने लगीं। जब अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को उनके बारे में मालूम हुआ तो आपने फ़रमाया:
“इन दोनों ने रोज़ा नहीं रखा। उस शख़्स का रोज़ा कैसे हो सकता है जो रोज़ा रखकर भी लोगों का मांस (ग़ीबत) खाता रहे?” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 2221)
एक और रिवायत में यह आता है:
“इन दोनों औरतों ने उस चीज़ से रोज़ा रखा जो अल्लाह ने उनके लिए हलाल (जायज़) की थी, और उस चीज़ से रोज़ा तोड़ा जो अल्लाह ने उनके लिए हराम की थी। एक औरत दूसरी के पास बैठ गई और दोनों लोगों के मांस खाती रहीं (बुराई करती रहीं)।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 23654)
नमाज़ के बाद थोड़ी देर नमाज़ जैसी
हालत बनी रहनी चाहिए
अबू रम्सा (रज़ि०) कहते हैं: मैंने नबी (सल्ल०) के साथ नमाज़ पढ़ी। नमाज़ खत्म करने के बाद आपने सलाम फेरा। एक आदमी, जो शुरू से नमाज़ में था, तुरंत सुन्नत पढ़ने के लिए खड़ा हो गया। उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) उसके पास पहुँचे, कंधे पकड़कर झकझोरा और कहा—बैठ जाओ! “अहल-ए-किताब (यहूदी-ईसाई) इसी वजह से बर्बाद हुए कि उनकी नमाज़ों में कोई फस्ल (गैप) नहीं होता था।” (यानी एक नमाज़ ख़त्म करके तुरंत दूसरी शुरू कर देते थे)। नबी (सल्ल०) ने ऊपर देखा और कहा—“इब्न-ए-ख़त्ताब! अल्लाह ने तुम्हारे ज़रिए हक़ व सवाब (सत्य बात और पुन्य नेकी) तक पहुँचा दिया।” (मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 23121)
ख़ुदा को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़
की ज़रूरत नहीं
लोगों ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा, “क्या हमारा रब हमारे क़रीब है कि हम उससे धीमे बोलें, या वह दूर है कि ज़ोर से पुकारें?”
इस पर क़ुरान की आयत उतरी: “और जब मेरे बंदे तुमसे मेरे बारे में पूछें तो मैं निकट हूं, पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूं जब वह मुझे पुकारता है।” (क़ुरआन 2:186) अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) बताते हैं कि सफ़र के दौरान जब लोग किसी घाटी पर चढ़ते तो “अल्लाहु अकबर” कहते हुए आवाज़ें ऊँची हो जातीं। एक बार दुआ करते वक़्त भी लोगों ने आवाज़ें ऊँची कर लीं, तो नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया: “लोगो, अपने ऊपर आसानी करो। तुम किसी बहरे या ग़ैरहाज़िर को नहीं पुकार रहे हो। जिसे पुकार रहे हो, वह तुम्हारे साथ है—वह सुनने वाला है, बहुत क़रीब है, और उसकी शान बहुत ऊँची है ।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2992)
दीन बेअसर हो जाता है, यदि उसका
लक्ष्य केवल दुनिया कमाना रह जाए
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) बताते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: “अगर कोई ऐसा इल्म (ज्ञान) सीखे, जो असल में अल्लाह की ख़ुशी के लिए है, लेकिन वह उसे दुनिया कमाने के लिए सीखे, तो क़ियामत के दिन उसे जन्नत की ख़ुशबू भी न मिलेगी।” (सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या 3664; सुनन इब्न माजह, हदीस संख्या 252; मुस्नद अहमद, हदीस संख्या 8457)
असल इबादत अल्लाह के सामने नम्र
होकर झुकना और गिड़गिड़ाना है
अब्दुल्लाह बिन जुदआन, इस्लाम से पहले के ज़माने में बहुत मेहमाननवाज़ और लोगों की मदद करने वाला था। वह हज़रत आयशा (रज़ि०) का रिश्तेदार था। रसूलुल्लाह (सल्ल०) के नबी बनने से पहले ही उसकी मौत हो गई थी। एक दिन हज़रत आयशा (रज़ि०) ने पूछा: “या रसूलुल्लाह! अब्दुल्लाह बिन जुदआन लोगों की बहुत सेवा करता था, खाना खिलाता था। क्या क़ियामत के दिन उसे इसका फ़ायदा मिलेगा?” आप (सल्ल०) ने जवाब दिया: “नहीं। क्योंकि उसने कभी यह दुआ नहीं की, (ऐ मेरे रब, हिसाब-किताब के दिन मेरी ग़लतियाँ माफ़ कर देना)।” (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 214)
अल्लाह को अपने बन्दे की विनम्र
पुकार पसंद है
जब कोई बंदा अपने रब से दुआ करता है और अल्लाह उससे मोहब्बत करता है, तो वह कहता है: “ऐ जिब्रील! मेरे बन्दे की दुआ तुरन्त पूरी मत करना। मुझे अच्छा लगता है कि मैं उसकी बेबस आवाज़ सुनता रहूँ।” (जामिउल उलूम वल हिकम, खण्ड 2, पृष्ठ 403)
सतर्क ज़िन्दगी कैसी होती है?
हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रह.) ने कहा: “जिस काम में हिदायत (सही रास्ता) दिखाई दे, उसकी पैरवी करो। जिसमें नुक़सान साफ़ दिखे, उससे बचो और जो काम समझ में न आए, उसे अल्लाह पर छोड़ दो।” (तख़रीजु अहादीसिल इहया, खण्ड 9, पृष्ठ 277)
अच्छाई का ज़िक्र करना और
बुराई को छिपाना
अबू हारुन कहते हैं कि मैं अबू हाज़िम के पास गया और उनसे पूछा—“दोनों आँखों का शुक्र (कृतज्ञता) क्या है?”
उन्होंने कहा—“जब तुम अपनी आँखों से अच्छाई देखो तो उसका उल्लेख करो, और जब आँखों से बुराई देखो तो उसे छुपा लो।” फिर मैंने पूछा—“दोनों कानों का शुक्र क्या है?” उन्होंने कहा—“जब तुम अपने कानों से अच्छाई सुनो तो उसे याद रखो, और जब अपने कानों से बुराई सुनो तो उसे भुला दो।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 4244)
तीन ऐसी बातें हैं जिनके अंदर बाकी
सारी बातें समा जाती हैं
उम्मे अनस (रज़ि०) ने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कोई नसीहत कीजिए।” आपने फ़रमाया—गुनाह छोड़ दो, यही सबसे बड़ी हिजरत है। नमाज़-रोज़े जैसे फ़र्ज़ अदा करो, यही सबसे बड़ा जिहाद है। और अल्लाह को खूब याद करो, क्योंकि अल्लाह के पास तुम्हारी सबसे प्यारी चीज़ उसकी याद ही होगी। (अल-मोजम अल-कबीर, हदीस संख्या 313)
असली इल्म वही है जो अल्लाह
का डर पैदा करे
औफ़ बिन मालिक अशजई कहते हैं कि नबी (सल्ल०) के पास आपके साथी बैठे थे। आपने आसमान की ओर देखा और कहा—“वो वक़्त आने वाला है जब इल्म (ज्ञान) उठा लिया जाएगा।” अनसार में से एक शख़्स, ज़ियाद बिन लबीद ने कहा—“ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हमसे इल्म चला जाएगा, जबकि हमारे पास अल्लाह की किताब है और हम अपने बच्चों और औरतों को सिखा रहे हैं?” नबी (सल्ल०) ने कहा—“मैं तो तुम्हें मदीना का सबसे समझदार आदमी मानता था। क्या तुम यहूदियों की गुमराही (भटकाव) नहीं देखते? उनके पास भी अल्लाह की किताब थी।” इसके बाद जुबैर बिन नुफैर की मुलाक़ात शद्दाद बिन औस से हुई। उन्होंने ये हदीस सुनाई। शद्दाद ने पूछा—“जानते हो इल्म उठने का मतलब क्या है?” उन्होंने कहा—“नहीं।” शद्दाद ने कहा—“बरतन के चले जाने जैसा (यानि जिसमें इल्म रखा जाता है वही चला जाए)।” फिर शद्दाद ने कहा—“क्या जानते हो सबसे पहला इल्म कौन सा उठेगा?” उन्होंने कहा—“नहीं।” शद्दाद ने कहा—“ख़ुशू (अल्लाह का डर, नम्रता) उठ जाएगा, यहाँ तक कि तुम किसी को भी सच्चा ख़ुशू करने वाला नहीं देखोगे।” (अल-इस्तीआब फ़ी मारिफ़तिल-अस्हाब, खण्ड 2, पृष्ठ 534)
हर किसी को भटकने का खतरा है
नबी (सल्ल०) ने कहा—“ये उम्मत (क़ौम) पहले अल्लाह की किताब पर अमल करेगी। फिर कुछ समय तक अल्लाह के रसूल की सुन्नत पर अमल करेगी। उसके बाद लोग अपनी सोच पर चलेंगे। और जब वे राय पर चलने लगेंगे, तो भटक जाएंगे।” (मुस्नद अबू याला, हदीस संख्या 5856)
बुज़ुर्ग-परस्ती धीरे-धीरे मूर्ति-पूजा
बन जाती है
सूरह नूह में पुराने ज़माने की कई मूर्तियों का ज़िक्र है—वद, सुवा, यगूस, यऊक़ और नस्र। मुफ़स्सिर इब्न जरीर तबरी ने मोहम्मद बिन क़ैस के हवाले से बताया है कि इन मूर्तियों के नाम असल में उनकी क़ौम के नेक बुज़ुर्गों के नाम पर रखे गए थे। ये लोग अल्लाह के अच्छे बंदे थे जो हज़रत आदम और हज़रत नूह के बीच के दौर में पैदा हुए। इनके बहुत से मानने वाले थे। जब ये लोग मर गए तो उनके चाहने वालों ने कहा—अगर हम इनकी मूर्तियाँ बना लें तो हमारी इबादत (पूजा) का शौक़ और बढ़ जाएगा। इसलिए उन्होंने इनकी मूर्तियाँ बना लीं। फिर जब दूसरी पीढ़ी आई तो शैतान ने उन्हें और गुमराह किया। उसने कहा—तुम्हारे बुज़ुर्ग इन मूर्तियों के पास जो पूजा करते थे, दरअसल वही इन बुज़ुर्गों की पूजा थी, और यही बुज़ुर्ग बारिश कराते हैं और सारे काम बनाते हैं। इस तरह धीरे-धीरे मूर्ति-पूजा शुरू हो गई। (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 4920)
अल्लाह के क़ानून में किसी के
लिए छूट नहीं
सूरह माइदह में बनी इस्राईल का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि उनमें से जो लोग अल्लाह के बताए हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला नहीं करते, वे काफ़िर हैं, ज़ालिम हैं और फ़ासिक़ (गुनहगार) हैं। हुज़ैफ़ा (रज़ि०) से किसी ने कहा कि सूरह माइदह की ये आयतें तो बनी इस्राईल के लिए उतरी हैं, हमारे लिए नहीं। यानी यहूदियों में से जो अल्लाह के हुक्म से हटे वही काफ़िर, ज़ालिम और फ़ासिक़ है, हम नहीं। इस पर हुज़ैफ़ा (रज़ि०) ने कहा—बनी इस्राईल कितने अच्छे भाई हैं तुम्हारे! कड़वा सब उनके लिए और मीठा सब तुम्हारे लिए? हरगिज़ नहीं, ख़ुदा की क़सम! तुम क़दम-क़दम पर उनके जैसा करोगे। (तफ़्सीर अत्तबरी, खण्ड 8, पृष्ठ 459)
जब जन्नत वाले जन्नत में जाने से
रोक दिए जाएंगे
अब्दुल्लाह बिन मोहम्मद बिन अकील कहते हैं—मैंने जाबिर बिन अब्दुल्लाह को यह कहते सुना कि मुझे पता चला एक सहाबी ने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से एक हदीस सुनी थी। मैंने एक ऊँट खरीदा, उस पर काठी बाँधी और सफ़र शुरू किया। मैं एक महीने तक चलता रहा और फिर शाम (सीरिया) पहुँचा। वहाँ मैं अब्दुल्लाह बिन उनैस (रज़ि०) के घर गया। मैंने दरबान से कहा—मालिक से कहो कि जाबिर दरवाज़े पर हैं। उन्होंने पूछा—क्या अब्दुल्लाह के बेटे जाबिर? मैंने कहा—हाँ। फिर अब्दुल्लाह बिन उनैस बाहर आए और मुझे गले लगाया। मैंने कहा—मुझे पता चला है कि आपने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से एक हदीस सुनी है। मुझे डर था कि कहीं मैं मर न जाऊँ इससे पहले कि वह सुन लूँ। उन्होंने कहा—मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को यह कहते सुना: क़ियामत के दिन लोग नंगे, बिना खतना किए और बिना सामान के उठाए जाएंगे। अल्लाह सबको आवाज़ देगा—दूर वाले भी वैसे ही सुनेंगे जैसे पास वाले। अल्लाह कहेगा: मैं बादशाह हूँ, मैं इंसाफ़ करने वाला हूँ। कोई जन्नती जन्नत में नहीं जाएगा अगर उसने किसी जहन्नमी पर ज़ुल्म किया हो और वह उसका बदला चाहता हो। और कोई जहन्नमी जहन्नम में नहीं जाएगा अगर उसने किसी जन्नती पर ज़ुल्म किया हो और वह बदला चाहता हो। मैंने पूछा—यह कैसे होगा जबकि हम सब नंगे और बिना सामान के उठाए जाएंगे? जवाब मिला—भलाइयों और बुराइयों के ज़रिए बदला चुकाया जाएगा। (अल-अदबुल मुफरद, अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 970)
वही अमल (कर्म) क़बूल है जिसमें
सांसारिक लाभ और ख़्याति की चाह न हो
अबू उमामा (रज़ि अल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि एक आदमी रसूलुल्लाह (सल्ल०) के पास आया और बोला: “अगर कोई शख़्स जिहाद करे और उसके साथ-साथ सांसारिक लाभ और ख़्याति की चाह करे तो उसे क्या मिलेगा?”
रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “उसके लिए कुछ नहीं है।”
उसने यही सवाल तीन बार किया और हर बार आपने यही जवाब दिया: “कुछ नहीं है।”
फिर आपने कहा: “अल्लाह वही अमल (अच्छा कर्म) क़बूल करता है जो सिर्फ़ उसी के लिए और उसी की रज़ा (प्रसन्नता) के लिए हो।” (सुनन अल-नसई, हदीस संख्या 3140)
उम्मीद और डर के बीच
हज़रत उमर (रज़ि अल्लाहु अन्हु) कहते हैं: “अगर आसमान से कोई आवाज़ आए कि ऐ लोगो! तुम सब जन्नत में जाओगे, सिवाए एक आदमी के, तो मुझे डर होगा कि कहीं वो मैं न होऊँ। और अगर आवाज़ आए कि ऐ लोगो! तुम सब जहन्नम में जाओगे, सिवाए एक आदमी के, तो मुझे उम्मीद होगी कि वो मैं ही हूँ।” (हिल्यतुल औलिया, खंड 1, पृष्ठ 53)
लोगों को माफ़ कर देना भी सदक़ा है
अबू अब्स बिन जबर (रज़ि अल्लाहु अन्हु) बताते हैं: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने एक दिन लोगों से कहा कि अल्लाह की राह में सदक़ा दो। लोग अपनी हैसियत के मुताबिक़ लेकर आए। सहाबा में एक उल्बा बिन ज़ैद (रज़ि अल्लाहु अन्हु) थे। उनके पास कुछ भी न था। रात को उठे, नमाज़ पढ़ी और रोते हुए अल्लाह से बोले:
“ऐ अल्लाह! मेरे पास कुछ नहीं है देने को। इसलिए मैं अपनी इज़्ज़त उन लोगों को सदक़ा करता हूँ (माफ़ करता हूँ) जिन्होंने मेरी बेइज़्ज़ती की है।”
सुबह जब लोग जमा हुए तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने पूछा: “कल रात किसने अपनी इज़्ज़त सदक़ा की थी?” किसी ने जवाब न दिया। आपने तीन बार पूछा, फिर उलबा बिन ज़ैद (रज़ि अल्लाहु अन्हु) खड़े हुए। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कहा: “अल्लाह ने तुम्हारा सदक़ा क़बूल कर लिया है।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 7729)
एक दूसरी हदीस में ये शब्द हैं:
“खुशख़बरी है! उस अल्लाह की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम्हें मक़बूल (स्वीकृत) ज़कात देने वालों में लिख दिया गया है।” (अल-बिदाया वन्निहाया, खण्ड 5, पृष्ठ 5)
आदमी अपने बारे में गलतफहमी
(भ्रम) का शिकार हो जाता है
अनस रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मिक़दाद बिन असवद रज़ि० को एक जगह आमिल (अधिकारी) बना कर भेजा। कुछ दिन बाद जब वे लौटे तो आपने पूछा—“तुम्हें यह काम कैसा लगा?” मिक़दाद रज़ि० ने कहा—“लोग मुझे उठाते और बैठाते रहे (यानि मुझे इज़्ज़त देते रहे), यहाँ तक कि मुझे लगने लगा कि मुझे लोगों पर कोई श्रेष्ठता मिल गई है।” रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया—“हुकूमत और ज़िम्मेदारी तो इसी तरह की चीज़ है। अब चाहे तुम इसे स्वीकार करो या छोड़ दो।” मिक़दाद रज़ि० ने कहा—“उस ख़ुदा की क़सम जिसने आपको हक़ के साथ भेजा है, अब मैं दो लोगों पर भी कभी ज़िम्मेदार नहीं बनूँगा।” (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 1, पृष्ठ 174)
जिस दिल में ख़ुदा का डर न हो वह
खुदा के गुणों को नहीं समझ सकता
तबूक की जंग बहुत कठिन हालात में हुई। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मुसलमानों से कहा कि वे अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करें। लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार देना शुरू किया। सबसे अधिक दान करने वालों में से एक अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि० थे। उन्होंने दो सौ ऊक़िया (सोना) दिया। रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने उनसे पूछा—“क्या अपने बच्चों के लिए कुछ छोड़ा?” उन्होंने कहा—“हाँ।” आपने पूछा—“क्या छोड़ा?” उन्होंने कहा —“जो मैंने दान किया है उससे बेहतर।” आपने पूछा—“क्या?” अब्दुर्रहमान ने कहा—“वह भलाई और नेक काम जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने वादा किया है।”
अबू अक़ील अंसारी रज़ि० एक साअ (लगभग साढ़े तीन सेर) खजूर लाए। उन्होंने कहा—“सारी रात मैंने एक यहूदी के यहाँ पानी खींचा और दो साअ खजूर पाई। एक साअ मैंने अपने घर वालों को दिया और एक साअ यहाँ लाया हूँ। ख़ुदा की क़सम इसके अलावा मेरे पास कुछ नहीं।” वे यह कहते हुए शर्मिंदा हो रहे थे।
दूसरी ओर मदीना के मुनाफ़िक़ (पाखंडी) का हाल यह था कि जब कोई मुसलमान अधिक दान करता तो कहते—“यह दिखावा है।” और जो थोड़ा दान करता उसके बारे में कहते—“यह तो अपने उस एक साअ का खुद ज़्यादा ज़रूरतमंद था।” (कंज़ुल उम्माल, खण्ड 2, पृष्ठ 428)
दिखावे से बचने वाला जवाब
हज़रत उरवा कहते हैं कि उमर रज़ि० ऐला (फ़िलिस्तीन) आए और उनके साथ मुहाजिरीन और अंसार का एक दल था। आपने वहाँ के ईसाई पेशवा (असक़फ़) को अपना कुर्ता दिया जो मोटे कपड़े का और पैवंदों वाला था। लंबे सफ़र में सवारी करने से कुरता पीछे से फट गया था। आपने वह कुर्ता असक़फ़ को दिया कि वह इसे धोकर सिल दे।
असक़फ़ कुर्ता लेकर गया और ठीक करने के साथ एक और नया कुर्ता (पतले कपड़े का) सीकर लाया। उमर रज़ि० ने देखा और पूछा—“यह क्या है?” असक़फ़ ने कहा—“यह तो आपका कुर्ता है, मैंने इसे धोकर पैवंद लगाया और यह दूसरा मेरी ओर से आपके लिए तोहफ़ा है।” उमर रज़ि० ने उसे देखा, हाथ से छुआ और फिर अपना पुराना कुर्ता पहन लिया तथा नया कुर्ता असक़फ़ को वापस कर दिया और कहा—“यह पुराना कुर्ता पसीना सोखने के लिए ज़्यादा अच्छा है।” (तारीख़ अत्तबरी, खण्ड 4, पृष्ठ 64)
अल्लाह को पुकारने के लिए ऊँची
आवाज़ की ज़रूरत नहीं
अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल.) ख़ैबर की लड़ाई के लिए निकले। लोग एक वादी (घाटी) के पास पहुँचे तो उन्होंने ऊँची आवाज़ में तकबीर कही—”अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाह।”
रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया: “ऐ लोगो! अपने ऊपर नर्मी करो। तुम किसी बहरे और अनुपस्थित को नहीं पुकार रहे हो। तुम उस ज़ात को पुकार रहे हो जो सुनने वाला है, पास है और तुम्हारे साथ है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 2992)
आख़िरत की पूछताछ और हिसाब-किताब
के खौफ़ से काँप उठना
अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) ने एक चिड़िया को पेड़ पर बैठे देखा। उन्होंने कहा: “ऐ चिड़िया! तू कितनी खुश-नसीब है। काश मैं भी तेरे जैसा होता। तू पेड़ पर बैठती है, उसका फल खाती है और उड़ जाती है। तेरे ऊपर न कोई हिसाब है न सज़ा। ख़ुदा की क़सम! मुझे तो यह ज़्यादा पसंद है कि मैं रास्ते के किनारे का एक पेड़ होता। एक ऊँट आता, मुझे तोड़ता, अपने मुँह में डालता, चबाता, निगलता और फिर गोबर के रूप में बाहर निकाल देता—और मैं इंसान न होता।” (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 1237)
अपने अमल (कर्म) को बे-क़ीमत समझना
अब्दुल्लाह बिन उमर कहते हैं कि उमर (रज़ि०) अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) से मिले और उनसे कहा: “ऐ अबू मूसा! क्या तुम्हें यह अच्छा लगेगा कि जो काम तुमने रसूलुल्लाह (सल्ल.) के साथ किए वही तुम्हारे लिए हों और उनके सिवा तुम्हारे सारे काम बराबर-सराबर हो जाएँ—न सवाब मिले न सज़ा?”
अबू मूसा अशअरी (रज़ि०) ने कहा: “नहीं, ऐ अमीरुल मोमिनीन (ख़लीफा)! ख़ुदा की क़सम, मैं बसरा आया तो वहाँ ज़ुल्म फैला हुआ था। फिर मैंने लोगों को क़ुरआन और सुन्नत सिखाई। उनके साथ अल्लाह की राह में लड़ा। और मैं इन कामों के ज़रिए अल्लाह के फ़ज़्ल (अनुग्रह) की उम्मीद रखता हूँ।”
उमर (रज़ि०) ने कहा: “लेकिन मुझे तो यह पसंद है कि मैं अपने अमल से इस तरह निकल जाऊँ कि न मेरा किसी पर कोई हक़ बाक़ी हो और न ही मुझ पर किसी का। बस मेरे लिए वही अमल रह जाएँ जो मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल.) के साथ रह कर किए।” (अल-जामिउल कबीर, हदीस संख्या 3112)
मेहनत की कमाई से ख़र्च करना
हज़रत हसन कहते हैं कि एक आदमी ने उस्मान (रज़ि०) से कहा: “ऐ मालदारो! तुम लोग भलाई में आगे बढ़ गए। तुम लोग सदक़ा करते हो, हज करते हो, खर्च करते हो।” उस्मान (रज़ि०) ने कहा: “क्या तुम लोग हमसे जलते हो?” आदमी ने कहा: “हाँ।” उन्होंने फ़रमाया: “ख़ुदा की क़सम, वह एक दिरहम (मुद्रा) जो कोई अपनी मेहनत की कमाई से ख़र्च करता है, उन दस हज़ार दिरहमों से बेहतर है, जो एक बड़े ढेर से ख़र्च किए गए हों।” (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 3456)
काश मैं एक तिनका होता
आमिर बिन रबीअह कहते हैं कि उमर (रज़ि०) ने एक तिनका ज़मीन से उठाकर हाथ में लिया और कहा: “काश मैं यह तिनका होता। काश मेरी माँ मुझे जन्म न देती। काश मैं कुछ भी न होता। काश मैं भुला दिया गया होता।” (कंजुल उम्माल, हदीस संख्या 35914)
